Edited by Sabir Khan, NIT:
लेखक: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
30 सितंबर को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस केवल अनुवादकों के सम्मान का अवसर नहीं, बल्कि भाषा, ज्ञान और समाज के बीच संबंधों पर विचार करने का दिन भी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 24 मई 2017 को प्रस्ताव A/RES/71/288 के माध्यम से 30 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस घोषित किया। वर्ष 2026 में UNESCO ने इस अवसर को “Linguistic Diversity and Language Rights: The Power of Being Understood” विषय से जोड़ा है। इसका मूल विचार यह है कि भाषायी विविधता समाज की शक्ति है और अनुवाद भाषा के कारण किसी समुदाय के समझे जाने, अपनी बात रखने तथा ज्ञान तक पहुंच के अधिकार को सीमित होने से रोक सकता है।
भारत जैसे बहुभाषी देश में अनुवाद का महत्व और भी व्यापक है। यहां भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि इतिहास, स्मृति, दर्शन, लोकज्ञान, साहित्य, धार्मिक परंपराओं, कृषि और पर्यावरणीय ज्ञान तथा सामुदायिक पहचान की वाहक भी है। इसलिए अनुवाद को केवल एक भाषा के शब्दों को दूसरी भाषा में बदलने की तकनीक मानना उसके सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व को सीमित करना होगा।
पाली और बुद्ध की ज्ञान-परंपरा
भारतीय ज्ञान-परंपरा की चर्चा पाली के बिना अधूरी है। पाली बौद्ध साहित्य की महत्वपूर्ण भाषा रही है और थेरवाद बौद्ध परंपरा के विशाल साहित्य के अध्ययन में इसकी केंद्रीय भूमिका है। भारत सरकार ने 4 अक्टूबर 2024 को पाली को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्रदान किया। इसी अवसर पर प्राकृत, मराठी, असमिया और बांग्ला को भी शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिला।
हालांकि पाली को सीधे-सीधे ‘बुद्ध की भाषा’ कहना या यह कहना कि बुद्ध ने पाली में त्रिपिटक लिखा, ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यधिक सरलीकरण होगा। बुद्ध की शिक्षाओं की प्रारंभिक परंपरा मौखिक थी और बौद्ध साहित्य विभिन्न भाषायी परंपराओं में विकसित हुआ। फिर भी पाली साहित्य प्रारंभिक बौद्ध परंपरा, दर्शन, नैतिक चिंतन, सामाजिक विचार और सांस्कृतिक इतिहास को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत है।
बुद्ध की शिक्षाओं के विस्तार में अनुवाद की भूमिका
बुद्ध के विचार किसी एक भाषायी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहे। बौद्ध परंपरा के विस्तार के साथ उनकी शिक्षाएं विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों तक पहुंचीं। भारत से श्रीलंका, चीन, तिब्बत, दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया तक बौद्ध साहित्य की यात्रा में अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
कुमारजीव और ह्वेनसांग जैसे विद्वानों ने बौद्ध ज्ञान को भाषायी सीमाओं के पार पहुंचाने में योगदान दिया। इस प्रक्रिया में केवल शब्दों का स्थानांतरण नहीं हुआ, बल्कि दार्शनिक अवधारणाओं को दूसरी भाषाओं और संस्कृतियों में समझने योग्य बनाने का प्रयास भी हुआ। यही कारण है कि प्रभावी अनुवाद केवल शब्दों का नहीं, बल्कि अर्थ, संदर्भ और संवेदना का भी अनुवाद होता है।
भाषा से संस्कृति तक पहुंचाता है अनुवाद
साहित्यिक अनुवाद में चुनौती और अधिक गहरी हो जाती है। कविता, लोकगीत, कहावत, मुहावरे और लोककथाएं केवल शब्दों से निर्मित नहीं होते, बल्कि उनके पीछे जीवन के अनुभव और सांस्कृतिक स्मृतियां होती हैं। किसी आदिवासी समुदाय के लोकगीत में प्रयुक्त स्थानीय शब्द उसकी भूमि, प्रकृति, रिश्तों और सामुदायिक स्मृतियों से जुड़े हो सकते हैं। इसलिए अनुवादक को शब्द के साथ उसके सांस्कृतिक संदर्भ को भी समझना पड़ता है।
पूर्वोत्तर: भाषायी और सांस्कृतिक विविधता की भूमि
पूर्वोत्तर भारत को एक समान भाषायी या सांस्कृतिक इकाई के रूप में देखना उचित नहीं होगा। असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम में अनेक भाषाएं, जनजातीय परंपराएं, लोकसाहित्य और धार्मिक-सांस्कृतिक धाराएं विकसित हुई हैं।
असम में ताई फाके, ऐटन, खामयांग, तुरुंग, सिंगफो, खामती, चकमा और चटगांव बारुआ जैसे समुदायों में थेरवाद बौद्ध परंपराओं के विभिन्न रूप दिखाई देते हैं। वहीं अरुणाचल प्रदेश में तिब्बत से ऐतिहासिक और भौगोलिक निकटता के कारण विशेष रूप से तवांग क्षेत्र के मोनपा तथा अन्य समुदायों में तिब्बती बौद्ध परंपरा का महत्वपूर्ण स्थान है।
यह विविधता बताती है कि धर्म और भाषा को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। कोई ज्ञान-परंपरा जब नए भूगोल में पहुंचती है तो वह स्थानीय भाषा, कला, साहित्य, स्थापत्य और सामाजिक स्मृति के साथ संवाद करती है।
अहोम-ताई पांडुलिपियां और इतिहास का पुनर्पाठ
असम की अहोम और ताई पांडुलिपि परंपरा अनुवाद के महत्व का महत्वपूर्ण उदाहरण है। असम के Directorate of Historical and Antiquarian Studies के संग्रह में अहोम और अन्य ताई भाषाओं की अनेक पांडुलिपियां संरक्षित हैं। इनमें बुरंजी, पारंपरिक ज्ञान, ज्योतिष, मान्यताओं और बौद्ध विषयों से संबंधित सामग्री मिलती है।
पांडुलिपियों का लिप्यंतरण, वैज्ञानिक संपादन और अनुवाद उन्हें व्यापक ज्ञान-संसार तक पहुंचाने में मदद करता है। इस दृष्टि से अनुवाद केवल साहित्यिक गतिविधि नहीं, बल्कि इतिहास और सांस्कृतिक स्मृति के संरक्षण का भी महत्वपूर्ण माध्यम है।
पिलाक: पुरातत्व और बहुस्तरीय सांस्कृतिक इतिहास
त्रिपुरा का पिलाक पूर्वोत्तर की बौद्ध विरासत का एक महत्वपूर्ण संदर्भ है। यहां से जुड़े पुरातात्विक और सांस्कृतिक स्रोत बौद्ध तथा अन्य धार्मिक-सांस्कृतिक प्रभावों के बहुस्तरीय इतिहास की ओर संकेत करते हैं।
पिलाक जैसे स्थलों का अध्ययन केवल एक धार्मिक पहचान तक सीमित न रखकर पुरातत्व, मूर्तिकला, स्थापत्य, स्थानीय परंपरा, साहित्य और ऐतिहासिक स्रोतों को साथ रखकर किया जाना चाहिए। अलग-अलग स्रोत अलग-अलग भाषाओं में उपलब्ध होने के कारण ऐसे शोध में अनुवाद की भूमिका स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारतीय ज्ञान-परंपरा की असली ताकत बहुभाषिकता
भारतीय ज्ञान-परंपरा को केवल संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों तक सीमित करना उचित नहीं होगा। पाली, प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मराठी, बंगाली, असमिया, मैथिली, भोजपुरी, राजस्थानी, ब्रज, अवधी, बघेली, बुंदेली सहित अनेक भाषाओं की साहित्यिक परंपराएं भारतीय ज्ञान-संपदा का हिस्सा हैं।
इसके साथ आदिवासी और लोक भाषाओं की मौखिक परंपराएं भी महत्वपूर्ण हैं। किसान का मौसम संबंधी ज्ञान, वन समुदायों की जैव-विविधता संबंधी समझ, पारंपरिक जल-संरक्षण, लोकचिकित्सा, हस्तशिल्प, लोकगीत, लोककथाएं, महिलाओं की मौखिक स्मृतियां और श्रमिक समुदायों के अनुभव भी ज्ञान की महत्वपूर्ण धाराएं हैं। इनके संरक्षण के लिए दस्तावेजीकरण के साथ भाषायी संरक्षण, लिप्यंतरण और अनुवाद की आवश्यकता है।
आंबेडकर, बुद्ध और ज्ञान की लोकतांत्रिक पहुंच
डॉ. भीमराव आंबेडकर के बौद्ध चिंतन को भी अनुवाद और ज्ञान की लोकतांत्रिक पहुंच के संदर्भ में देखा जा सकता है। उनकी प्रमुख कृति ‘The Buddha and His Dhamma’ में बुद्ध और धम्म की उनकी व्याख्या प्रस्तुत होती है। यह पुस्तक विभिन्न भारतीय भाषाओं के पाठकों तक पहुंची है।
आंबेडकर के चिंतन में शिक्षा, ज्ञान और सामाजिक मुक्ति का संबंध महत्वपूर्ण है। इस दृष्टि से अनुवाद केवल साहित्यिक सुविधा नहीं, बल्कि ज्ञान तक व्यापक सामाजिक पहुंच का माध्यम भी है। बुद्ध और आंबेडकर के विचार विद्यार्थियों, श्रमिकों, किसानों, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और ग्रामीण समुदायों तक उनकी समझ की भाषा में पहुंचना ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
हाशिए की आवाज को मुख्यधारा तक पहुंचाने का माध्यम
अनुवाद उन आवाजों को व्यापक समाज तक पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जिन्हें मुख्यधारा में बोलने और सुने जाने के अवसर कम मिले हैं। आदिवासी महिला की मौखिक कथा, ग्रामीण बुजुर्ग की स्मृति, श्रमिक का अनुभव, छोटे समुदाय का लोकगीत या अल्पसंख्यक भाषा का साहित्य केवल लोक सामग्री नहीं है। इनमें इतिहास, सामाजिक अनुभव और सामुदायिक ज्ञान सुरक्षित हो सकता है।
लेकिन यहां अनुवादक की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है। किसी समुदाय की आवाज को अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार बदल देना मूल अर्थ को प्रभावित कर सकता है। इसलिए स्थानीय शब्दों, प्रतीकों, सामाजिक संदर्भों और सांस्कृतिक अर्थों को समझना आवश्यक है। अनुवादक भाषा के साथ-साथ संदर्भ और अर्थ का भी जिम्मेदार मध्यस्थ है।
राष्ट्रीय अनुवाद मिशन की भूमिका
भारत में भाषायी पहुंच के प्रश्न को संस्थागत रूप से संबोधित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास राष्ट्रीय अनुवाद मिशन (NTM) है। इसका उद्देश्य उच्च शिक्षा और ज्ञान-सामग्री को भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने, अनुवादकों को प्रशिक्षित करने और पारिभाषिक शब्दावली विकसित करने जैसे कार्यों के माध्यम से ज्ञान की पहुंच बढ़ाना है।
भारत की वास्तविक बहुभाषी आवश्यकता केवल अंग्रेजी से हिंदी या किसी एक भारतीय भाषा में अनुवाद की नहीं है। असमिया से हिंदी, हिंदी से असमिया, बोडो से हिंदी, मणिपुरी से बंगाली, पाली से हिंदी, मराठी से तमिल और संताली से हिंदी जैसे भारतीय भाषाओं के बीच सीधे अनुवाद की भी व्यापक आवश्यकता है।
एआई और मशीन अनुवाद : अवसर के साथ सावधानी
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन अनुवाद ने भाषायी दुनिया में नई संभावनाएं पैदा की हैं। बड़ी मात्रा में सामग्री को कम समय में दूसरी भाषा में पहुंचाना संभव हो रहा है। एआई प्रारंभिक अनुवाद, शब्द विकल्प, दस्तावेजों की समझ और भाषा-संपादन में उपयोगी सहायक बन सकता है।
लेकिन पाली, प्राकृत, जनजातीय भाषाओं और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील साहित्य के मामले में केवल मशीन पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। भाषा में मुहावरे, ऐतिहासिक संदर्भ, सांस्कृतिक संकेत, दार्शनिक अवधारणाएं और मौखिक परंपराएं होती हैं, जिनका अर्थ केवल शब्दकोश से निर्धारित नहीं होता। इसलिए भविष्य का प्रभावी मॉडल मानव, समुदाय और तकनीक के समन्वय पर आधारित होना चाहिए।
भाषायी अधिकार और पूर्वोत्तर की नई जिम्मेदारी
पूर्वोत्तर भारत की भाषाओं के संदर्भ में अनुवाद का प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। अनेक भाषाएं छोटे समुदायों में जीवित हैं और उनका साहित्य बड़ी मात्रा में मौखिक परंपरा में सुरक्षित है। इसलिए केवल किसी बड़ी भाषा में उनका अनुवाद कर देना पर्याप्त नहीं होगा। स्थानीय भाषाओं में शिक्षा, डिजिटल सामग्री, शब्दकोश, लोकसाहित्य का दस्तावेजीकरण, द्विभाषी प्रकाशन और समुदाय आधारित अनुवाद भी आवश्यक हैं।
यदि किसी भाषा का ज्ञान केवल बाहरी शोधकर्ता की भाषा में उपलब्ध हो और समुदाय की नई पीढ़ी अपनी भाषा में उस ज्ञान को न पढ़ सके, तो संरक्षण का उद्देश्य अधूरा रह सकता है। भाषा बचती है तो केवल शब्द नहीं, बल्कि उससे जुड़ा एक पूरा सांस्कृतिक संसार भी सुरक्षित रहता है।
अनुवाद ज्ञान का सामाजिक अधिकार बने
मेरे विचार में अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस को केवल अनुवादकों के सम्मान तक सीमित न रखकर भारत की भाषायी समानता, सांस्कृतिक संवाद और ज्ञान की समान पहुंच के व्यापक प्रश्न से जोड़ना चाहिए। हमारे सामने प्रमुख चुनौतियों में भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा और शोध सामग्री की कमी, छोटी एवं जनजातीय भाषाओं की मौखिक परंपराओं के कमजोर होने का खतरा और ज्ञान का कुछ प्रमुख भाषाओं तक केंद्रीकरण शामिल हैं।
इसके लिए पाली और प्राकृत के महत्वपूर्ण ग्रंथों का भारतीय भाषाओं में अधिक अनुवाद, बौद्ध साहित्य का इतिहास, दर्शन, समाज और नैतिक चिंतन के स्रोत के रूप में अध्ययन, पूर्वोत्तर के लोकसाहित्य और जनजातीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण तथा वंचित समुदायों की आवाज को व्यापक भारतीय भाषाओं तक पहुंचाना आवश्यक है।
साथ ही भारतीय भाषाओं के बीच सीधे अनुवाद को बढ़ावा देना और महिलाओं तथा स्थानीय समुदायों द्वारा संरक्षित मौखिक ज्ञान को शोध का विषय बनाना भी जरूरी है। जिस समुदाय की भाषा और संस्कृति का अनुवाद किया जा रहा है, उस समुदाय की भागीदारी इस पूरी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होनी चाहिए।
निष्कर्ष
अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस हमें याद दिलाता है कि भाषाएं मनुष्य को अलग करने के साथ-साथ जोड़ने का भी काम करती हैं। अनुवाद इन दूरियों को कम करने वाला सांस्कृतिक सेतु है। पाली से आधुनिक भारतीय भाषाओं तक, बुद्ध की शिक्षाओं के संरक्षण से पूर्वोत्तर की लोकपरंपराओं तक, अहोम-ताई पांडुलिपियों से अरुणाचल के मौखिक साहित्य तक और आंबेडकर के बौद्ध चिंतन से डिजिटल ज्ञान-संसार तक अनुवाद भारतीय ज्ञान-परंपरा की निरंतरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।
भारत की भाषायी समृद्धि तभी व्यापक रूप से सामने आएगी, जब ज्ञान कुछ बड़ी भाषाओं तक सीमित न रहे, बल्कि एक भारतीय भाषा से दूसरी भारतीय भाषा में प्रवाहित हो। पूर्वोत्तर की आवाज देश के अन्य हिस्सों तक पहुंचे और देश की अन्य भाषाओं का ज्ञान पूर्वोत्तर की भाषाओं तक पहुंचे—यही वास्तविक सांस्कृतिक संवाद की दिशा है।
बुद्ध की करुणा, पाली साहित्य की ज्ञान-परंपरा, आंबेडकर का सामाजिक न्याय संबंधी चिंतन और भारत की लोक एवं जनजातीय स्मृतियां एक महत्वपूर्ण संदेश देती हैं—ज्ञान तभी अधिक सार्थक और लोकतांत्रिक बनता है, जब उसकी पहुंच समाज के व्यापक वर्गों तक हो। इसलिए अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस का सार केवल शब्दों का अनुवाद नहीं, बल्कि अनुभव, संस्कृति, इतिहास और मानवीय संवेदना के बीच संवाद स्थापित करना है।
(श्रीप्रकाश सिंह निमराजे, अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर)

