साबिर खान, चंडीगढ़/गुरुग्राम/नई दिल्ली, NIT:

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने उल्लावास गांव के अनुसूचित जाति (दलित) और बीपीएल परिवारों को बड़ी राहत देते हुए हरिजन महात्मा गांधी ग्रामीण बस्ती योजना के तहत आरक्षित भूमि पर यथास्थिति (स्टेटस क्वो) बनाए रखने का आदेश दिया है। अदालत ने इस मामले में हरियाणा सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए संबंधित विभागों को नोटिस जारी किया है।
न्यायमूर्ति अलका सरिन और न्यायमूर्ति रमेश चंदर डिमरी की खंडपीठ ने 21 मई 2026 को ग्रामीणों की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता निशा तंवर और एच.एन. साहू ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार की 1 फरवरी 2008 की नीति के तहत पात्र अनुसूचित जाति और बीपीएल परिवारों को 100 वर्ग गज के मुफ्त आवासीय प्लॉट देने का प्रावधान है, जिसमें सभी याचिकाकर्ता पात्र हैं।
याचिका में आरोप लगाया गया कि वर्ष 2014 में गांव की 113 कनाल 16 मरला पंचायत भूमि को कथित एक्सचेंज डीड के जरिए एक निजी बिल्डर—कमांडर रियल्टर्स प्राइवेट लिमिटेड—को हस्तांतरित कर दिया गया। इसी भूमि में से 2 एकड़ हिस्सा हरिजन महात्मा गांधी ग्रामीण बस्ती योजना के तहत प्लॉट आवंटन के लिए आरक्षित था।
अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए राज्य सरकार (प्रतिवादी संख्या 1 से 5) को नोटिस जारी किया, जिसे डिप्टी एडवोकेट जनरल सौरभ मागो ने स्वीकार करते हुए जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। वहीं, ग्राम पंचायत (प्रतिवादी संख्या 6) को भी नोटिस जारी कर अगली सुनवाई 17 सितंबर 2026 निर्धारित की गई है।
मिलीभगत के आरोप, कई अधिकारी घिर सकते हैं
सूत्रों के अनुसार नगर निगम, पूर्व पंचायत और बिल्डर के बीच कथित मिलीभगत से आरक्षित जमीन को हड़पने की तैयारी की जा रही थी। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब कई अधिकारियों पर कार्रवाई की तलवार लटक सकती है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि पहले जारी स्टेटस क्वो आदेश भी बिल्डर के दबाव में प्रभावित था, जिस पर अदालत ने सख्त रुख अपनाया है।
ग्रामीणों में खुशी, प्लॉट मिलने की उम्मीद बढ़ी
अदालत के स्पष्ट आदेश के बाद गांव के सैकड़ों दलित और गरीब परिवारों में राहत और खुशी का माहौल है। माना जा रहा है कि अगली सुनवाई से पहले प्रशासन पात्र याचिकाकर्ताओं को प्लॉट आवंटन की प्रक्रिया शुरू कर सकता है। हालांकि, यह भी संभावना जताई जा रही है कि केवल याचिका दायर करने वाले परिवारों को ही प्राथमिकता मिले।
यह फैसला लंबे समय से अपने हक के इंतजार में बैठे जरूरतमंद परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बनकर सामने आया है।
