नरेन्द्र कुमार, ब्यूरो चीफ, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:

कहा जाता है कि किसी भी फ़साद के पीछे सबसे पहला हाथ सरकार का होता है, अब इस बात को सत्यापित करने के लिए जहाँ जहाँ दंगा फ़साद हुए हैं वहाँ के प्रत्यक्षदर्शियों के अनुभव इस बात को रेखांकित करने के लिए काफ़ी हो सकते हैं। शिंदे सरकार मे देवेंद्र फडणवीस के बाद दूसरे नंबर की हैसियत रखने वाले मंत्री गिरीश महाजन के अपने गृह नगर जामनेर में कानून व्यवस्था का हाल दिन प्रतिदिन बेहद खराब होता जा रहा है जिसके लिए काफ़ी हद तक खुद पुलिस का रवैया जिम्मेदार है। जानकारी के मुताबिक शहर के पखवाड़ा बाजार इलाके मे ताश के पत्ते के अड्डे पर कुछ झगड़ा हो गया और झगड़े ने व्यापक रूप धारण कर लिया। मौके पर पुलिस पहुँची दोनों पार्टियों को थाने लाया गया जहां संदिग्धों को हिरासत में लेकर आगे की कार्रवाई करने के बजाये थाने के सामने आते ही पुलिस ऐक्शन मूड़ में आ गई। पुलिस स्टेशन के बाहर सड़क पर इकट्ठा भीड़ को तितरबितर करने के चक्कर में जो दिखाई दिया उसपर लाठियां भांजने लगी। पुलिस प्रभारी किरण शिंदे के नेतृत्व में महकमा अपना काम बड़ी ईमानदारी से कर रहा था दूसरी ओर हुआ यह कि इस मामले को लेकर सोशल मीडिया के जरिये या फिर मौखिक रूप से शहर में फैलाई जा रही अफ़वाहें गैर जिम्मेदार तरीके से नफ़रत और तनाव का मार्केटिंग कर रही थीं। यह पहला मामला नहीं है जिसमें ऐसा हुआ है इसके पहले कई बार इसी प्रकार से दो गुटों के बीच के सामान्य झगड़ों को पुलिस ने अपनी ओर से ऐक्शन स्टंट सिन क्रिएट कर रोचक बना दिया है। निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और जनसंवाद पर विश्वास ना रखकर डंडे के दम पर जामनेर को भाईचारा विहीन शहर बनाने के लिए पुलिस इतनी मेहनत क्यों कर रही है यह सवाल बुद्धिजीवियों की ओर से पूछा जाने लगा है। किसी जमाने में त्योहारों के उपलक्ष्य में पुलिस प्रशासन की ओर से स्थानीय स्तर पर शांतता कमेटियों की बैठकों का आयोजन हुआ करता था। थाने के दरोगा सर्वदलीय नेताओं और सामाजिक संगठनों के माध्यम से प्रतिनिधिक रूप से समाज के हर एक नागरिक से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से मुखातिब हुआ करते थे इससे सूचनाओं की इनकमिंग बढ़कर प्रशासन को कानून व्यवस्था सुचारू रखने में मदद होती थी लेकिन आज इसके विपरीत स्थिति देखने को मिल रही है।
