नरेंद्र कुमार, जामनेर/जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:

पांच साल जामनेर के हिस्से में जो राजयोग आया उसके दौरान बिना किसी तकनीकी ज्ञान और डिग्री के कई टिचकुले ठेकेदार बड़े बड़े डेवलपर्स बन गए, करोड़ों रुपया कमाया गया और उतने ही रुपयों की मशीनरीज खरीदी गई जो आज आम नागरिकों के लिए परेशानी का सबब बन चुकी हैं. शहर में इन मशीनरीज ने उधम मचा रखा है. कहीं कोई बुलडोजर, डंपर, पोकलैंड सड़क पर परिचालन के बीच बिजली के खंभों को टक्कर मार देता है और निकल लेता है. गिरिजा कॉलोनी में किसी जेसीबी ने खड़े खंभे को फावड़ा मार दिया जिससे खंभा इस कदर टेढ़ा हो गया की अब वह जरा सी हवा आने पर पेड़ के पत्ते की तरह सर्राता है. पुराने शहर में इसी प्रकार से रात बेरात अवैध रेत ढुलाई के ट्रक्स अंधाधुंध तरीके से गली मोहल्ले से दौड़ाए जाते हैं. दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे मामले को लेकर हादसों के कारण MSEB का जो नुकसान हो रहा है उस पर बिजली बोर्ड की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं है. 50 हजार की आबादी वाले जामनेर में अगर सर्वे करें तो पता चलेगा कि कुल खंभों में से 30 फीसदी धराशाही होने की कगार पर हैं जिन्हें मानसून के मुहाने बदला जाना आवश्यक है. 2017 में जब NCP की हल्लाबोल यात्रा शहर पधारी थी तब स्टेज के पीछे खड़े अधमरे खंभे का हवाला देकर वर्तमान उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने कहा था कि “ज्यांना टेपाडलेला खांब नीट करता येईना ते काय विकास करणार” ( जो लोग झुका हुआ खंभा सीधा नहीं कर सकते वो विकास क्या करेंगे), पांच साल बीतने के बाद भी झुका हुआ खंभा ठीक वैसा ही खड़ा है जैसा तब था. अभी तो शहर के दर्जनों खंभों की कमर बुलडोजर से तोड़कर जनता की जान को खतरे में डाला जा रहा है. शहर का टैक्स पेयर्स नागरिक भूमिगत पावर केबल की महंगी मांग के बदले बस इतना चाहता है कि किसी भी समय धड़ाम से जमीन पर गिरने की चाह रखने वाले तमाम बिजली पोल की जगह नए पोल लगाए जाएं. बुलडोजर तथा अन्य भारी भरकम वाहनों द्वारा अनुशासनहीनता से किए जा रहे हादसों के लिए संबंधियों को नापा जाए.
