गुरूपूर्णिमा विशेष: ब्रम्हलीन श्री लक्ष्मण चैतन्य बापूजी के दर्शन के लिए पाल में लगा शिष्यों का तांता | New India Times

नरेंद्र इंगले, ब्यूरो चीफ, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:गुरूपूर्णिमा विशेष: ब्रम्हलीन श्री लक्ष्मण चैतन्य बापूजी के दर्शन के लिए पाल में लगा शिष्यों का तांता | New India Times

गुरूपूर्णिमा के उपलक्ष्य मे भारत के विभिन्न राज्यों में गुरू – शिष्य स्नेह कृपाभाव की सांस्कृतिक विरासत दिखाई पड़ने वाली है। इसी कड़ी में एक है महाराष्ट्र के पाल स्थित ब्रम्हलीन श्री लक्ष्मण चैतन्य बापूजी की अनूठी कृपादृष्टि की महिमा। सातपुड़ा की पहाड़ियों में आध्यात्मिक गंगा प्रवाहित करने वाला बापूजी का वृंदावन धाम मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर सातपुडा पहाड़ियों की तलहटी में पाल में स्थित है। यहां हर साल की तरह इस वर्ष भी गुरुपूर्णिमा महोत्सव का भव्य आयोजन किया जा रहा है। इस उपलक्ष्य में देश भर से तकरीबन पचास हजार से अधिक भक्तों का आगमन होने का अनूमान है।

श्री वृन्दावन धाम पाल में परम पूज्य सदगुरु श्री लक्ष्मण चैतन्य बापूजी इनके समाधि दर्शन हेतु यहां अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु पधारते है। सैलानीयो कि सेवा सुविधा का जिम्मा अखिल भारतीय चैतन्य साधक परिवार की ओर से किया जाता है जिसमे भक्तो के लिए भक्त निवास ,सत्संग पंडाल, भोजन व्यवस्था, दर्शन व्यवस्था, निशुल्क स्वास्थ केंद्र, वाहन पार्किंग व्यवस्था, चैतन्य सुरक्षा संघ आदी प्रबंधन कराए गए हैं। 16 जुलाई को सुबह 5 बजे गुरु चरण पुजन, गुरुदीक्षा, सत्संग, श्रद्धावचन एवं महाप्रसाद का आयोजन किया जाना है। आश्रम के विद्यमान गादीपति श्रधेय संत श्री गोपाल चैतन्य जी महाराज इनके मार्गदर्शन में सुचारु प्रबंधन किया जा रहा है। इस महोत्सव हेतु ओंकारेश्वर के निकट परम पूज्य महादेव चैतन्य उर्फ दगड़ू जी बापू धाम संत श्री लक्ष्मण चैतन्य बापूजी आश्रम चारुकेश्वर से चैतन्य साधक परिवार एवम हजारो भक्त पैदल यात्रा कर पाल आश्रम तक पहुचते है। उनके स्वागत के लिए निमाड़ क्षेत्र के साधको की ओर से सेवा की जाती है।सदगुरु श्री लक्ष्मण चैतन्य बापूजी के प्रति तीव्र आस्था रखने वाले साधक शिष्यो का दर्शन हेतु ताता लगा रहता है। पूज्य बापूजी ने इस परिसर के आदिवासी समेत सभी समाज एवम धर्म के लोगो को अपनाकर उन्हें आध्यात्मिक प्रवाह में लाकर शुद्ध शाकाहारी जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। पूज्य लक्ष्मण चैतन्य बापूजी इनका अवतरण पाल में हि एक साधारण परिवार में हुआ ! 14 वर्ष की आयु में बापूजी ने घर परिवार त्याग कर पाल के नजदीक एक निर्जन टेकड़ी पर जा कर एकांत जीवन जीने का निश्चय किया। तीव्र साधना के पश्चात पूज्य बापूजी को भगवान योगेश्वर श्री कृष्ण के ज्योतिस्वरूप साक्षात्कार हुआ। बापूजी ने चैतन्य साधक परिवार की स्थापना की। साधको ने भक्ति फेरी, ध्यान केंद्र , गुरुकुल , निशुल्क प्राथमिक आरोग्य केंद्र ,चैतन्य मासिक पत्रिका, ऐसी विभिन्न गतिविधियां आश्रम से अविरत चलायी है। बापूजी चारुकेश्वर आश्रम में ब्रम्हलीन हुए बापूजी के समाधि दर्शन हेतु हर साल गुरू पूर्णिमा महोत्सव में हजारों शिष्यो तथा साधको का आगमन होता है। सातपुडा पहाडीयो के दुर्गम जंगलो मे बसे पाल नामक इस गांव कि पहचान आदीवासी जनजातीयो के निवास से परीचित है ! गुरूपूर्णिमा से पाल मे आरंभ होने वाले महोत्सव के लिए भावीको का आना शुरु हो गया है। प्रशासन ने अपनी ओर से यातायात तथा अन्य बुनीयादी सुविधाओ के लिए विशेष ध्यान दिया है।

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