सामूहिक संवाद और सामाजिक विवेक से ही प्रबुद्ध समाज का निर्माण संभव: प्रा. डॉ. जगदीश जाधव | New India Times

मक़सूद अली, ब्यूरो चीफ, यवतमाल (महाराष्ट्र), NIT:

सामूहिक संवाद और सामाजिक विवेक से ही प्रबुद्ध समाज का निर्माण संभव: प्रा. डॉ. जगदीश जाधव | New India Times

समाज में परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से करनी होगी। सामूहिक संवाद और सामाजिक विवेक के माध्यम से ही प्रबुद्ध समाज का निर्माण संभव है। संगठन की पहली सीढ़ी स्व-संवाद है। अपने विचारों का आलोचनात्मक परीक्षण, विवेक का विकास और सामाजिक वास्तविकताओं की समझ व्यक्ति को प्रज्ञाशील बनाती है। ऐसे व्यक्तियों के माध्यम से ही समानता, बंधुता, न्याय और मानवीय गरिमा पर आधारित प्रबुद्ध भारत का निर्माण संभव है। यह विचार केंद्रीय राजस्थान विश्वविद्यालय के समाजकार्य विभाग के प्रा. डॉ. जगदीश जाधव ने व्यक्त किए।
सावित्री ज्योतिराव समाजकार्य महाविद्यालय एवं महात्मा ज्योतिबा फुले समाजकार्य महाविद्यालय, यवतमाल के संयुक्त तत्वावधान में ‘स्वाभिमान दिवस 2026’ के अवसर पर सुमती सांस्कृतिक सभागृह में अंतरमहाविद्यालयीन शैक्षणिक संवाद आयोजित किया गया। ‘स्वाभिमान, सामाजिक न्याय और विद्यार्थी सहभागिता : समकालीन समाजकार्य शिक्षा का दृष्टिकोण’ विषय पर आयोजित संवाद में दिल्ली विश्वविद्यालय के समाजकार्य विभाग के प्रा. डॉ. संजॉय रॉय, केंद्रीय राजस्थान विश्वविद्यालय के प्रा. डॉ. जगदीश जाधव तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डॉ. सुधीर मस्के ने विद्यार्थियों से संवाद किया। कार्यक्रम में डॉ. स्वाती अमराळे-जाधव प्रमुख अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं।
‘प्रबुद्ध भारत की संकल्पना : समतामूलक सामाजिक न्याय की ओर डॉ. आंबेडकर का दृष्टिकोण’ विषय पर डॉ. जाधव ने कहा कि सामाजिक परिवर्तन के लिए व्यक्ति को पहले अपने पूर्वाग्रहों को पहचानना और सामाजिक वास्तविकताओं को विवेकपूर्ण दृष्टि से समझना आवश्यक है। प्रबुद्ध भारत केवल आदर्श समाज की कल्पना नहीं, बल्कि विवेक, समानता, बंधुता, न्याय और मानवीय गरिमा को सामाजिक जीवन में स्थापित करने की सतत प्रक्रिया है।
उन्होंने डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के सामाजिक परिवर्तन संबंधी विचारों और हिंदू कोड बिल के लिए किए गए उनके प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि सामाजिक बदलाव के लिए विचारों के साथ कानून, शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और संस्थागत परिवर्तन का समन्वय आवश्यक है।
समाजकार्य विद्यार्थियों की भूमिका पर उन्होंने कहा कि केवल डिग्री हासिल करना ही समाजकार्य शिक्षा नहीं है। विद्यार्थियों को बदलते सामाजिक यथार्थ को समझने, क्षेत्रीय अनुभव प्राप्त करने, संवाद कौशल विकसित करने और समाज के प्रति प्रतिबद्धता निर्माण पर ध्यान देना चाहिए। व्यक्तित्व विकास के लिए दृष्टिकोण, व्यवहार, प्रतिबद्धता और दृढ़ संकल्प को उन्होंने महत्वपूर्ण बताया।
विकसित भारत के संदर्भ में डॉ. जाधव ने कहा कि विकास को केवल आर्थिक प्रगति और भौतिक सुविधाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता। वंचित एवं कमजोर वर्गों की भागीदारी, समान अवसर, संसाधनों तक पहुंच और प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा भी विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। समाजकार्यकर्ता को लोगों को विकास की प्रक्रिया से जोड़ने तथा वंचित वर्गों की भागीदारी बढ़ाने में सेतु की भूमिका निभानी चाहिए।
प्रा. डॉ. संजॉय रॉय ने स्वाभिमान, मानवीय गरिमा, शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन के संबंध पर विचार रखते हुए कहा कि ‘मैं, मुझे और मेरा’ से ‘हम, हमें और हमारा’ की सामूहिक चेतना की ओर बढ़ना समाजकार्य शिक्षा के लिए आवश्यक है। उन्होंने स्वयं की गरिमा के साथ दूसरों की गरिमा का सम्मान और समाज के प्रति जिम्मेदारी को भी महत्वपूर्ण बताया।
डॉ. सुधीर मस्के ने ‘संवाद से सामूहिक कार्रवाई की ओर : सामाजिक परिवर्तन में समाजकार्य विद्यार्थियों की भूमिका’ विषय पर मार्गदर्शन किया। उन्होंने विद्यार्थियों से कक्षा में प्राप्त ज्ञान को क्षेत्रकार्य, समुदाय और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि संवाद केवल चर्चा तक सीमित न रहकर सामूहिक और रचनात्मक कार्रवाई में परिवर्तित होना चाहिए।
कार्यक्रम के पश्चात प्रश्नोत्तर सत्र में विद्यार्थियों ने स्वाभिमान, प्रबुद्ध भारत, सामाजिक न्याय, समाजकार्य शिक्षा, क्षेत्रकार्य और सामाजिक परिवर्तन से संबंधित प्रश्न पूछे। वक्ताओं ने विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान किया। विद्यार्थियों ने स्वाभिमान दिवस की प्रतिज्ञा ली और विषय आधारित प्रश्नमंजुषा में भी सहभागिता की।
कार्यक्रम का समन्वय प्रा. प्रशांत कराळे, प्रा. डॉ. देविदास शंभरकर और प्रा. रत्नदीप गंगाळे ने किया। संचालन प्रा. प्रशांत कराळे ने किया, जबकि आभार प्राचार्य डॉ. सीमा शेटे ने माना। कार्यक्रम में दोनों महाविद्यालयों के प्राध्यापक, कर्मचारी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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