मोहम्मद तारिक, भोपाल, NIT;
अव्यवस्था, अराजकता, उन्माद फैलने की आशंका, सड़क मार्ग बाधित कर धीमी गति का यातायात, यह चक्का जाम, यह सब अपराध ही है और यह धीमी गति के यातायात या चक्का जाम से अभीप्राय, यह नहीं की रास्ता रोक कर मार्ग अवरुद्ध कर दिया अपितु जुलूस या रैली सबसे अधिक मार्गों को न सिर्फ बाधित कर जनजीवन अस्त-व्यस्त करती है बल्कि कई थाना क्षेत्रों से होकर गुजरने वाले इन आयोजनों से हर क्षेत्र के चिकित्सालय, जीवन रक्षक एंबुलेंस, बीमार और लाचार वृद्ध हो चुके वरिष्ठजन, हताश-निराश स्कूल बसों में बैठे विद्यार्थी और उनकी प्रतीक्षा में राह तक रहे अभिभावक, बालिकाएं-महिलाएं, एवं “नाना प्रकार की जटिल समस्याओं से जूझता स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार” ! नगर बंद जैसी स्थिति तथा धीमी रफ्तार का यातायात ! जूं नहीं रेंगती न्यायालय की अवमानना जैसे राजनीतिक दबाव में, सात तालों में संदूक या अलमारी में बंद पड़ी हो न्यायालयों के आदेश की प्रतियां ! अपने ही अपने देश में नागरिक नागरिकता के स्वतंत्रता अधिकार से जूझता! सात दशक बीत गए, आखिर तुम जागोगे कब यार !
देश में रैलियां निकालकर सड़क मार्गों चौक-चौराहों पर मंच लगाकर राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन कर अपनी राजनीति को चमकाएं, सूने और खाली हो जाते उपासना स्थल चौक-चौराहों पर अस्थाई निर्माण कर धार्मिक प्रचार करें, कहीं अनुमति तो कहीं बिना अनुमति के हो जाते आयोजन, लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन रीढ़ की हड्डी, न्यायालयों ने दिए आदेश न अब हो चक्का जाम फिर भी आईएएस-आईपीएस न ले संज्ञान, शहरों में खाली पड़े कई स्थान ! धीमी गति से बाधित होता यातायात से फैलता प्रदूषण, बढ़ता जाता है उस क्षेत्र का तापमान।
“राजनीतिक दबाव में सात तालों में संदूक या अलमारी में बंद पड़ी हो न्यायालयों के आदेश की प्रतियां !”
“अपने ही अपने देश में नागरिक नागरिकता के स्वतंत्रता अधिकार से जूझता !”
“सात दशक बीत गए, आखिर तुम जागोगे कब यार !”
“अब तो वैचारिक द्वंद हैं। ”
@मो. तारिक (स्वतंत्र लेखक)
