"बहुत कठिन है डगर पनघट की", राजस्थान के 2018 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की होगी अग्नि परीक्षा | New India Times

अशफाक कायमखानी, जयपुर (राजस्थान), NIT; ​"बहुत कठिन है डगर पनघट की", राजस्थान के 2018 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की होगी अग्नि परीक्षा | New India Timesकेंद्र और कई राज्यों की सत्ता से बेदखल हुई कांग्रेस पार्टी को एक बाद एक झटके लगते ज रहे हैं। कहीं आम आदमी पार्टी उसका खेल बिगाड रही है तो कहीं उवैसी बंधुओ की पार्टी एमआईएम, तो अन्य सेकुलर पार्टियां। गरज यह कि कांग्रेस पूरे भारत वर्ष में काफी बुरे दौर से गुजर रही है। नोटबंदी के बाद उसे यह उम्मीद हुई थी कि अब होने वाले सभी चुनावों में जनता बीजेपी को नकार देगी लेकिन महाराष्ट्र में हुए महानगर पालिका व नगर पालिका चुनावों में उसका यह भ्रम भी टूट गया है। बीजेपी ने देशकी आजादी से लेकर अब तक महाराष्ट्र में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है। उसे कुछ उम्मीद उत्तर प्रदेश में एसपी – कांग्रेस के महा गठबंधन से है उस का परिणाम 11 मार्च को आने वाला है। यहां भी उसका खेल बिगाडने के लिए बीएसपी, एमआईएम व अन्य पार्टियां मौजूद हैं। कुल मिलाकर कर कांग्रेस के लिए संकेत कूछ शुभ नहीं दिख रहे हैं। 

राजस्थान में 2018 में विधानसभा चुनाव होने हैं ऐसे में कांग्रेस को अपना हर कदम काफी फूंक-फूंक कर रखने होंगे क्योंकि यहां भी उसका खेल बिगाडने के लिए आम आदमी पार्टी, एमआईएम व वामपंथी दस्तक दे चुके हैं। आरोप लगाया जा रहा है कि कांग्रेस आलाकमान ने राजस्थान कांग्रेस कमेटी में जनाधार विहिन नेताओं को अहम जिम्मेदार पदों की जिम्मेदारी दे रखी है जिस कारण उसके परम्परागत वोटबैंक उससे और दूर हो रहे हैं। बताया जाता है कि यहां के कांग्रेसी पदाधिकारी अगले दो साल में सत्ता के मालिक समझ कर ऐसे व्यवहार करने लगे हैं कि मानो वो सत्ता में आ ही चुके हैं। जबकि सियासी आंकलन कर्ता भाजपा सरकार की गिरती छवि के बावजूद कांग्रेस नेताओ के आचरण के चलते सत्ता में आने को अभी तक खोरा स्वपन मान रहे हैं। ​"बहुत कठिन है डगर पनघट की", राजस्थान के 2018 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की होगी अग्नि परीक्षा | New India Timesराजस्थान में 2018 में होने वाले आम विधान सभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने अपने सबसे निकटम व्यक्ति दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को राजस्थान प्रभारी बनाकर लगातार राजस्थान भेज कर व आज पच्चीस फरवरी को सिसोदिया ने राजस्थान के अपने सक्रिय वर्कर्स को दिल्ली बुलाकर जिला वाइज राजनितिक समीकरणों पर विचार विमर्श करने से लगता है कि यह पार्टी सभी 200 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी अभी से करने लगी है। दुसरी तरफ हैदराबाद के उवैसी बंधु भी MIM के करीब साठ उम्मीदवार उतारने के लिये उन सीटों का चयन कर रहे हैं जहां मुस्लिम व दलित आबादी अधिक पाई जाती है। ओवैसी बंधुओं के सम्पर्क में राजस्थान के अनेक उभरते नेता भी पिछले कुछ महीनों से जुड़े बताये जाते हैं।

 राजस्थान में कांग्रेस की वैसे तो हालत काफी पतली है लेकिन तिसरा विकल्प इस समय मौजूद नहीं होने के कारण हर कांग्रेसी बिना कुछ संघर्ष किये ही भाजपा के मुकाबले अपने आप को सत्ता में आता मानकर जनता से वैसा ही व्यवहार भी करने लगे हैं। भाजपा के हमेशा नजदीक रही राजस्थान की गुर्जर जाति के पास कांग्रेस की प्रमुख पांच पोस्ट में से तीन पोस्ट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष व प्रदेश युथ कांग्रेस अध्यक्ष जैसे पद हैः। वहीं कांग्रेस के परम्परागत वोटबैंक दलित, मुस्लिम व किसानों के हाथों में कुछ भी नहीं है।

हालांकि अशोक गहलोत की पिछली सरकार ने जनहित से जुड़ी अनेक योजनाओं के शुरु करने से प्रदेश की कमोबेश अच्छी सरकार मानी जाती है लेकिन उनकी सरकार में गोपालगढ में मस्जिद में लोगों को पुलिस गोली से मारने व थानेदार फूल मोहम्मद को ड्यूटि पर भीड़ के जिंदा जलाने की हुई प्रशासनिक चुक से मुसलमानों को कांग्रेस से इतना दूर करके रख दिया था कि वह उस आम चुनाव में अनेक जगह कांगेस के प्रति उदासीन रहे। वहीं अनेक जगह मुस्लिम निर्दलीय तौर पर उम्मीदवार बन गये तो चार जगह उनके भाजपा के निशान पर चुनाव लडने से कांगेस की लुटिया पुरी तरह डूब गई थी। लुटिया डूबने के पीछे अनेक कारणों के साथ-साथ एक कारण अनेक जगह मुसलमानों का कुछ प्रतिशत वोट सीधेरतौर पर भाजपा को जाना भी माना जा सकता है। दूसरी तरफ मुस्लिमों के कल्याण के लिये गठित होने वाले मेवात विकास बोर्ड व अल्पसंख्यक वित्त व सहकारी समिति जैसे अनेक बोर्ड/निगम या तो पूरी कांग्रेस सरकार के समय गठित ही नहीं हुये थे या कुछ गठित भी हुये तो वो सरकार के आखिरी समय गठित हुये जिनके मार्फत सरकार कल्याण के कार्य चाहते हुये भी नहीं कर पाई क्योंकि जल्द ही आचार संहिता लग चुकी थी।

राजस्थान में कांग्रेस का पिछले तीन सालों में भाजपा सरकार के खिलाफ कोई बडा आंदोलन व संघर्ष होना नहीं माना जा सकता है। हां अशोक गहलोत पेरे स्टेट में किसी ना किसी बहाने दौरे दर दौरे करते रहे हैं, वहीं सचिन पायलेट भी अनेक जगह जिला कांग्रेस द्वारा बुलाई गई सभा या रैली में जाते आ रहे जरुर हैं  लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात ही आ रहे हैं। तीन साल पहले हुये विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का कोई भी नेता अपनी पार्टी के अनुसुचित जाति व मुस्लिम उम्मीदवार को उनकी बिरादरी के अलावा नाममात्र के वोट भी दिलवा नहीं पाने के चलते परिणाम यह हुआ कि इन दोनों बिरादरियों का एक भी उम्मीदवार कांग्रेस के निशान पर जीत नहीं पाया था।

 कांग्रेस के संघर्ष की बानगी का एक उदाहरण आपको बताता चलू कि 22- सितम्बर-2016 को भाजपा सरकार ने प्रदेश में कुओं की बिजली दर में बेतहाशा वृद्धि करके किसानों को तबाह करने का खेल जो खेला था,  उसी मुद्दै को समय रहते वामपंथियों ने लपक कर किसानों में एक जनजाग्रति मुहिम ऐसी चलाई कि दो फरवरी को पहले सीकर फिर झुंझूनु, चुरू व बीकानेर में विशाल किसान सम्मेलन करके सरकार को ललकारते हुये दो मार्च को किसानों के जयपुर कूच का ऐलान करके सरकार को दवाब में लेकर बिजली दर वृदि को वापिस लेने का फैसला कराकर इश्यू बेस सियासत करके अपने जनाधार को अचानक हाईट देकर हारी हुई बाजी को पलट कर जीत लिया। दुसरी तरफ माकपा के सबसे मजबूत गढ सीकर में भी पुर्व केन्द्रीय मंत्री सुभाष महरिया, पुर्व प्रदेशाध्यक्ष चोधरी नारायण सिंह व पुर्व प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष परशराम मोरदीया सहित अन्य नेताओं ने बिजली दर वृद्धि सहित अनेक मांगों को लेकर इसी 22-फरवरी को सीकर में कांग्रेस की तरफ से विशाल किसान सम्मेलन करने का ऐलान करके गावं-गावं, ढाणी-ढाणी जाकर किसानों से सम्पर्क करके जो धमाल मचाया था उससे कांग्रेस की छवि किसानों के दिलों मे कांग्रेस के प्रति काफी मोहब्बत प्रकट होती दिखने लगी थी। लेकिन अचानक कांग्रेस नेताओं ने 22-फरवरी की किसान रैली को रद्द करके जबरदस्त घाटे का सोदा कर लिया।

कुल मिलाकर यह है कि संघ तरबियत याफ्ता व हारने वाले जनाधारविहिन लोगों से कांग्रेस अगर पल्ला नहीं झाड़ती है और फूंक-फूंक कर कदम रखने में कांगेस नेता कामयाब नहीं हुये तो 2018 में उनका सत्ता में आने का सपना काफूर हो सकता है। इसलिए उन्हें किसान-दलित व मुस्लिम मतों को हर हाल में जोड़े रखना होगा।

By nit

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