अशफाक कायमखानी, जयपुर (राजस्थान), NIT:
भारत में लोकतांत्रिक तरीकों से चुनी जाने वाली सरकार के कायम होने के लिये शुरुआत मे पहला आम लोकसभा चुनाव कुल 489 सीटों के लिए 25-अक्टूबर 1951 से 21-फरवरी 1952 तक के चार माह में चुनावी प्रक्रिया पुरी होने के बाद लोकतांत्रिक सरकार का गठन हुआ था। 1952 के इन आम लोकसभा चुनाव में कांग्रैस ने राजस्थान में एक मात्र मुस्लिम उम्मीदवार जोधपुर से एम एच यासीन नूरी को बनाया था। लेकिन नूरी चुनाव जीत नहीं पाये थे।
1952 में जोधपुर से यासीन नूरी के लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद उन्हें कांग्रैस ने 1957 में जोधपुर से फिर उम्मीदवार बनाया और 1957 में ही नूरी के अलावा भीलवाड़ा से कांग्रैस ने फिरोज शाह को भी उम्मीदवार बनाया लेकिन दोनों ही मुस्लिम उम्मीदवार लोकसभा चुनाव जीत नहीं पाये तो कांग्रेस ने 1962, 1967 व 1972 के लोकसभा चुनाव में किसी भी मुस्लिम को उम्मीदवार नहीं बनाकर मुस्लिम समुदाय को केवल मतदाता की हैसियत से नापा पर 1977 में जनता पार्टी लहर के चलते कांग्रेस ने मोहम्मद उसमान आरिफ को चूरु से लोकसभा उम्मीदवार बनाया लेकिन वो भी मात खा बैठे।
1977 की जनता पार्टी की आंधी में कांग्रेस के नागौर से उम्मीदवार नाथूराम मिर्धा को छोड़कर सभी उम्मीदवार चुनाव हार गये थे। चूरु से उसमान आरीफ के 1977 में चुनाव हारने के बाद 1979 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने फिर किसी मुस्लिम को उम्मीदवार नहीं बनाया। इसके बाद 1984 के लोकसभा चुनाव में झूंझुनू से अय्यूब खान को उम्मीदवार बनाया और वह चुनाव जीत कर सांसद बने। इसके बाद 1989, 1991, 1996 में भी झूंझुनू से अय्यूब खान को उम्मीदवार बनाया लेकिन अय्यूब खान 1984 के बाद 1991 में फिर चुनाव जीतकर सांसद बने और उस कार्यकाल में केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे थे। 1996 के चुनाव में ही भरतपुर से कांग्रेस ने चौधरी तैयब हुसैन को भी लोकसभा उम्मीदवार बनाया पर 1996 में तैयब हुसैन व झूझूनु से अय्यूब खान दोनों ही चुनाव हार गये। 1998 में जयपुर से कांग्रेस के सईद गुडएज को लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाने पर वो भी जीत नहीं पाये। इसके बाद 1999 मे झालावाड़ से अबरार अहमद को, 2004 में अजमेर से हबीबुर्रहमान को, 2009 में चूरु से रफीक मण्डेलिया को एवं 2014 में टोंक-सवाईमाधोपुर से अजहरुद्दीन को कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बनाया लेकिन उक्त सभी उम्मीदवार चुनाव जीत नहीं पाये।
राजस्थान की कुल आबादी का तकरीबन 14 प्रतिशत वाला मुस्लिम समुदाय के करीब 11-12 लोकसभा सीटों पर 15-17 प्रतिशत मतदाता होना बताया जाता है जिनमें झूंझुनू, सीकर, बाडमेर-जैसलमेर, नागोर, अलवर, कोटा, अजमेर, जोधपुर, चूरू, टोंक-सवाईमाधोपुर व भरतपुर लोकसभा क्षेत्र शामिल हैं फिर भी कांग्रेस 2019 के आम लोकसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय के मत तो हर हालत में लेना चाहती है लेकिन साॅफ्ट हिंदुत्व के रास्ते पर चलते हुये कांग्रेस नेता 1962, 1967, 1972 व 1979 की तरह 2019 में भी किसी भी मुस्लिम को उम्मीदवार बनाने से पूरी तरह कतरा रहे हैं जबकि 28-फरवरी से 2-मार्च तक कांग्रेस वर्किंग कमेटी की उम्मीदवारों के नाम तय करने को लेकर अहम बैठक होने वाली है। उक्त तीन दिन होने वाले मंथन से पहले राजस्थान के मुस्लिम नेता प्रभावी राजनीतिक दवाब बनाने में कामयाब रहे तो बात बन सकती है वरना कांग्रेस पार्टी से मुस्लिम उम्मीदवार का नाम सूची से बाहर हो सकता है।
हालांकि राजस्थान के चूरु से खानू खान, रफीक मण्डेलीया, व डाॅ. निजाम व झूझूनु से शब्बीर हुसैन एवं जयपुर शहर से अश्क अली टांक व दूर्रु मियां का नाम टिकट पाने वालों की दौड़ में शुमार माना जा रहा है। पर देखना होगा कि उक्त मुस्लिम नेता हाईकमान पर किस हद तक राजनीतिक दवाब बनाने में कामयाब होते हैं। प्रदेश में पहले व अब तक के आखिरी मुस्लिम सांसद मात्र कैप्टन अय्यूब खान रहे हैं जिन्होंने 1984 व 1991 में झूंझुनू लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीत पाये थे।
