ज़फ़र खान, अकोट/अकोला (महाराष्ट्र), NIT:
अकोला में मरीज की मौत के मामले में वत्सल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के डॉ. नरेंद्र भागवत और डॉ. नम्रता भागवत की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। मरीज की मौत में कथित चिकित्सकीय लापरवाही और साक्ष्य नष्ट करने के आरोपों को लेकर न्यायालय ने दोनों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच करने का आदेश दिया है। यह आदेश 3 अक्टूबर 2026 को दिया गया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, शिकायतकर्ता रजनी अमोल इंगोले, निवासी डाबकी रोड, अकोला के भाई पंकज गजानन राउत (32 वर्ष) अग्रसेन नागरी सहकारी बैंक की मलकापुर शाखा में चपरासी के पद पर कार्यरत थे। 10 अगस्त 2024 को रीढ़ की हड्डी में अचानक दर्द होने के कारण उन्हें अकोला के वत्सल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में उपचार के लिए ले जाया गया था।
शिकायत के मुताबिक, अस्पताल में डॉक्टरों ने मरीज की स्थिति गंभीर बताते हुए जल्द एमआरआई कराने और ऑपरेशन करने की सलाह दी। परिजनों को कथित तौर पर बताया गया कि ऑपरेशन नहीं होने पर मरीज को स्थायी दिव्यांगता हो सकती है। ऑपरेशन के लिए दो लाख रुपये की फीस बताई गई। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण शिकायतकर्ता ने 50 हजार रुपये नकद दिए तथा 25 हजार रुपये की दवाइयां उपलब्ध कराईं। शेष राशि महाराष्ट्र शासन की सरकारी योजना के माध्यम से प्राप्त किए जाने की बात शिकायत में कही गई है।
ऑपरेशन के बाद मरीज की मौत, परिजनों ने उठाए सवाल
शिकायत के अनुसार, 11 अगस्त 2024 को मरीज का ऑपरेशन किया गया। ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों ने परिजनों को बताया कि शल्यक्रिया सफल रही है और मरीज की हालत ठीक है। साथ ही, दो से तीन दिन आईसीयू में रखने के बाद उसे चलाने और जनरल वार्ड में स्थानांतरित करने की बात कही गई।
हालांकि, परिजनों का आरोप है कि ऑपरेशन के बाद उन्हें मरीज से मिलने नहीं दिया गया। 13 अगस्त 2024 को शाम करीब 5:30 बजे अस्पताल के कर्मचारियों ने मरीज की हालत गंभीर होने की जानकारी दी। शिकायतकर्ता स्वयं नर्स होने के कारण मरीज की स्थिति के बारे में पूछताछ करती रहीं, लेकिन उनके अनुसार उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। उसी रात करीब 8 बजे मरीज पंकज राउत को मृत घोषित कर दिया गया।
परिजनों को बताया गया कि ऑपरेशन ठीक से हुआ था, लेकिन अचानक हार्ट अटैक आने से मरीज की मौत हो गई।
सीसीटीवी फुटेज को लेकर भी गंभीर आरोप
शिकायतकर्ता का आरोप है कि उन्होंने कई बार अस्पताल से उपचार संबंधी दस्तावेज मांगे, लेकिन उन्हें दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। इसके बाद परिजनों ने सीसीटीवी फुटेज देखने का दावा करते हुए आरोप लगाया कि 13 अगस्त की शाम आईसीयू में कोई विशेषज्ञ डॉक्टर या आईसीयू प्रभारी मौजूद नहीं था।
शिकायत के मुताबिक, अस्पताल के दो अप्रशिक्षित कर्मचारियों ने मरीज को खड़ा करने का प्रयास किया, जिस दौरान वह अचानक गिर पड़ा। आरोप है कि उस समय कोई वरिष्ठ डॉक्टर, चिकित्सा अधिकारी या वरिष्ठ नर्स मौके पर मौजूद नहीं थे। शिकायतकर्ता के अनुसार, मरीज को दोबारा बिस्तर पर लिटाने के बाद तत्काल उचित उपचार नहीं दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि समय पर उपचार नहीं मिलने और कथित लापरवाही के कारण उनके भाई की मौत हुई।
शिकायतकर्ता ने सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं कराने और उसके डिलीट हो जाने की बात कहे जाने पर भी सवाल उठाए हैं। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
पुलिस में शिकायत के बाद न्यायालय का दरवाजा खटखटाया
शिकायतकर्ता के अनुसार, उन्होंने 23 सितंबर 2024 को खदान पुलिस थाने में शिकायत दी थी। इसके बाद पुलिस अधीक्षक के समक्ष भी शिकायत प्रस्तुत की गई। आरोप है कि इसके बावजूद मामले में अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने अधिवक्ता पप्पू मोरवाल के माध्यम से अकोला न्यायालय में याचिका दायर कर आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज करने और जांच कराने की मांग की।
प्रकरण की सुनवाई प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी न्यायालय क्रमांक 6 की न्यायाधीश श्रीमती पी. एन. डोंगरे के समक्ष हुई। शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता पप्पू मोरवाल ने दलील दी कि कथित लापरवाही और समय पर उचित उपचार नहीं मिलने के कारण मरीज की मौत हुई। उन्होंने मामले से जुड़े साक्ष्य उपलब्ध कराने में टालमटोल किए जाने का मुद्दा भी उठाया।
भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत जांच के आदेश
शिकायतकर्ता के अधिवक्ता की दलीलों पर विचार करने के बाद न्यायालय ने 3 अक्टूबर 2026 को डॉ. नरेंद्र भागवत और डॉ. नम्रता भागवत के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 106(1), 238 और 3(5) के तहत मामला दर्ज कर जांच करने का आदेश दिया।
यह आदेश आरोपों की अंतिम पुष्टि या दोषसिद्धि नहीं है। मामले में वास्तविक तथ्यों, कथित चिकित्सकीय लापरवाही और साक्ष्यों से संबंधित आरोपों की जांच के बाद ही आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।
अधिवक्ता पप्पू मोरवाल ने की पैरवी
इस प्रकरण में शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता पप्पू मोरवाल ने न्यायालय में पक्ष रखा। उन्हें अधिवक्ता प्रवीण तायडे, अधिवक्ता अक्षय दामोदर, अधिवक्ता सुनील सरदार, अधिवक्ता गणेश खेडकर, अधिवक्ता कश्यप अहिर, अधिवक्ता मिताली लखवानी, प्रणव वानखड़े और श्रवण राठोड ने सहयोग किया।
न्यायालय के आदेश के बाद अब जांच की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। शिकायतकर्ता को उम्मीद है कि उनके भाई की मौत से जुड़े सभी सवालों के जवाब मिलेंगे और यदि किसी की लापरवाही सामने आती है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
