Edited by Sabir Khan, NIT:
लेखक: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
भारतीय शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक की भूमिका केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने तक सीमित नहीं है। शिक्षक बच्चों के सीखने, उनके व्यक्तित्व विकास और भविष्य के अवसरों को आकार देने वाला प्रमुख शैक्षिक संसाधन है। वहीं भारतीय सामाजिक जीवन में ‘मास्टर’ शिक्षक के लिए प्रचलित पारंपरिक संबोधन रहा है। ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में मास्टर को विद्यालय के शिक्षक के साथ-साथ समुदाय के शिक्षित प्रतिनिधि के रूप में भी देखा जाता रहा है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में हालांकि यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि शिक्षक अपने कार्य समय का कितना हिस्सा वास्तव में बच्चों को पढ़ाने, उनकी कठिनाइयों को समझने और सीखने में सहायता देने में लगा पा रहा है।
शिक्षक के नियमित शिक्षण कार्य के अतिरिक्त प्रशासनिक, सर्वेक्षण, डेटा प्रबंधन और विभिन्न सरकारी योजनाओं से जुड़े दायित्व लगातार बढ़े हैं। ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता पर चर्चा करते समय केवल शिक्षक की जवाबदेही पर बात करना पर्याप्त नहीं है। शिक्षक को पर्याप्त समय, संसाधन और अनुकूल कार्य-परिस्थितियां उपलब्ध कराना भी उतना ही आवश्यक है।
शिक्षक का मूल दायित्व और कानून
शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 शिक्षक के कर्तव्यों को स्पष्ट करता है। इनमें नियमित उपस्थिति, पाठ्यक्रम पूरा करना, प्रत्येक बच्चे की सीखने की क्षमता का आकलन करना तथा आवश्यकता के अनुसार अतिरिक्त शिक्षण देना शामिल है। अधिनियम की धारा 27 शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाए जाने पर सामान्य रोक लगाती है। हालांकि जनगणना, आपदा राहत तथा स्थानीय निकायों, विधानमंडल और संसद के चुनाव जैसे निर्धारित कार्य इसके अपवाद हैं।
इससे स्पष्ट होता है कि शिक्षक का प्राथमिक दायित्व शिक्षण है। प्रशासनिक आवश्यकताओं के कारण कुछ अतिरिक्त जिम्मेदारियां दी जा सकती हैं, लेकिन उन्हें शिक्षक की नियमित शैक्षिक भूमिका का विकल्प नहीं बनाया जाना चाहिए।
‘मास्टर’ से आधुनिक शिक्षक तक बदली भूमिका
भारतीय समाज में ‘मास्टर’ केवल विद्यालय तक सीमित पहचान नहीं रही है। गांवों में वह आवेदन लिखने, सरकारी सूचनाएं समझाने और लोगों को शिक्षित करने वाला व्यक्ति भी रहा है। इसलिए ‘मास्टर’ शब्द सामाजिक विश्वास से भी जुड़ा रहा है। आधुनिक समय में शिक्षक की भूमिका और अधिक व्यापक हुई है। डिजिटल रिपोर्टिंग, ऑनलाइन पोर्टल, छात्रवृत्ति, विभिन्न योजनाओं का डेटा, सर्वेक्षण और प्रशासनिक अभिलेख भी उसके कार्यक्षेत्र का हिस्सा बन गए हैं।
इन कार्यों की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन मूल प्रश्न यह है कि इनके कारण शिक्षक का कितना समय कक्षा से बाहर जा रहा है। यदि शिक्षक का महत्वपूर्ण कार्य समय प्रशासनिक जिम्मेदारियों में खर्च होता है तो शिक्षक और बच्चे के बीच प्रत्यक्ष संवाद का समय प्रभावित हो सकता है।
PM POSHAN में कार्य-विभाजन जरूरी
PM POSHAN योजना बच्चों के पोषण और विद्यालयी उपस्थिति से जुड़ी महत्वपूर्ण पहल है। योजना में बच्चों की संख्या के आधार पर cook-cum-helper की व्यवस्था का प्रावधान है। ऐसे में भोजन तैयार करने और वितरण की पूरी व्यवस्था का भार शिक्षक पर नहीं होना चाहिए।
शिक्षक भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता और बच्चों की सुरक्षा से संबंधित निगरानी कर सकता है, लेकिन भोजन तैयार करने, वितरण और उससे जुड़े विस्तृत प्रशासनिक कार्यों के कारण उसका नियमित शिक्षण प्रभावित नहीं होना चाहिए। जिस कार्य के लिए अलग मानव संसाधन निर्धारित है, उसका पूरा भार शिक्षक पर डालना शिक्षण समय के प्रभावी उपयोग के दृष्टिकोण से उचित नहीं माना जा सकता।
एकल-शिक्षक विद्यालय बड़ी चुनौती
UDISE+ 2023-24 के अनुसार देश में 1,10,971 एकल-शिक्षक विद्यालय थे, जिनमें करीब 39.94 लाख विद्यार्थी अध्ययनरत थे। मध्य प्रदेश में भी एकल-शिक्षक विद्यालयों की उल्लेखनीय संख्या दर्ज की गई है। शिक्षा मंत्रालय के Samagra Shiksha Project Approval Board के दस्तावेज के अनुसार 2023-24 में मध्य प्रदेश में प्राथमिक स्तर पर 9,620 और उच्च-प्राथमिक स्तर पर 2,590 एकल-शिक्षक विद्यालय दर्ज किए गए।
एकल-शिक्षक विद्यालय में एक शिक्षक को एक साथ अलग-अलग कक्षाओं, विषयों और सीखने के स्तरों को संभालना पड़ सकता है। ऐसे में यदि प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक दायित्व भी बढ़ जाएं तो प्रत्येक बच्चे को पर्याप्त व्यक्तिगत शैक्षिक सहायता देना कठिन हो जाता है।
हालांकि देश में एकल-शिक्षक विद्यालयों की संख्या में कमी भी दर्ज हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2022-23 में इनकी संख्या 1,18,190 थी, जो 2023-24 में घटकर 1,10,971 और 2024-25 में 1,04,125 रह गई। यह सुधार महत्वपूर्ण है, लेकिन अभी भी देश में एक लाख से अधिक एकल-शिक्षक विद्यालय होना इस चुनौती की गंभीरता को दर्शाता है। इसलिए केवल राष्ट्रीय औसत शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात के बजाय प्रत्येक विद्यालय की वास्तविक स्थिति पर ध्यान देना जरूरी है।
सरकारी विद्यालय और वंचित वर्ग
भारत में सरकारी विद्यालय शिक्षा के सार्वभौमिकरण का प्रमुख माध्यम रहे हैं। आर्थिक रूप से कमजोर, सामाजिक रूप से वंचित और दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों के लिए इन विद्यालयों की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में Socially and Economically Disadvantaged Groups (SEDGs) के लिए शिक्षा में असमानताओं को कम करने और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है।
इसलिए सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता केवल शिक्षा विभाग या विद्यालय प्रशासन का विषय नहीं है। यह सामाजिक अवसर, समानता और बच्चों के भविष्य से भी जुड़ा प्रश्न है।
नामांकन नहीं, सीखने का परिणाम महत्वपूर्ण
किसी बच्चे का विद्यालय में नामांकित होना या नियमित रूप से उपस्थित होना शिक्षा की सफलता का अंतिम पैमाना नहीं हो सकता। वास्तविक प्रश्न यह है कि बच्चा अपनी कक्षा के अनुरूप पढ़ना, लिखना, गणितीय अवधारणाओं को समझना और समस्याओं का समाधान करना कितना सीख रहा है।
ASER 2024 ग्रामीण भारत में बच्चों की बुनियादी पढ़ने और गणितीय क्षमताओं का घरेलू सर्वेक्षण के माध्यम से आकलन करता है। मध्य प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों के आंकड़े बुनियादी सीखने की क्षमताओं को मजबूत करने की आवश्यकता की ओर संकेत करते हैं। हालांकि ASER विद्यालय-आधारित निरीक्षण नहीं, बल्कि ग्रामीण परिवारों पर आधारित सर्वेक्षण है। इसलिए इसे सरकारी विद्यालयों की पूरी व्यवस्था का अकेला मूल्यांकन नहीं माना जा सकता, लेकिन यह शिक्षा के वास्तविक परिणामों पर महत्वपूर्ण सवाल जरूर उठाता है।
केवल शिक्षक को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं
जब सीखने के परिणाम अपेक्षित स्तर पर नहीं होते तो शिक्षक की जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन बच्चे के सीखने की प्रक्रिया अनेक कारकों से प्रभावित होती है। शिक्षक की संख्या, कक्षा का आकार, बच्चों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, भाषा, घर का शैक्षिक वातावरण, शिक्षण संसाधन, उपस्थिति और प्रशासनिक दायित्व—सभी इसकी भूमिका निभाते हैं।
इसलिए शिक्षक की जवाबदेही के साथ उसे काम करने की उचित परिस्थितियां उपलब्ध कराना भी आवश्यक है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा तभी सार्थक होगी जब शिक्षक को पर्याप्त शिक्षण समय, आवश्यक संसाधन और उपयुक्त कक्षा व्यवस्था मिले।
समान स्कूल प्रणाली पर फिर विचार की जरूरत
भारत में समान स्कूल प्रणाली की अवधारणा नई नहीं है। शिक्षा आयोग, 1964-66 यानी कोठारी आयोग ने Common School System और Neighbourhood School की अवधारणा को सामाजिक समानता और एकीकरण के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना था।
आज इस विचार को नए संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। समान स्कूल प्रणाली का अर्थ यह नहीं कि देश के सभी विद्यालयों की स्थानीय भाषा, संस्कृति या शिक्षण पद्धति एक जैसी कर दी जाए। इसका व्यापक अर्थ यह हो सकता है कि प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षक, सुरक्षित वातावरण, आवश्यक संसाधन और समान न्यूनतम शैक्षिक अवसर उपलब्ध हों।
भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में साझा शैक्षिक आधार के साथ स्थानीय भाषा, इतिहास, संस्कृति और पर्यावरण को भी पाठ्यक्रम में पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए। साझा मानक और स्थानीय विविधता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं।
शिक्षक का समय भी शिक्षा का संसाधन
शिक्षा बजट में भवन, पुस्तकें, प्रयोगशालाएं, डिजिटल उपकरण और शिक्षक नियुक्ति जैसे संसाधनों की गणना की जाती है। लेकिन शिक्षक का बच्चों के साथ बिताया हुआ समय भी उतना ही महत्वपूर्ण शैक्षिक संसाधन है।
इसलिए शिक्षा व्यवस्था के सामने केवल यह प्रश्न नहीं होना चाहिए कि विद्यालय में कितने शिक्षक हैं, बल्कि यह भी पूछा जाना चाहिए कि शिक्षक के पास वास्तव में पढ़ाने के लिए कितना समय उपलब्ध है। शिक्षण समय की रक्षा करना शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
सुधार के लिए जरूरी कदम
शिक्षा व्यवस्था में कुछ प्रमुख सुधारों पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है। शिक्षक के नियमित कक्षा समय को अनावश्यक प्रशासनिक कार्यों से मुक्त किया जाए। विद्यालय स्तर पर शिक्षक और विद्यार्थियों की वास्तविक संख्या के आधार पर शिक्षक उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। एकल-शिक्षक विद्यालयों में आवश्यकता के अनुसार अतिरिक्त शिक्षक उपलब्ध कराए जाएं।
PM POSHAN, सर्वेक्षण, डेटा प्रबंधन और अन्य सरकारी योजनाओं में शिक्षक की भूमिका स्पष्ट और सीमित हो। शिक्षा की सफलता का आकलन केवल नामांकन और उपस्थिति से नहीं, बल्कि पढ़ने, लिखने, गणित और समझने की वास्तविक क्षमता से किया जाए।
साथ ही सरकारी विद्यालयों में संसाधनों और गुणवत्ता को मजबूत किया जाए, ताकि सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। देशभर में समान न्यूनतम शैक्षिक मानकों के साथ स्थानीय भाषा, संस्कृति और सामाजिक संदर्भ को पाठ्यक्रम में उचित स्थान दिया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
‘मास्टर’ और ‘शिक्षक’ दो विरोधी शब्द नहीं हैं। ‘मास्टर’ भारतीय समाज में शिक्षक की पारंपरिक सामाजिक पहचान है, जबकि ‘शिक्षक’ उसकी आधुनिक पेशेवर भूमिका को अधिक स्पष्ट करता है। समस्या तब पैदा होती है जब शिक्षण के अलावा इतने दायित्व शिक्षक पर डाल दिए जाएं कि बच्चों के साथ उसका मूल शैक्षिक समय ही कम हो जाए।
भारत की शिक्षा चुनौती केवल विद्यालयों की संख्या बढ़ाने या नामांकन बढ़ाने की नहीं है। वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि हर बच्चे को ऐसा विद्यालय मिले जहां पर्याप्त शिक्षक हों, शिक्षक के पास पढ़ाने का पर्याप्त समय हो और बच्चे की वास्तविक सीखने की क्षमता को शिक्षा की सफलता का केंद्र माना जाए।
एकल-शिक्षक विद्यालयों के आंकड़े, सीखने से जुड़े सर्वेक्षण और शिक्षा संबंधी नीतियां इस बात की ओर संकेत करते हैं कि शिक्षक की उपलब्धता को केवल मानव संसाधन की संख्या के रूप में नहीं, बल्कि बच्चे को मिलने वाले गुणवत्तापूर्ण शिक्षण समय के रूप में भी देखा जाना चाहिए। ‘मास्टर’ समाज का दिया हुआ संबोधन हो सकता है, लेकिन ‘शिक्षक’ बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी है। शिक्षा व्यवस्था का लक्ष्य ऐसा होना चाहिए जिसमें शिक्षक को पढ़ाने का समय, बच्चे को सीखने का अवसर, विद्यालय को आवश्यक संसाधन और हर बच्चे को उसकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से परे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का समान अवसर मिले।
(श्रीप्रकाश सिंह निमराजे, अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर)

