ज़फ़र खान, अकोट/अकोला (महाराष्ट्र), NIT:
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार की रक्षा से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने पुणे जिले के बारामती निवासी सुरेंद्र रवींद्र काजले के खिलाफ पारित निवारक नजरबंदी के आदेश को रद्द कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज होना मात्र निवारक नजरबंदी का पर्याप्त आधार नहीं है। इसके लिए यह साबित करना आवश्यक है कि उसकी कथित गतिविधियों से सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई है या प्रभावित होने की आशंका है।
न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाल्के और न्यायमूर्ति राज डी. वाकोडे की खंडपीठ ने 12 अक्टूबर 2026 को आपराधिक रिट याचिका क्रमांक 520/2026 स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता के विरुद्ध पारित नजरबंदी आदेश निरस्त कर दिया। साथ ही निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता किसी अन्य आपराधिक मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।
याचिकाकर्ता सुरेंद्र काजले ने पुणे के जिलाधिकारी द्वारा महाराष्ट्र खतरनाक गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम, 1981 (एमपीडीए अधिनियम) के तहत एक वर्ष की अवधि के लिए पारित निवारक नजरबंदी के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मीर नगमान अली ने पैरवी की, जबकि राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त सरकारी अभियोक्ता एस. एस. जाचक उपस्थित हुए।
आठ आपराधिक मामलों के आधार पर की गई थी नजरबंदी
नजरबंदी का आदेश मुख्य रूप से वर्ष 2013 से 2025 के बीच याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज आठ आपराधिक मामलों, उसके विरुद्ध की गई प्रतिबंधात्मक कार्रवाई और दो गोपनीय गवाहों के बयानों पर आधारित था।
प्रशासन का तर्क था कि याचिकाकर्ता लगातार आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त रहा है और सामान्य कानूनी कार्रवाई उसकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी आधार पर उसके खिलाफ एमपीडीए अधिनियम के तहत निवारक नजरबंदी की कार्रवाई की गई थी।
व्यक्तिगत विवाद को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा नहीं माना जा सकता
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मीर नगमान अली ने न्यायालय के समक्ष दलील दी कि जिन घटनाओं के आधार पर नजरबंदी का आदेश पारित किया गया, वे मुख्य रूप से व्यक्तियों के बीच हुए विवादों से संबंधित थीं। ऐसी घटनाओं को अपने आप में सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा नहीं माना जा सकता।
उन्होंने यह भी दलील दी कि निवारक नजरबंदी एक असाधारण कानूनी उपाय है, जिसका इस्तेमाल केवल विशेष परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। संबंधित प्राधिकारी यह साबित करने में विफल रहा कि याचिकाकर्ता की गतिविधियों से समाज में व्यापक भय या असुरक्षा का माहौल बना था अथवा सार्वजनिक शांति में गंभीर व्यवधान उत्पन्न हुआ था।
कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण अंतर
याचिकाकर्ता की दलीलों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था (Law and Order) और सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं।
न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक आपराधिक घटना या शांति भंग होने की स्थिति को सार्वजनिक व्यवस्था में व्यवधान नहीं माना जा सकता।
खंडपीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोप मुख्य रूप से व्यक्तिगत विवादों से संबंधित थे। नजरबंदी प्राधिकारी की ओर से प्रस्तुत सामग्री से यह साबित नहीं होता कि इन घटनाओं के कारण आम जनता में व्यापक भय या असुरक्षा का माहौल पैदा हुआ अथवा समाज की सामान्य गतिविधियां प्रभावित हुईं।
न्यायालय ने यह भी पाया कि दो गोपनीय गवाहों के बयान याचिकाकर्ता की गतिविधियों को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
सामान्य आपराधिक कानून का विकल्प नहीं है निवारक नजरबंदी
हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के डॉ. राम मनोहर लोहिया बनाम बिहार राज्य और कुसो साह बनाम बिहार राज्य मामलों में प्रतिपादित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि निवारक नजरबंदी एक असाधारण शक्ति है, जिसका इस्तेमाल सामान्य आपराधिक न्याय प्रक्रिया के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने दोहराया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज होना या लंबित होना अपने आप में निवारक नजरबंदी को उचित नहीं ठहराता। इसके लिए यह दर्शाना आवश्यक है कि संबंधित व्यक्ति की गतिविधियों से सार्वजनिक व्यवस्था को वास्तविक खतरा है या ऐसा खतरा उत्पन्न होने की आशंका है।
खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोपों से निपटने के लिए सामान्य आपराधिक न्याय प्रणाली पर्याप्त थी। ऐसे में निवारक नजरबंदी जैसी असाधारण शक्ति का इस्तेमाल उचित नहीं था।
नजरबंदी का आदेश रद्द, तत्काल रिहाई के निर्देश
सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने सुरेंद्र रवींद्र काजले के खिलाफ पारित निवारक नजरबंदी का आदेश रद्द कर दिया। साथ ही निर्देश दिया कि यदि किसी अन्य आपराधिक मामले में उनकी हिरासत आवश्यक नहीं है, तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार के महत्व को रेखांकित करता है। साथ ही यह स्पष्ट करता है कि निवारक नजरबंदी की शक्तियों का इस्तेमाल कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं और आवश्यक शर्तों के अधीन ही किया जा सकता है।
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी : अधिवक्ता मीर नगमान अली
