कासिम खलील, ब्यूरो चीफ, बुलढाणा (महाराष्ट्र), NIT:

5 महीने में 13 सौ किलोमीटर का पैदल सफर करते हुए यवतमाल जिले के टीपेश्वर अभयारण्य से बाहर निकला 3 वर्षीय “सी1” नामक बाघ ने बुलढाणा जिले के “ज्ञानगंगा अभयारण्य” में प्रवेश किया और 15 दिन इस अभयारण्य में गुज़ारने के बाद अपने सुरक्षित आधिवास या फिर बाघिन की तलाश में ये बाघ अजंता पर्वतीय श्रृंखला से होते हुए आगे पश्चिम की दिशा में बढते चले जाने की गुप्त जानकारी मिली है। ज्ञानगंगा अभयारण्य को छोड़कर बाघ के चले जाने से अकोला वन्यजीव विभाग के अधिकारियों में निराशा छा गई जबकि इस अभयारण्य में कार्यरत कुछ कामचोर कर्मी खुश हो गए हैं।
यवतमाल जिले के “टीपेश्वर अभयारण्य” में “टी1” नामक एक बाघिन ने 3 शावकों को जन्म दिया था, इन शावकों को क्रमशः सी1, सी2 और सी3 नाम दिए गए थे। बचपन से ही सी1 बाघ खुले तौर पर किसी के सामने नहीं आता था, वह अपने आपको झाड़ियों में छिपाए रखता था अर्थात वह बडा ही शर्मिला था। ढाई साल की उम्र में यह बाघ अपनी माँ को छोड़कर तेलंगाना राज्य के आदिलाबाद के जंगल में गया फिर महाराष्ट्र में लौट आया और नांदेड़, हिंगोली, परभणी और वाशिम से होते हुए बुलढाणा जिले में दाखिल होने के बाद 1 दिसेंबर की रात में “ज्ञानगंगा अभयारण्य” में पहुंच गया। रेडियो कॉलर लगे इस बाघ का पीछा वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया की टीम निरंतर करती आ रही है। करीब 5 महीनों में 13 सौ किलोमीटर की यात्रा करने के बाद अब ऐसा लग रहा था कि ये बाघ “ज्ञानगंगा अभयारण्य” को ही अपना आधिवास क्षेत्र बना लेगा किंतु लगभग 15 दिनों तक अभयारण्य में घूमने के बाद अंत में बाघ अभयारण्य से बोरखेड होते हुए बुलढाणा के करीब से गुज़रकर राजुर घाट में पहुंच गया और बुलढाणा-मलकापुर मार्ग को लांघते हुए अजंता पर्वत श्रृंखला से होते हुए आगे ही बढ़ता जा रहा है। अब ये बाघ विदर्भ – मराठवाड़ा और खानदेश की सीमा से होते हुए गुज़र रहा है.बता दे कि, अजंता की पहाडियां औरंगाबाद, बुलढाणा, जालना और जलगाँव खानदेश इन जिलों तक फैली हुई है। औरंगाबाद जिले में कन्नड के पास “गौताला औट्रमघाट अभयारण्य” है। सी1 बाघ के बढ़ते हुए कदमों को देखकर ये अनुमान लगाया जा रहा है कि अब वह “गौताला अभयारण्य” की दिशा में जा सकता हैं. हालांकि ये कयास लगाया जा रहा है कि यह बाघ ज्ञानगंगा अभयारण्य की तरफ वापस भी आ सकता है।
अब तक 15 सौ किलोमीटर का सफर
जून माह में सी1 बाघ ने अपनी जन्मस्थली “टिपेश्वर अभयारण्य” को छोड़ दिया था तब वह ढाई साल का था। विदर्भ से तेलंगाना फिर मराठवाड़ा होते हुए विदर्भ के बुलढाणा जिला स्थित “ज्ञानगंगा अभयारण्य” पंहुचने तक करीब 13 सौ किलोमीटर का ये सफर इस बाघ ने 5 माह में तय किया था। 15 दिन ज्ञानगंगा अभयारण्य में इस बाघ ने खूब गश्त लगाया और फिर अजंता पहाड़ी सिलसिले से आगे चला जा रहा है। इस बाघ ने अब तक करीब 15 सौ किलोमीटर की यात्रा करने का अनुमान लगाया जा रहा है, ये सफर अपने टेरोटरी के लिए कम किंतु बाघिन की खोज में जारी होने की बात जानकार बता रहे हैं।
बोरखेड के मार्ग पर जमाया था डेरा
बुलढाणा तहसील अंतर्गत का ग्राम बोरखेड ज्ञानगंगा अभ्यारणय से सटा हुआ है। इस गांव को जाने वाला मार्ग इसी अभयारण्य से हो कर गुज़रता है। 13 दिसेंबर को दोपहर के समय यह बाघ मार्ग पर आकर बैठ गया था जिसे देख कर कुछ बाइक चालक घबरा गए थे। काफी देर तक इस मार्ग पर अपना डेरा जमाकर रखने के बाद बाघ जंगल में चला गया था।
बुलढाणा जिले के ज्ञानगंगा अभयारण्य में करीब 15 दिन आधिवास करने के बाद सी1 बाघ अभयारण्य से बाहर निकल गया है जिस का पीछा डब्ल्यूआई की टीम कर रही है। यह बाघ सबअडल्ट होने के कारण वह बाघिन की तलाश में है: मनोज कुमार खैरनार, डीएफओ, वन्यजीव विभाग, अकोला।
