सरवर खान ज़रीवाला, भोपाल, NIT;
शिवराज सिंह चौहान सरकार ने अपनी बजट से भले ही प्रदेश की जनता को आनंद की अनुभूति कराने का दावा किया हो लेकिन तीसरी पारी की प्राथमिकताओं में स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के साथ शिक्षा की गुणवत्ता के जिस एजेंडे को आगे रखकर उसे अंजाम तक पहुंचाने का वादा किया था उस पर कुछ सवाल जरूर खड़े हो गए हैं। सवाल मेधावी छात्रों के लिए बनाए गए मापदंड को लेकर खड़ा हुआ है, जिसमें एम.पी.बोर्ड से जुड़े मेधावी विद्यार्थियों को ही सम्मान और सुविधाएं देने की बात सामने आयी है। ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि क्या मोदी की सीबीएसई और राइट टू एजुकेशन पर शिवराज का एम पी बोर्ड भारी पड़ेगा? तो क्या प्रदेश में शिवराज पर यह आरोप नहीं लगेगा कि वह छात्र-छात्राओं के साथ वह भेदभाव कर रहे हैं, वह भी जब संघ शिक्षा में समानता, समान अवसर की पैरवी करता रहा है। शिवराज की मंशा भले ही अपना मध्य प्रदेश को नई पहचान दिला कर उसे गौरवान्वित महसूस कराने की रही हो लेकिन सवाल यह खड़ा होता है कि क्या जाति धर्म की सियासत के बीच अब शिक्षा की कसौटी पर भेदभाव के आधार पर पाठ्यक्रम भी बनेंगे? देखना दिलचस्प होगा कि शिवराज सरकार के इस क्राइटेरिया को संघ से जुड़ी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और विद्या भारती ही नहीं भारतीय शिक्षा मंडल और शिक्षा बचाओ आंदोलन क्या अपनी सहमति जताकर साथ खड़े नजर आएंगे या फिर वह गुणवक्ता नहीं समान पाठ्यक्रम और सामान सुविधाओं की जरूरत पर जोर देने की अपनी सोच को ध्यान में रखते हुए इस फैसले के बाद खुद को समय रहते फ्रंट फुट पर लाकर हस्तक्षेप कर गलती सुधार करेंगे जिससे शिवराज की छवि पर भी सवाल खड़े ना हो और उनकी नीति नियत को लेकर विद्यार्थी सवाल खड़ा न कर सकें।
