अशफाक कायमखानी, सीकर/जयपुर (राजस्थान), NIT:
भारत के नामी उधोगपति टाटा व पांच साल पहले प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी के बाद अचानक बडे़ उधोगपति बने अम्बानी को छोड़कर बाकी तमाम बडे नामीगिरामी उधोगपतियों की जन्मभुमि राजस्थान के शेखावाटी जनपद की होने के बावजूद उधोगिक क्रांति से अबतक क्षेत्र पूरी तरह अछूता रहा है।
बिड़ला, बजाज, बांगड़, रुईया, पौदार, खेतान, लोहिया, गोयनका, मोदी, सोभासरीया, मित्तल, तोदी, शेखसरीया, डालमिया, मोरारका, रुंगटा, तापड़िया, चमड़िया, धानूका, सिंघानिया सहित अनेक नामी उधोगपतियों की जन्म स्थली शेखावाटी जनपद रहा है। उक्त शेखावाटी की भूमि के उधोगपतियों ने आजादी के पहले क्षेत्र में स्कूल, काॅलेज, कुऐं, अस्पताल व धर्मशालाओं का निर्माण जगह जगह करवाकर अपनी जन्म भूमि की काफी हद तक सेवाएं करते हुये अपना फर्ज अंजाम दिया था लेकिन उक्त उधोगपतियों में से बजाज ग्रूप के कमलनयन बजाज ने 1952 से सीकर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने का व बिड़ला ग्रूप के कृष्ण कुमार बिड़ला ने 1971 में झूंझुनू लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने का साहस जूटाने के बावजूद उन दोनों को हार का मुहं देखना पड़ा तो वे दोनों ही उधोगपति ही नहीं ब्लकि दूसरे अन्य उधोगपतियों में से कोई बड़ा उधोगपति जनपद से चुनाव लड़ने फिर नहीं आया।
राजस्थान में उघोगिक क्रांति व राजनीतिक बदलाव पर नजर रखने वालों का मानना है कि अगर बिड़ला व बजाज यहां से चुनाव उस समय जीत जाते तो उनका व उनके परिवार का शेखावाटी से विशेष लगाव लगातार बना रहता तो निश्चित ही वो क्षेत्र में उधोगिक क्रांति लेकर आते लेकिन उन दोनों उम्मीदवारों का लोकसभा चुनाव हारना व तमाम उधोगपतियों की पीढी दर पीढी में बदलाव व पूर्वजों की जन्म भूमि से लगाव धीरे धीरे कम होते चले जाने के कारण जनपद उधोगिक क्रांति से पूरी तरह अछूत बना हुआ है।
कुल मिलाकर यह है कि शेखावाटी के मतदाताओं के पास हर पांच साल बाद की तरह एक दफा चाहे कोई नामीगिरामी उघोगपति इस समय चुनाव मैदान में ना सही पर फिर मौका आया है कि वो किसी भी वाद से ऊपर उठकर अपना स्थानीय मजबूत जनप्रतिनिधि को चुनकर लोकसभा में भेजें ताकि उनकी आवाज को ताकत मिलने के बाद जनपद में एक तरह से नई विकास की क्रांति लाई जा सके।
