इटवा में नागरिकता संशोधन बिल के विरोध में कई सामाजिक संगठनों ने विरोध प्रदर्शन कर राष्ट्रपति के नाम एसडीएम को सौंपा ज्ञापन | New India Times

साबिर खान, सिद्धार्थनगर/लखनऊ (यूपी), NIT:

इटवा में नागरिकता संशोधन बिल के विरोध में कई सामाजिक संगठनों ने विरोध प्रदर्शन कर राष्ट्रपति के नाम एसडीएम को सौंपा ज्ञापन | New India Times

सिद्धार्थनगर जिला के इटवा परिसर के कई सामाजिक संगठनों ने एनआरसी और नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर राष्ट्रपति के नाम इटवा एसडीएम को एक ज्ञापन सौंपा।

इस अवसर पर वक्ताओं ने व्यापक जन विरोध के बावजूद विवादास्पद और विभाजनकारी नागरिकता संशोधन विधेयक को बहुमत के नशे में लोकसभा और राज्यसभा से पारित कराए जाने को सत्ता अहंकार और जन भावनाओं का निरादर बताया। वक्ताओं ने कहा कि देश की बहुसंख्यक जनता इस विधेयक के खिलाफ है। गृह मंत्री ने लोकसभा और राज्यसभा में विधेयक पेश करते हुए गलत तथ्य प्रस्तुत किया और इस तरह सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाई। अमित शाह ने कहा कि पड़ोसी देशों से धार्मिक उत्पीड़न के चलते आए लाखों-करोड़ों लोग नारकीय जीवन जी रहे हैं, उनके पास मतदान का भी अधिकार नहीं है, विधेयक पारित होने के बाद वे सम्मान का जीवन जी सकेंगे। जबकि संख्या सम्बंधी ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं है। मतलब कि अमित शाह ने जो कहा, वह पूरी तरह तथ्यहीन और भ्रामक है। बलात्कार की घटनाओं को लेकर पूरा देश आंदोलित है और भारत महिलओं के लिए सबसे असुरक्षित देशों में शामिल हो गया है। अमरीका और ब्रिटेन ने महिला सैलानियों को भारत न आने की एडवाइज़री तक जारी कर दी है लेकिन इस सरकार की प्राथमिकता में महिला सुरक्षा शामिल नहीं है। गृहमंत्री को उस पर चर्चा पसंद नहीं है। वक्ताओं ने कहा कि यह संशोधन विधेयक सावरकर और जिन्ना के दो राष्ट्र के सिद्धान्त को दोहराने जैसा है। वर्तमान सत्ता जनता से जुड़े हर मोर्चे पर असफल है इसलिए वह जनता का ध्यान आर्थिक मंदी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ आदि ज्वलंत मुद्दों से हटाना चाहती है। साथ ही अपने मनुवादी एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए देश के भूमिहीन, गरीब, वंचित, मज़दूर, अनपढ़ आबादी को दस्तावेज़ों के अभाव में विदेशी घोषित कर अल्पसंख्यकों को डिटेंशन कैम्पों में डाल देना चाहती है। बहुजन आबादी को दया का पात्र मानते हुए नागरिकता देकर आरक्षण और संविधान प्रदत्त अन्य सुविधाओं से वंचित कर देना चाहती है। संविधान धार्मिक आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता। स्वतंत्र भारत में राज्यों की सीमा निर्धारण के समय भी धार्मिक आधार को खारिज किया गया था। भाजपा ने इस विवादास्पद विधेयक के पारित करवाने की ज़िद बांधकर व्यावहारिक रूप से संविधान की प्रस्तावना को ही फाड़ने का काम किया है।

इस अवसर पर अहसन जमील खान, अफ़रोज़ खान, नादिर सलाम, खान रज़ा, राशिद, शाहरुख, वहीद, दिलशाद खान, साहिल राईनी, इकराम, साहिल राईन, मो. शरीफ, फजलू, अताउल्लाह राईनी, मो. शफीक, कामरान, अज़ीमुश्शान फारूकी आदि सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।

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