मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, बुरहानपुर (मप्र), NIT:

खंडवा संसदीय क्षेत्र के लोकप्रिय सांसद, भाजपा के कद्दावर नेता, पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष एवं निमाड़ की नैया नंदू भैया के नाम से प्रसिद्ध स्वर्गीय सांसद नंदकुमार सिंह चौहान के निधन के बाद रिक्त हुई सीट पर इस माह की 30 तारीख को चुनाव होने वाला है। भाजपा ने स्वर्गीय सांसद नंदकुमार सिंह चौहान के वारिस,युवा पुत्र एवं टिकट के प्रबल दावेदार हर्षवर्धन सिंह चौहान को नजरअंदाज करके दिवंगत सांसद के करीबी एवं पावर लूम फेडरेशन के पूर्व अध्यक्ष ज्ञानेश्वर पाटिल को पार्टीका प्रत्याशी बनाया है। खंडवा संसदीय क्षेत्र की सीट हमेशा से हाई प्रोफाइल रही है और इस उप चुनाव में भी हाई प्रोफाइल है। भाजपा की ओर से श्री ज्ञानेश्वर पाटिल का नाम घोषित होने से पूर्व इस सीट पर पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं भाजपा की प्रदेश प्रवक्ता श्रीमती अर्चना चिटनीस दीदी सांसद पुत्र हर्षवर्धन सिंह चौहान भी दावेदार थे। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के बयानात से ऐसा माना जा रहा था कि दिवंगत सांसद के पुत्र हर्षवर्धन सिंह चौहान को ही टिकट मिलेगा। और भाजपा सहानुभूति लहर का लाभ प्राप्त करेगी, लेकिन राजनीति में कब क्या हो जाए, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता है। दिवंगत सांसद के जन्मोत्सव कार्यक्रम में पधारे मध्य प्रदेश के मुखिया ने दिवंगत सांसद के परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदनाएं प्रकट करते हुए उनके पुत्र को टिकट देने का इशारा शाहपुर आगमन के समय किया था लेकिन कुछ समय बाद ही खंडवा आगमन के समय मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने श्री ज्ञानेश्वर पाटिल के सर पर आशीर्वाद का हाथ रख कर यह इशारा किया था कि टिकट श्री ज्ञानेश्वर पाटिल के पाले में गया। इस बीच सियासी नौटंकी और दिखावे के तहत सस्पेंस को बरकरार रखते हुए सारी कार्रवाई होती रही, क्योंकि पार्टी को स्वर्गीय सांसद के पुत्र और उनकी लॉबी की ताकत का अंदाजा पहले से ही था,इसलिए इसकी विधिवत घोषणा के पूर्व ऐसा सस्पेंस और सन्नाटा छाया रहा कि मध्यरात्रि के बाद लगभग 2:00 बजे इसकी घोषणा करनी पड़ी और अगली सुबह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की मौजूदगी में नामांकन भी प्रस्तुत कर दिया गया। पूर्व कैबिनेट मंत्री ने अपने आप को समय अनुकूल एडजस्ट कर लिया, लेकिन सांसद पुत्र की नाराजगी देर तक जारी रही। माना जा रहा है कि भाजपा की कद्दावर महिला नेत्री के इशारे पर भाजपा हाईकमान ने पूर्व नियोजित तरीके से इसकी स्क्रिप्ट लिखी थी। लोकसभा उप निर्वाचन की घोषणा से पहले राजनीतिक अस्थिरता थी और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भी खतरा मंडरा रहा था,लेकिन प्रदेश के विधानसभा और लोकसभा के उप चुनाव को देखते हुए भाजपा ने रिस्क नहीं लेते हुए नेतृत्व परिवर्तन जैसे मुद्दों को टाल दिया। आज भी मध्य प्रदेश की सरकार के मुखिया का भविष्य दांव पर लगा है। इस हाई प्रोफाइल सीट की कमान भाजपा की ओर से मध्य प्रदेश सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष एवं सांसद विष्णु दत्त शर्मा संभाल रहे हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष 10 और 11 अक्टूबर को दो दिवसीय दौरे पर बुरहानपुर रहे और पार्टी कार्यकर्ताओं में जान फूंकने का काम करने का साथ सांसद के पुत्र को मनाने का प्रयास भी करते रहे, जिसका परिणाम यह हुआ के दिवंगत सांसद के पुत्र को प्रकट होना पड़ा और अपनी बात पार्टी के प्लेटफार्म से रखना पड़ी। वही मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्रचार में स्पष्ट शब्दों में बयान दे चुके हैं कि मैं खुद इलेक्शन लड़ रहा हूं और पार्टी का जो उम्मीदवार है, वह प्रतीकात्मक रूप से खड़ा है। मध्य प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में सियासी पंडितों का कहना है कि प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक अस्थिरता में खुद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर खतरा मंडरा रहा है और प्रदेश के उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवारों की जीत मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी को सलामत रखेगी। अगर उपचुनाव में भाजपा को विजय प्राप्त नही होती है तो मध्यप्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। चूंकि मध्यप्रदेश में सत्ताधारी दल के रूप में भाजपा विराजमान है इस लिहाज से सत्ता के बल पर भाजपा संगठन और उसके सहायक संगठन, प्रकोष्ठ के समस्त पदाधिकारियों का जत्था खंडवा संसदीय क्षेत्र में डेरा डालकर भाजपा को सफलता दिलाने में हर संभव प्रयास कर रहा है साथ ही अपनी धर्मवादी नीतियों को इस इलेक्शन अपनाकर और अपनी धर्मवादी विचार धाराओं के तहत कन्याओं का पूजन जैसे प्रोग्राम आयोजित करके सफलता की ओर बढ़ने का प्रयास किया जा रहा है। भाजपा की ओर से खंडवा संसदीय क्षेत्र में विगत 3 माह से प्रदेश के छोटे बड़े राजनीतिक नेताओं ने भ्रमण करके भाजपा के पक्ष में जमीन तैयार करने की कोशिश की है, लेकिन टिकट ना मिलने से भी कुछ लोग नाराज हुए बताए जा रहे हैं, जो अंदर से भाजपा को भितरघात करके नुकसान पहुंचा सकते हैं। भाजपा की एक दावेदार और पूर्व कैबिनेट मंत्री आम सभाओं के माध्यम से अपना दर्द छलका रही हैं। झांसी की रानी बनकर भाजपा की कद्दावर महिला नेत्री, जहां अपनी पूरी ताकत भाजपा के पक्ष में झोंक रही है। क्योंकि 2 साल बाद अगर पार्टी आदेश करती है तो उन्हें फिर जनता के बीच में जाना है और चुनाव लड़ना है। अगर उपचुनाव में गड्ढा होता है तो इसका प्रभाव 2 साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव पर भी पड़ेगा। इस के विपरीत कांग्रेस पार्टी में भी दो की लड़ाई में तीसरे का भला वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए कांग्रेस आला कमान ने तीसरे उम्मीदवार ठाकुर राज नारायण सिंह पुरनी को टिकट देकर दो दावेदार अरुण यादव और शेरा भैया को निपटा कर खामोशी में बहुत सारे संदेश दिए हैं,है। कांग्रेस से टिकट के दोनों दावेदार अपने राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर इस उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में अपनी ताकत झोंक रहे हैं और अपनी एकता प्रदर्शित कर रहे हैं। प्रचार में कांग्रेस के उम्मीदवार के पक्ष में आज जो एकता दिखाई दे रही है उस एकता को बरकरार रखते हुए दोनों पक्षों के लोग और नेता पूरी ताकत से कांग्रेस उम्मीदवार को एक और एक ग्यारह की कहावत के बराबर की ताकत मिलना मानी जा रही है। कांग्रेस द्वारा आयोजित राजनीतिक आम सभाओं में कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष का दर्द कहीं ना कहीं छलकता नजर आ रहा है, जिसे राजनीतिक सूझबूझ रखने वाले लोग अपने तौर पर महसूस कर रहे हैं कि टिकट के मामले में कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के साथ नाइंसाफी हुई है। वही निर्दलीय विधायक ने भी उनकी पत्नी की दावेदारी करवा कर कांग्रेस के प्रबल दावेदार एवं प्रदेश अध्यक्ष की ताबूत में आखिरी कील ठोकने का काम भी किया है या साजिश के तहत कराया गया है । जन चर्चाओं में ऐसा माना जा रहा है कि कांग्रेस के लिए अब भी सुधारने का और एकता प्रदर्शित करने का मौक़ा और समय दोनों है।अगर वह और उसके नेता अपने राजनीतिक मतभेदों को बुलाकर कांग्रेस उम्मीदवार के लिए जी जान से मेहनत कर लें और पिछले विधानसभा उप चुनाव में भाजपा को पराजित करने की, जो रणनीति बनाई जा कर कांग्रेस को सफलता मिली थी अगर वही नीति यहां भी अपनाई जाए तो कांग्रेस खंडवा संसद क्षेत्र में अपनी सीट को भाजपा से छीन सकने में सक्षम हो सकती है और अपना कब्ज़ा दोबारा बरकरार रख सकती है। कांग्रेस को होशमंदी के साथ कदम उठाने की जरूरत है। प्रदेश के वर्तमान विधानसभा एवं लोकसभा उपचुनाव में जिस तरह मध्य प्रदेश के मुखिया का राजनीतिक भविष्य तय करेगा, उसी तरह यह उपचुनाव कांग्रेस का भविष्य भी तय कर सकता है और यह कांग्रेस के लिए गनीमत वाला मौका है,जो कभी नहीं आएगा। क्योंकि कांग्रेस आलाकमान भी दो पुराने लड़ने वालों से तंग आ चुकी है और उसमें तीसरे को अवसर दिया है जिसको सफलता दिलाना ही कांग्रेस के पास एकमात्र विकल्प है। इस चुनाव में भाजपा ने ओबीसी कार्ड खेला है वही कांग्रेस में ठाकुर कार्ड का सहारा लिया है लेकिन इन सबके बीच में इस इलेक्शन में बुनियादी मुद्दे गायब है। वहीं अल्पसंख्यक मतदाताओं की बड़ी भूमिका रहेगी जिसे बैलेंसिंग वोट भी कहा जा सकता है और अगर मिल्लत जाग गई तो फिर कांग्रेस उम्मीदवार के लिए बल्ले बल्ले हो सकती है। फिलहाल जनता खामोश है और वह खामोशी में 30 तारीख को अपनी भूमिका का निर्वहन करेगी और वह जिसको चाहेगी उसको ताज पहना देगी और उसे स्वीकार करना पड़ेगा।
