Edited by Sabir Khan, NIT:
लेखक: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
भारतीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता केवल मतदान कराने से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि मतदाता सूची की शुद्धता, पात्र नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा, निर्वाचन आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता, पुनरीक्षण प्रक्रिया की पारदर्शिता तथा EVM-VVPAT की सत्यापन व्यवस्था भी इसके महत्वपूर्ण आधार हैं। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर हाल के वर्षों में व्यापक सार्वजनिक विमर्श हुआ है। इसी संदर्भ में नई दिल्ली के अधिवक्ता भानु प्रताप सिंह द्वारा 3 अक्टूबर 2026 को संसद मार्ग थाने के थाना प्रभारी को दी गई शिकायत में निर्वाचन प्रक्रिया, मतदाता सूची, SIR, EVM-VVPAT तथा संबंधित संवैधानिक एवं राजनीतिक पदाधिकारियों को लेकर गंभीर आरोप और प्रश्न उठाए गए हैं।
हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोपों को न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। उनकी सत्यता का निर्धारण सक्षम जांच और आवश्यक होने पर न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही हो सकता है। इसलिए इस विषय को किसी आरोप के अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि चुनावी पारदर्शिता, मताधिकार और लोकतांत्रिक जवाबदेही के व्यापक प्रश्न के रूप में देखना आवश्यक है।
चुनाव केवल मतदान तक सीमित नहीं
भारत में चुनाव लोकतांत्रिक शासन की सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत प्रक्रिया है। संसद और विधानसभाओं के प्रतिनिधियों का चयन जिस प्रक्रिया से होता है, उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता लोकतांत्रिक व्यवस्था की वैधता का महत्वपूर्ण आधार है।
चुनाव केवल मतदान के दिन होने वाली प्रक्रिया नहीं है। इसके पीछे मतदाता सूची का निर्माण, नाम जोड़ना और हटाना, दावे-आपत्तियों का निपटारा, मतदान, मतगणना, VVPAT सत्यापन और परिणामों की घोषणा जैसे कई चरण शामिल हैं। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग को चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की संवैधानिक जिम्मेदारी दी गई है। वहीं अनुच्छेद 325 और 326 निर्वाचन व्यवस्था में समान निर्वाचक नामावली तथा वयस्क मताधिकार के महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं।
इसलिए चुनावी पारदर्शिता का सवाल केवल मतदान केंद्र की निष्पक्षता तक सीमित नहीं रह सकता। यह भी महत्वपूर्ण है कि मतदाता सूची किस आधार पर तैयार होती है, किसी व्यक्ति का नाम किस कारण से हटाया जाता है और पात्र नागरिक को अपना पक्ष रखने का कितना अवसर मिलता है।
मतदाता सूची लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की आधारशिला
मतदाता सूची लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की बुनियादी संरचना है। किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हट जाना उसके मताधिकार के प्रयोग को प्रभावित कर सकता है। दूसरी ओर, अपात्र व्यक्ति का नाम सूची में बने रहना भी निर्वाचन प्रक्रिया की शुचिता पर प्रश्न खड़े कर सकता है।
इसलिए निर्वाचन व्यवस्था के सामने दोहरी जिम्मेदारी है—अपात्र प्रविष्टियों को हटाना और पात्र नागरिकों के मताधिकार की रक्षा करना। Representation of the People Act, 1950 और Registration of Electors Rules, 1960 मतदाता सूची के निर्माण और पुनरीक्षण का महत्वपूर्ण वैधानिक आधार हैं।
निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता पंजीकरण और सुधार के लिए Form 6, Form 7 तथा Form 8 जैसी प्रक्रियाएं उपलब्ध कराई गई हैं। इनका उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन रखना और नागरिकों को अपने निर्वाचन संबंधी विवरण में सुधार का अवसर देना है।
SIR की जरूरत के साथ प्रक्रिया की पारदर्शिता भी जरूरी
Special Intensive Revision यानी विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची में मौजूद त्रुटियों, मृत व्यक्तियों की प्रविष्टियों, स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाताओं, दोहरी प्रविष्टियों तथा अन्य अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करना और पात्र मतदाताओं की सूची को अधिक विश्वसनीय बनाना है।
बिहार में 2025 में हुए SIR के दौरान निर्वाचन आयोग ने व्यापक सत्यापन की प्रक्रिया निर्धारित की थी। SIR की आवश्यकता और वैधानिकता पर बहस हो सकती है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न इसकी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता का है।
यदि पुनरीक्षण में किसी अपात्र व्यक्ति का नाम हटाया जाता है तो यह चुनावी शुचिता के लिए आवश्यक हो सकता है। लेकिन यदि इसी प्रक्रिया में किसी पात्र नागरिक का नाम भी हट जाए और उसे पर्याप्त सूचना या अपना पक्ष रखने का अवसर न मिले, तो यह गंभीर स्थिति होगी। इसलिए SIR की सफलता केवल हटाए गए नामों की संख्या से नहीं, बल्कि पात्र नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा और प्रभावी सुनवाई से भी तय होनी चाहिए।
SIR पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय महत्वपूर्ण
बिहार SIR की संवैधानिक और वैधानिक स्थिति को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में भी महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। Association for Democratic Reforms बनाम Election Commission of India मामले में न्यायालय ने निर्वाचन आयोग की शक्तियों तथा Representation of the People Act, 1950 की धारा 21(3) के संदर्भ में SIR की वैधानिकता पर विचार किया।
न्यायालय के निर्णय के बाद यह स्पष्ट है कि SIR को केवल इसलिए अवैध नहीं कहा जा सकता कि संविधान में इसका नाम शब्दशः नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि ऐसी प्रक्रिया लागू करते समय निर्वाचन आयोग अपनी वैधानिक शक्ति के दायरे में काम करता है या नहीं और नागरिकों को उचित प्रक्रिया तथा अपना पक्ष रखने का अवसर मिलता है या नहीं।
पात्र मतदाता के अधिकारों की सुरक्षा जरूरी
मतदाता सूची के पुनरीक्षण में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यह होना चाहिए कि अपात्र प्रविष्टियों को हटाने के प्रयास में किसी पात्र नागरिक का अधिकार प्रभावित न हो। SIR से संबंधित न्यायिक कार्यवाही के दौरान मतदाता सूची से बाहर रह गए लोगों के कारणों को सार्वजनिक करने, राजनीतिक दलों के Booth Level Agents की भागीदारी और अन्य प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों पर भी ध्यान दिया गया।
Aadhaar को पहचान संबंधी दस्तावेज के रूप में स्वीकार किए जाने के बावजूद यह अंतर महत्वपूर्ण है कि Aadhaar नागरिकता का प्रमाण नहीं है। इससे स्पष्ट होता है कि मतदाता सूची की शुद्धता और नागरिक के मताधिकार की सुरक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के दो आवश्यक पक्ष हैं।
दावा-आपत्ति की प्रक्रिया आम नागरिक तक पहुंचे
मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या विवरण में सुधार की व्यवस्था तभी प्रभावी होगी, जब आम नागरिक उसके बारे में जागरूक हो और समय पर उसका उपयोग कर सके। Form 6 नए मतदाता के पंजीकरण, Form 7 किसी प्रविष्टि पर आपत्ति अथवा नाम हटाने तथा Form 8 विवरण में सुधार या स्थानांतरण से संबंधित है।
सिर्फ ऑनलाइन व्यवस्था उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों, बुजुर्गों, दिव्यांगों, आर्थिक रूप से कमजोर तथा डिजिटल सुविधाओं से वंचित नागरिकों तक भी निर्वाचन संबंधी जानकारी और सहायता पहुंचना जरूरी है।
EVM-VVPAT पर पारदर्शिता का सवाल
चुनावी पारदर्शिता की चर्चा EVM और VVPAT के बिना पूरी नहीं हो सकती। VVPAT व्यवस्था के माध्यम से मतदाता मतदान के बाद अपने मत से संबंधित पर्ची को कुछ समय तक देख सकता है, जिसके बाद वह सुरक्षित बॉक्स में चली जाती है।
निर्धारित प्रक्रिया के तहत चयनित मतदान केंद्रों पर VVPAT पर्चियों की गणना और उनका मिलान भी किया जाता है। उम्मीदवारों के लिए नियमों के तहत VVPAT पर्चियों की गिनती का अनुरोध करने की व्यवस्था भी है।
इससे स्पष्ट है कि निर्वाचन व्यवस्था में तकनीकी सत्यापन की प्रक्रिया मौजूद है। फिर भी लोकतांत्रिक विश्वास को मजबूत करने के लिए जरूरी है कि नागरिकों और राजनीतिक दलों को इन प्रक्रियाओं की स्पष्ट जानकारी हो तथा विवाद की स्थिति में उपलब्ध सत्यापन तंत्र विश्वसनीय और पारदर्शी हो।
शिकायत को जांच का विषय मानना जरूरी
अधिवक्ता भानु प्रताप सिंह द्वारा 3 अक्टूबर 2026 को संसद मार्ग थाने में दी गई शिकायत में निर्वाचन प्रक्रिया, मतदाता सूची, SIR, EVM-VVPAT और संबंधित पदाधिकारियों को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। यहां कानूनी सावधानी आवश्यक है। शिकायत में लगाए गए आरोपों को सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
शिकायत किसी अपराध के सिद्ध होने का प्रमाण नहीं होती। उसकी सत्यता का निर्धारण जांच, दस्तावेजी साक्ष्यों और आवश्यकता पड़ने पर न्यायिक प्रक्रिया से ही हो सकता है। लेकिन यदि किसी शिकायत में गंभीर तथ्यात्मक या दस्तावेजी प्रश्न उठाए गए हैं तो उनका निष्पक्ष परीक्षण लोकतांत्रिक संस्थाओं के हित में हो सकता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वस्थ सिद्धांत यही है कि न तो किसी आरोप को जांच से पहले सत्य मान लिया जाए और न ही बिना जांच के उसे असत्य घोषित किया जाए।
स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी जरूरी
निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है। आयोग पर सरकार या किसी राजनीतिक दल का अनुचित दबाव नहीं होना चाहिए। लेकिन संस्थागत स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से पूर्ण मुक्ति भी नहीं है।
संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा इस बात से बढ़ती है कि वे कानून के अनुसार अपने अधिकारों का प्रयोग करें और उनकी महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं पर्याप्त रूप से पारदर्शी हों। चुनावी व्यवस्था में स्वतंत्रता, निष्पक्षता और जवाबदेही के बीच संतुलन आवश्यक है।
निर्वाचन आयुक्तों की कानूनी सुरक्षा
Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 की धारा 16 निर्वाचन आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से संबंधित कार्य, बात या कथन के संबंध में विशेष कानूनी सुरक्षा प्रदान करती है।
हालांकि, आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन से संबंधित कानूनी सुरक्षा और प्रत्येक संभावित अपराध के लिए असीमित प्रतिरक्षा को समान नहीं माना जा सकता। किसी विशेष मामले में यह देखना आवश्यक होगा कि आरोपित कार्य वास्तव में आधिकारिक कर्तव्य के दायरे में था या नहीं और उस पर कानून की कौन-सी धाराएं लागू होती हैं।
चुनावी पारदर्शिता पूरे चुनावी चक्र से जुड़ी
चुनावी पारदर्शिता को केवल EVM या मतदान केंद्र तक सीमित करना उचित नहीं होगा। यह पूरे चुनावी चक्र से जुड़ी अवधारणा है। इसमें मतदाता सूची का निर्माण, नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया, SIR एवं अन्य पुनरीक्षण, दावे-आपत्तियां, मतदाताओं को सूचना, EVM-VVPAT की सुरक्षा और सत्यापन, मतगणना, परिणामों की घोषणा तथा चुनावी शिकायतों का निवारण शामिल हैं।
इन सभी चरणों में जितनी अधिक पारदर्शिता और सत्यापन की व्यवस्था होगी, लोकतांत्रिक विश्वास उतना ही मजबूत होगा।
पारदर्शिता बढ़ाने के लिए ठोस कदम जरूरी
भारतीय निर्वाचन व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण उपायों पर निरंतर विचार किया जाना चाहिए। मतदाता सूची से नाम हटाने के मामलों में नागरिक को स्पष्ट सूचना और अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया जाए। SIR जैसी व्यापक प्रक्रियाओं में नाम हटाने या रोकने के कारणों को पारदर्शी तरीके से उपलब्ध कराया जाए।
Form 6, Form 7 और Form 8 जैसी प्रक्रियाओं को आम नागरिक के लिए और सरल बनाया जाए। मतदाता सूची के आंकड़ों का स्वतंत्र और वैज्ञानिक विश्लेषण संभव बनाया जाए। EVM-VVPAT से जुड़े तकनीकी प्रश्नों पर वैज्ञानिक एवं स्वतंत्र सत्यापन को प्रोत्साहित किया जाए तथा चुनावी शिकायतों के लिए समयबद्ध और प्रभावी शिकायत-निवारण व्यवस्था को मजबूत किया जाए।
निष्कर्ष
भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि विश्वसनीय, निष्पक्ष, पारदर्शी और सत्यापन योग्य चुनाव कराने में है। मतदाता सूची लोकतंत्र की आधारभूत संरचना है। उसका पुनरीक्षण आवश्यक हो सकता है, लेकिन पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पात्र नागरिक के मताधिकार की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
अधिवक्ता भानु प्रताप सिंह की शिकायत में लगाए गए आरोप अभी जांच और प्रमाण का विषय हैं। उन्हें न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। हालांकि, यदि शिकायत में गंभीर तथ्यात्मक या दस्तावेजी प्रश्न उठाए गए हैं तो उनका निष्पक्ष और कानूनसम्मत परीक्षण लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को मजबूत कर सकता है।
अंततः चुनावी पारदर्शिता किसी एक राजनीतिक दल, सरकार या व्यक्ति का विषय नहीं है। यह प्रत्येक नागरिक के मताधिकार और पूरे लोकतांत्रिक तंत्र की विश्वसनीयता का प्रश्न है। लोकतंत्र तब मजबूत होता है, जब नागरिक को विश्वास हो कि उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित है, उसका मत सही ढंग से दर्ज और गिना जाता है, चुनावी प्रक्रिया सत्यापन योग्य है और किसी गंभीर शिकायत की निष्पक्ष जांच संभव है। यही सार्वजनिक विश्वास लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी है।
(श्रीप्रकाश सिंह निमराजे, अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर)
