वी.के.त्रिवेदी, ब्यूरो चीफ, लखीमपुर खीरी (यूपी), NIT:

सरकार और न्यायालय भले ही बुजुर्गों की सेवा करने के लिए कठोर नियम और कानून बनाए हों लेकिन जब संतान कपूत बन जाती है तो कानून भी उनके सामने दम तोड़ने लगते हैं। न्यायालय के सख्त आदेश के बाद भी यहां एक बुजुर्ग अपनी बेबसी भरी जिन्दगी गुजार रहे हैं। ऐसा ही एक मामला प्रकाश में आया है जहां पर करोड़ों की सम्पत्ति होने के बाद भी एक बुजूर्ग महिला के बेटी-बेटों ने उनको अकेला छोड़ दिया है और उनकी सम्पत्ति को आपस में मिलकर बांट लिया है।
सदर कोतवाली क्षेत्र की पुलिस चौकी एलआरपी के अन्तर्गत ग्राम पंचायत राजापुर के पिपरिया गांव में मोहल्ला किशोर नगर कालोनी निकट शांती धर्मार्थ चिकित्सालय के पास में रहने वाले एवं कभी जिला अस्पताल के सामने श्याम मेडिकल स्टोर के मालिक रहे स्वर्गीय राधेश्याम त्रिवेदी की वृद्ध पत्नी आज अपनी बदहाल स्थिति के आगे संघर्ष भरी बुढापे की जिन्दगी काटने पर विवस हैं। करीब पैंसठ वर्ष की उम्र में वह स्वयं अपना काम करके जीवन यापन कर रही हैं। बुढापे के ऐसे पड़ाव पर बेटों ने साथ छोड दिया और तीन बेटियों मंजू, मनीषा और नीलन ने भी अपनी बुजूर्ग मां को तंग हाल में कर दिया है। वह अब अपने जीवन को खत्म करने की गुहार ईश्वर से लगा रही है। सीतापुर रोड पर किशोर नगर कालोनी में त्रिवेदी हाउस के नाम का एक ऐसा मकान बना है जहां पर स्वर्गीय राधे श्याम त्रिवेदी की वृद्ध पत्नी अकेले रहती है। राधे श्याम के दो पुत्र थे जिनमें बडे पुत्र की मृत्यु हो चुकी है और उसका परिवार सीतापुर रोड पर श्याम नगर कालोनी में शुगम साडी हाउस के पास अपने निजी मकान में रहता है। वहीं छोटा लड़का जिला अस्पताल के सामने श्याम मेडिकल के नाम से मेडिकल चला रहा है।राधे श्याम की तीन बेटियां थी जिनकी शादी हो चुकी है अपने पिता की मौत के बाद पिपरिया में बने तीन मकानों को आपस में बांट लिया और राधेश्याम की पत्नी के हिस्सें में मकान के एक छोटे से तुकडे का हिस्सा हाथ लगा है जहां पर वह अपना गुजारा कर रही है। राधे श्याम की तीनों बेटियों ने अपने पिता की सम्पत्ति को आपस में बांट कर मां को अपने से अगल कर दिया है जिससे उनकी जिन्दगी नरक बनती जा रही है। बीमारी के चलते बुजूर्ग महिला को कोई पानी तक देने वाला नहीं है और यदि कभी रात को गम्भीर बीमार पडती है तो उनके पोते घर आकर देख जाते है तथा थोडी बहुत सेवा करते हैं। तीनों बेटियों के साथ न देने से वह इस समय असहाय अवस्था और भीषण दुःखद क्षणों को जी रही है। बेसहारा को सहारा देने के लिए न तो सामाजिक संगठन अभी जान सके है और न ही प्रशासन को इसकी जानकारी है।बेसहारा को सहारा पडोसी लोग दे रहे है।
भेदभाव के शिकार
तिरस्कार, वित्तीय परेशानी के आलावा बुजुर्गों को मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। सर्वे में शामिल 53 फीसदी बुजुर्गों का मानना है कि समाज उनके साथ भेदभाव करता है। अस्पताल, बस अड्डों, बसों, बिल भरने के दौरान और बाजार में भी बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार के मामले सामने आते हैं। खासतौर पर अस्पतालों में बुजुर्गों को भेदभाव या बुरे बर्ताव का अधिक सामना करना पड़ता है। जीवन की भागदौड़ में बुजुर्गों की उपेक्षा लगातार बढ़ती जा रही है। भारत में संयुक्त परिवार व्यवस्था का चरमराना बुजुर्गों के लिए नुकसानदायक साबित हुआ है। सर्वे में शामिल 64 फीसदी बुजुर्गों का मानना है कि उम्र या सुस्त होने की वजह से लोग उनसे रुखेपन से बात करते हैं।सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बुजुर्गों के प्रति दुर्व्यवहार के मुख्य कारणों में समय का अभाव और एकल परिवार है। सर्वेक्षण रिपोर्ट ‘भारतीय समाज अपने बुजुर्गों के साथ कैसे व्यवहार करता है। समाज में भावनात्मक कमी को पूरा करने लिए युवा समय नहीं निकालते है। बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा के लिए पुरानी परंपराओं के पतन को जिम्मेदार मानते हैं। उनके अनुसार बेटी एवं बहू में फर्क करने की पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवस्था भी इसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है।
