पानी रे पानी तेरा रंग कैसा: समय के साथ कलयुगी इंसानों का भी बदल रहा है पानी | New India Times

Edited by Pankaj Sharma, NIT :

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा: समय के साथ कलयुगी इंसानों का भी बदल रहा है पानी | New India Times

लेखक: ममता वैरागी

पानी बचाए कैसे, क्यों, किसलिए आदि बहूत सी बात हैं पर गांव के लोग आज भी ऐसी बातों से अनजान हैं। उन्हें पानी का मोल ही नहीं पता, या है भी तो हम क्या कर सकते में रहते हैं, सही भी है। पानी क्या है और क्यों बचाएं? आज भी गांव के लोग एक सप्ताह में केवल दो बार ही नहाते हैं। बडा आश्चर्य हुआ कि इस यूग में भी और इतनी शिक्षा के बाद भी ज्ञान का अभाव देखा गया। और देखा तो पानी का अभाव, सब जगह गर्मी से पहले ही पानी की आवाज आने लगती है, पानी, पानी, पानी। आखिर क्यों हो रहा है पानी का अभाव? क्यों वर्षा कम होती या होने के बाद भी पानी का अभाव जनता को होता है इसे सभी पढ़े-लिखे परयावरण से जोड कर देख लेते हैं, पर एक बात पर ध्यान नहीं दें रहे कि क्या कारण है कि हमें पानी के लिए भटकना पड़ता है। मान है पानी, जिसकी कमी कर रहा आदमी, हर कोई मैं बडा बाकि सब बेकार, व्यर्थ अंहकार में डूबकर दूसरों की इज्जत, प्रतिष्ठा से खेलने लगा। आदमी, नन्ही नन्ही परियो की आबरू से खेल कर गंवा बैठा है अपना पानी, जैसा राजा, वैसी प्रजा सूना था। जब से कलियूग आया, दारू, मांस, मट्टी और महिलाओं को बेइज्जत करना, क्यों कि कलियूग राक्षस राजा है। वह मति भ्रमित कर रहा है, उसका कहना हे कि मूझ जैसे जो रहेंगे, वह सूखी, बाकि को में दर्द दूंगा, ओर हम देख रहे हे, कि ईश्वर तक को वह दर्द दे रहा इस धरा पर परमात्मा तक आहत हो रहा हे, जब चहूं ओर नाच, गाना, दारू पार्टी,ओर नारी की, ही नहीं, छोटी, छोटी , बच्चियों तक के साथ दरिंदगी, ओर वही अच्छे मानव का पानी खत्म हो रहा हे, धरा पर जब पाप बढ़ता हे तब वह अकूलाती हे, भगवान से प्रार्थना करती हे, मेरी गोद में मेरे बच्चे क्या-क्या कर रहे हे। ओर ईश्वर समय का रास्ता देख रहा हे, कभी भूकंप लायेगा, कभी पानी में सब नष्ट कर देगा, या पानी की बूंद बूंद को तरसयेगा ओर यहां फिर सभी बोल पड़ते हे तो अब बताओ कलियूग के कारण यह हो रहा तो हम देख सकने के सिवा क्या कर सकते हे, हम लाचार हे, बेबस हे, नहीं तूम लाचार बेबस नहीं हो? उठो जागो, तूम आज के यूग के पढ़े-लिखे नोजवान हो, पूरूष हो, नारायण को मत घबराने दो, तूम उनका स्वरूप हो, तूम असली जिंदगी के असली हीरो हो ओर तूम अपने में देवत्व का गूण भरकर बहूत कुछ अच्छा कर सकते हो, आज तूम भटक गये। शरीर की नालियो से प्रेम करते हो, पर शरीर से नहीं, तूम अच्छे मानव कैसे एसा कर सकते हो तूम्हे तो मानव के बाद मोक्ष पाना था, तुम्हें तो अन्न जल सब मिलना था, तूम क्यों तरस रहे शूद्भ पानी को ,क्यों तूम्हारे समय में ही यह सब हो रहा। क्यों तूम्हारे पूर्वज अच्छै जी कर आये, क्यों सोने कि चिड़िया ओर दूध ,घी की नदियों की बात होती थी, क्यों पानी कि कमी ना थी। उतर यही हे, कि आज जरा सा धन आने पर इंसान अपने घर कुता पालता हे, उसे घर में रखता हे, गायो को पालना गलत मान रहा हे, जब दूध देते पशूओ की संख्या घट जायेगी तो दूध की नदियां कैसे बहेगी, क्या तूम कूते कि बिरादरी में आते हो , नहीं ना तो कूते से मोह क्यों? फिर बात आती हे कि हम विकास कर रहे हे, तूम विकास कर रहे हो तो वृक्षों को नदियों को क्यों मिटा रहे, जो हमें पानी देते हे, हम उन्हें ही नष्ट क्यों कर रहे हे, ओर फिर पानी पानी चिल्ला रहे हे, पैसा सब कूछ नहीं, देवताओं को खूश रखो, उन्हें मनाओ, अपना पानी रखो, अब तूम तो हिंसा का रास्ता अपना कर खून बहाते हो तो जहां खून बहेगा, वहा पानी रूपी देव कैसे रहेंगे, ओर क्या हम खून पीकर प्यास बूझायेगे, सोचो? ओर समझो कि हमारे समय कि नादानी आज पानी पानी कर रहे हे, हमारी आने वाली पीढ़ी क्या खायेगी, क्या पीयेगी, क्या फिर आदि मानव की तरह रहेगी, सोचो, कि हम समझकर क्यों नहीं समझना चाहते, अरे, जो गलत हे,वह गलत हे, इसमें क्या आज देखो सागर का पानी बढ रहा, हिम पिघल रहा, क्यों? कारण हे, खार , हर मानव मस्तिष्क में खार समा गया ओर यह खार सागर के पानी को बडा रहा हे, हां हमारे आचरण से ही धरा पर हर बात हो रही हे, हर मानव के खार में इतनी वृद्धि हुई है कि सागर उफन रहा हे, नदियों का मीठा पानी, यानी हमारे भीतर का पानी खत्म हो रहा है। ईश्वर केवल तुम्हें देख रहा हे, यही तूम्हारी परिक्षा हे, अब प्रश्न आ रहा हे कि क्या करें हमें पानी मिलने लगे, तो हमें दिन रात, गायत्री मंत्र ओर त्रम्बकम के मंत्रों का जप शूरू करके, अपने भीतर के पानी को संभालना होगा, गाय,गोबर,ओर गली,कि महत्ता, का ध्यान रखना होगा,ओर हमें किसी भी धर्म से यह बात नहीं जोडना हे यह केवल पानी क्यों नहीं आता,पर बात हे, यहां हमें केवल ईश्वर के देव पानी को प्रसन्न करने की बात हे, हमें नारी का,ओर हमारे स्वयं का इज्जत रूपी, मान रूपी पानी को बचाकर रखना हे, हमें नहीं मानना हे, कलियूग कि बात नही करना, है धन से प्यार हमें तो दिन रात देवताओं को प्रसन्न करना है और भौतिक रूप से वृक्षों को लगाना है, नदियों को बचाना हे, खार, खिस्सा, लडाई, झगडे रूपी खून को न बहाकर कैवलप्यार के प्रेम के, स्नेह के मीठे पानी को संभालना हे, ओर जैसे ही हमने एक साथ जल देवता को प्रसंन्न किया कि हम पायेंगे कि बहूत अच्छी वर्षा होने लगेगी, ईश्वर हमें पानी देगा।

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