नरेंद्र इंगले, ब्यूरो चीफ, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:
14 महीनो बाद खुले किनगांव प्राथमिक स्वास्थ केंद्र के ऑपरेशन रुम में 23 नवंबर को परिवार नियोजन के 19 ऑपरेशनों को सफलतापुर्वक किया गया था जिसकी खबर मीडिया में भी प्रकाशित हुई थी। यकीनन अच्छे कामों का प्रचार प्रसार होना भी चाहिए। तकनीकी संसाधनों के अभाव के चलते कुछ ऑपरेशन नावी के ग्रामीण अस्पताल में किए गए थे। शिविर में कुल 42 महिलाओं का परिवार नियोजन ऑपरेशन किया गया है। भारत की पुरुष प्रधान संस्कृति में अब तक केवल महिलाएं ही राष्ट्रविकास के लिए बढ़ चढ़कर योगदान देती आ रही हैं। शिविर के दौरान किनगांव केंद्र में 32 वर्षीय सुनीता पाटिल नामक महिला का आपरेशन के 10 दिनों बाद जिला अस्पताल में अचानक निधन हो गया जिससे आक्रोशित परिजनों ने प्रशासन पर लापरवाही का आरोप किया है। तहसील स्वास्थ अधिकारी डॉ हेमंत बरहाटे ने जांच के बाद दोषियों पर कार्रवाई की बात कही है। किनगांव स्वास्थ केंद्र के डॉ समाधान वाघ ने सुनीता का ऑपरेशन किया था।
किनगांव केंद्र प्रमुख डॉ मनीषा महाजन के मुताबिक सभी जरुरी टेस्ट सही पाने के बाद ही सुनीता का आॅपरेशन किया गया था। आॅपरेशन के बाद पेट दर्द की शिकायत के बाद उन्हें तत्काल जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गयी। बहरहाल पीड़िता के परिवार को केंद्र तथा राज्य सरकार की ओर से 4 लाख रुपयों की मदत प्रदान की जाएगी। उक्त जानकारी एक मराठी अखबार में प्रकाशित उस खबर के आधार पर जुटाई गई है जिसे अखबार ने अपने पहले पन्ने पर जगह दी है। विदीत हो कि डॉ मनीषा मेडिकल में गोल्ड मेडिलिस्ट रह चुकी हैं। मृतक सुनीता के दो बच्चे हैं और पति दर्जी का काम करता है। परिजनों के आक्रोश के बाद पुलिस की निगरानी में कानूनी कार्रवाई पुरी कर सुनीता के शव का अंतिम संस्कार किया गया। मृतक सुनीता के आकस्मात निधन के बाद लोगों ने उन्हें नम आंखों से भावभिनी श्रद्धांजली अर्पित की। मामले से जुड़ी रिपोर्ट के बाद सुनीता की मौत की असल वजह साफ होकर जांच की दिशा स्पष्ट होगी। हो सकता है कि कुछेक लोगों पर कार्रवाई भी हो जाए। इन सभी बातों के बीच कई ऐसे पहलू हैं जिनकी समीक्षा करना हर जिम्मेदार नागरिक का अपना तार्किक अधिकार है।
निजी थ्योरी की तर्ज पर चलाई जा रही केंद्र सरकार की ताबड़तोड़ योजनाओ के लक्ष्य को मौजूदा संसाधनों के सहारे ईमानदारी औऱ गुणवत्ता से पुरा करने के लिए प्रयासरत डॉक्टर्स दोषी हैं या फिर वह सरकार जिसे जनता या जनसेवकों की प्रतिष्ठा की नहीं बल्कि अपनी लोकप्रियता की फिक्र है? सरकारी अस्पतालों में योजनाओं के लाभ के बीच मिलने वाली सुविधाओं की कमी को सरकार कभी पाटना ही नहीं चाहती। डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर आज तक अनेकों डॉक्टर संगठनों के सैकड़ों आंदोलनों के बाद कई कानून संसद में पारित किए गए। स्वास्थ विभाग में बुनियादी संसाधनों औऱ सुविधाओं की कमी को लेकर बगैर राजनितिक झंडे के आम लोग आखिर सड़कों पर क्यों नही उतर पाते हैं? आज सुनीता की मौत के लिए अगर कोई डॉक्टर जिम्मेदार है तो सरकार को भी बराबर का दोषी क्यों नहीं माना जाना चाहिए? कई सवाल हैं जो उठ तो रहे हैं लेकिन सुलग नहीं पा रहे हैं। सुनीता पाटिल के मामले में आखिर गलती किसकी है, लचर सरकारी सिस्टम की या फिर शाश्वत रोजगार अवसर के चलते इसी सिस्टम के अधीन रहकर काम करने वाले विवश अधिकारियों की? इन जैसे तमाम किस्म के कई सवाल हैं जिनके जबाब मांगने का हक लोकतंत्र में जनता को मिला है लेकिन लोग अपने अधिकारों का प्रयोग सही तरीके से करने के पक्ष में शायद ही कहीं दिखाई पड़ते रहे हों।
