अशफाक कायमखानी, जयपुर, NIT;
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के रहने वाले कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलेट के आव्हान पर राजस्थान में मध्यप्रदेश मे किसानों के पुलिस गोली से मारे जाने के बाद तेजी से उभरे किसान आंदोलन के बाद प्रदेश के किसानों के कर्ज माफी को लेकर 14 जून को जिला स्तर पर धरना प्रदर्शन करने का कमोबेश नाटक तो किया गया, जिसमें भी सचिन पायलेट खूद अपने स्तर पर जयपुर में भीड़ ना जुटती देख वह सीकर की सभा में जाकर किसान हितेषी होने का दिखावा कर आये। ठीक उसी दिन जालोर के रानीवाड़ा के गांव मेड़क कल्ला में गुलाबाराम भील (किसान) ने ज्यादा कर्ज होने पर मानसिक रूप से पीड़ित होकर आत्महत्या कर ली थी। लेकिन उसके परीवार का हाल जानने के लिये किसी को फुर्सत तक नहीं है।
पिछले कुछ सालों से किसान पूरी तरह पिसता चला जा रहा है। लेकिन कोई भी सियासी दल सत्ता में होने के समय सच्चे मन से उनके उत्थान के लिये काम करने की बजाय केवल दिखावा करना ही अधिक बेहतर समझते आये हैं। वहीं प्रदेश में स्वयं किसानों के पास उनका कोई मजबूत संगठन अभी तक नही बन पाया है जो केवल और केवल ईमानदारी के साथ उनके हक के लिये ही काम करे।
भारत भर के किसानों की बदकिस्मती है कि आज के समय उनकी मजबूत व असल लीडरशिप ना किसी सियासी दल में है और ना ही किसी तरह का मजबूत किसान संघ भारतीय स्तर का उनके पास है, जो किसान हित में सरकार पर दवाब बनाकर उससे किसान हित में फैसले करवा सके। 1990 के बाद तो असल किसान लीडरशिप पूरे भारत में सभी दलों में खत्म सी हो चली है। उनकी जगह व्यापारी किसान लीडरशिप के ले लेने से आज किसान के बजाय कॉरपोरेट घरानों के हित बजट बनाते समय पुरी तरह देखा जाने लगा है।
राजस्थान में एक समय था जब कुम्भाराम आर्य व शिवनाथ सिंह गिल अपने दल में किसान हित को हर पॉलिसी बनाते समय देखा करते थे। तो दोलतराम सारण व नाथूराम मिर्धा विपक्ष में रहकर भी किसान हित के लिये हर दम चौकस रहते थे। अफसोस आज सरकार में पॉलिसी व बजट बनाते समय किसान की कोई बात ना होकर केवल उसके बाद नेताओं के भाषणों में ही किसान की बात होती है। आज सियासी दलों के नेताओं को लाल व हरी मिर्च के पौधों का पता नहीं तो गेहूं व जो के पौधों में वो अंतर नही कर सकते। खेजड़ी की उपयोगिता वो नहीं जानते तो नीम-आडू के गुणों से वो वाकिफ नही।
कुल मिलाकर यह है कि जिन्दा किसान का लाख रुपयों का कर्जा सरकार माफ करने को तैयार नही है और उसी किसान के पुलिस गोली से मरने पर एक करोड़ सरकार मुवावजा देने को तत्पर है और उसी किसान के नक्सली बनने के बाद वो आत्म समर्परण करता है तो पच्चीस लाख रुपया उस किसान को मिलता है। क्यों ना उसको किसान रहते ही उसका कर्ज माफ कर दिया जाये? दूसरी तरफ बीबीसी न्यूज के अनुसार मध्यप्रदेश में पिछले सात दिन में कर्ज में डूबे सात किसानों ने आत्महत्या कर ली है।
