मेरा जीवन सफर : मिट्टी की पगडंडी से टीवी के पर्दे तक | New India Times

मक़सूद अली, यवतमाल (महाराष्ट्र), NIT:

मिट्टी की पगडंडी से शुरू हुआ मेरा सफर आज टीवी के पर्दे तक पहुंच चुका है। कभी दूसरे के घर के बाहर खड़े होकर रामायण देखने वाला मैं, आज उसी टीवी के पर्दे पर लाखों लोगों तक खबरें पहुंचाता हूं। इस सफर में जिंदगी ने कई उतार-चढ़ाव दिखाए, कई बार मुश्किलों ने रास्ता रोका, लेकिन हर बार माता-पिता के संस्कारों और संघर्ष से मिली जिद ने मुझे आगे बढ़ने की ताकत दी।

मेरा नाम संजय उत्तमराव राठोड है। मेरा जन्म 10 जून 1978 को यवतमाल शहर से करीब सात किलोमीटर दूर स्थित किन्ही, तहसील व जिला यवतमाल में हुआ। मेरे पिता श्री उत्तमराव राठोड खेतिहर मजदूर थे, जबकि मेरी मां श्रीमती द्रोपदा राठोड खेतिहर मजदूरी के साथ घर संभालती थीं। हम दो भाई हैं। मैं बड़ा और मेरा छोटा भाई विजय उत्तमराव राठोड, जिसने आज निर्माण क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है।

आज जब पीछे मुड़कर बचपन को देखता हूं तो आंखों के सामने कई तस्वीरें तैरने लगती हैं—गांव के लोगों का अपनापन, मां का स्नेह, पिता का अनुशासन, मामा के गांव जाने का उत्साह और मिट्टी की सड़कों पर दौड़ता वह मासूम बचपन।

उस बचपन ने हमें गरीबी दी, संघर्ष दिया, अभाव दिए; लेकिन इसी संघर्ष ने हमें जिंदगी से लड़ने की हिम्मत भी दी।

चार रुपये की किताब की कहानी…

हमारे घर की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। माता-पिता दिनभर धूप में खेतों में मजदूरी करते थे। उसी मजदूरी से घर चलता, हमारा पेट भरता और हमारी पढ़ाई का खर्च निकलता।

कई बार घर में चार रुपये भी नहीं बचते थे। लेकिन उन्होंने कभी हमें यह महसूस नहीं होने दिया कि गरीबी के कारण हमें पढ़ाई छोड़ देनी चाहिए।

उस दौर में स्कूल की वर्दी में खाकी पैंट, सफेद शर्ट और दो रुपये की लाल बेल्ट होती थी। लेकिन वह बेल्ट भी कई बार हमारे पास नहीं होती थी।

कक्षा चौथी से सातवीं तक हमारी शिक्षिका पांडे मैडम सुंदर लिखावट के लिए हर विद्यार्थी को चार रेकी बुक लाने के लिए कहती थीं। मेरा भी मन करता था कि मेरे पास वे किताबें हों।

मैं पिता से कहता—

“अगले रविवार को किताबें ला देना।”

पिता मुस्कुराकर कहते—

“इस रविवार बाजार से जरूर लाऊंगा।”

रविवार आता और मैं बाजार से लाई गई पोटली बड़े उत्साह से खोलता। लेकिन उसमें चार रेकी बुक कभी नहीं होती थीं।

आज समझ में आता है कि क्यों नहीं होती थीं।

उनके पास चार रुपये भी नहीं बचते थे।

मेरी पैंट फटती तो मां उसे रफू कर देतीं। शर्ट बगल से फटता तो सिल देतीं। पैरों में घिसी हुई चप्पलें होतीं। बरसात में कीचड़ उछलकर शर्ट खराब कर देता। चप्पल कीचड़ में फंसकर टूट जाती।

लेकिन हमने कभी माता-पिता से ज्यादा जिद नहीं की।

क्योंकि हम रोज उनकी मजबूरी और संघर्ष अपनी आंखों से देखते थे।

गांव से यवतमाल और पढ़ाई का संघर्ष

सातवीं तक गांव में ही पढ़ाई हुई। उस समय बने दोस्त आज भी मेरी जिंदगी का हिस्सा हैं।

सातवीं के बाद शहर में पढ़ने का सपना था। यवतमाल उस समय हमें बहुत बड़ा शहर लगता था। आठवीं के लिए शहर जाने का फैसला किया।

लेकिन एसटी का पास बनवाने के लिए भी पैसे नहीं थे।

कभी साइकिल से, तो कभी किसी तरह सफर करके स्कूल पहुंचता। अपने कपड़े नहीं होते तो दोस्त की शर्ट और किसी दूसरे की पैंट पहनकर स्कूल जाना पड़ता।

उस समय जिंदगी ने एक बात सिखाई—

अभाव इंसान को नहीं रोकता, इंसान तब रुकता है जब वह अपनी जिद छोड़ देता है।

टीवी के पर्दे से पहली पहचान

हमारे बचपन में टीवी किसी विलासिता से कम नहीं था। गांव में किसी संपन्न व्यक्ति के घर ही टीवी हुआ करता था।

रामायण शुरू होती तो पूरा गांव उस घर में जमा हो जाता।

छत पर एंटीना घुमाने वाला व्यक्ति ऊपर से पूछता—

“चित्र आया क्या?”

नीचे से हम सब चिल्लाते—

“आया… गया… आया… गया…!”

टीवी के आसपास जमा पूरा गांव उस समय एक परिवार जैसा लगता था।

उससे पहले शाम होते ही गांव की चावड़ी पर बुजुर्गों की महफिल जमती थी। उनकी बातचीत से जीवन के कई सबक मिलते थे। फिर टीवी आया और धीरे-धीरे चावड़ी खाली होने लगी।

समय बदलता गया और हमारा बचपन भी बदलता गया।

पढ़ाई छूटी और हाथों में काम आ गया

घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हुई कि मुझे कुछ समय के लिए पढ़ाई छोड़नी पड़ी।

अपने पैरों पर खड़े होने के लिए यवतमाल के गुजरात होटल, सदानंद होटल और सरकारी अस्पताल के सामने स्थित एक होटल में काम किया। राजमिस्त्री के साथ मजदूरी भी की।

उम्र छोटी थी, लेकिन जिंदगी में कुछ बनने की जिद बहुत बड़ी थी।

70 रुपये की मजदूरी और मुंबई का संघर्ष

आठवीं के आसपास मेरी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया। मैं सीधे मुंबई चला गया।

1997 के आसपास बड़ी-बड़ी इमारतों में पेंटिंग का काम शुरू किया। दिनभर की मजदूरी सिर्फ 70 रुपये थी।

नालासोपारा के इन्फंट जीजस हाईस्कूल में रंगाई-पुताई का काम मिला। इसी दौरान मेरा छोटा भाई विजय भी मुंबई आ गया।

हम दोनों ने साथ काम शुरू किया।

यहीं मेरी जिंदगी में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति आए—जोसेफ सर।

उन्होंने मुझसे पूछा—

“पढ़ाई क्यों छोड़ दी?”

मैंने उन्हें अपने घर की पूरी स्थिति बताई।

उन्होंने मुझे दोबारा पढ़ाई शुरू करने के लिए प्रेरित किया।

उनका वह आग्रह मेरी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

उस समय गांव से संपर्क करना भी आसान नहीं था। करीब तीन साल तक गांव से लगभग संपर्क नहीं रहा। फोन भी हर किसी के पास नहीं होता था।

मैंने जरूरी दस्तावेज जुटाए, फॉर्म नंबर 17 भरा और मुंबई में दसवीं में दाखिला लिया।

यहीं से मेरी पढ़ाई फिर शुरू हुई।

दसवीं पूरी की और उसके बाद पढ़ाई जारी रखते हुए मुंबई से ग्रेजुएशन भी पूरा किया।

गांव लौटा और जिंदगी ने नई दिशा पकड़ी

शिक्षा पूरी करने के बाद मैं फिर गांव लौटा।

गांव की खुली हवा में सांस लेने का आनंद ही अलग था।

कुछ समय पान की दुकान शुरू की। इसके साथ ही रियल एस्टेट के कारोबार में भी काम किया।

इसी दौरान समाज और राजनीति से मेरा जुड़ाव बढ़ा।

मैंने शिवसेना में काम किया। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी में यवतमाल विधानसभा सोशल मीडिया की जिम्मेदारी मिली।

इस दौरान विधायक और मंत्री मदनभाऊ येरावार के साथ काम करने का अवसर मिला। उनकी कार्यशैली से काफी कुछ सीखने को मिला।

राजनीति से पत्रकारिता की ओर…

इसी दौरान पत्रकारिता का दरवाजा मेरे लिए खुला।

बंजारा लाइव टीवी में पत्रकार के रूप में काम करने का मौका मिला। यह चैनल कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी देखा जाता था। पत्रकारिता का यह मेरा पहला अनुभव था।

इसके बाद मेरी जिंदगी में राधिका मैडम आईं। वे दैनिक सकाळ में कार्यरत थीं। उनके और उस समय की पदाधिकारी मायाताई शेरे के माध्यम से मुझे दैनिक सकाळ में तालुका प्रतिनिधि के रूप में काम करने का अवसर मिला।

राजकुमार भितकर सर ने भी काफी सहयोग दिया।

तनिष्का उपक्रम के तहत करीब एक साल काम करते हुए पत्रकारिता मेरे लिए एक वास्तविक पाठशाला बन गई।

भास्करभाऊ की मदद और पत्रकारिता को नई उड़ान

यवतमाल के पोस्टल ग्राउंड पर साहित्य सम्मेलन का आयोजन हुआ था। इसी दौरान मेरी जिंदगी में एक और महत्वपूर्ण व्यक्तित्व आया—मेरे लिए दैवत समान न्यूज18 लोकमत के जिला प्रतिनिधि आदरणीय भास्करभाऊ मेहेरे।

उन्होंने मुझे सीधे जय महाराष्ट्र टीवी में काम करने का अवसर दिया।

करीब एक साल वहां काम किया।

कुछ कारणों से मैंने काम बंद कर दिया। मैं नहीं चाहता था कि मेरी वजह से जिले के दूसरे प्रतिनिधि के काम पर कोई असर पड़े।

लेकिन भास्करभाऊ का मेरे प्रति स्नेह कभी कम नहीं हुआ।

वे अक्सर पूछते—

“अरे संजू, खबरें क्यों नहीं भेजते?”

फिर लोकशाही मराठी चैनल की शुरुआत हुई।

मेरी कोई औपचारिक मुलाकात या इंटरव्यू नहीं हुआ।

भास्करभाऊ का सिर्फ फोन आया—

“संजू, लोकशाही चैनल शुरू हो रहा है। तुम काम करो।”

उनका वह शब्द मेरे लिए आदेश था।

उस दिन से मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

यवतमाल जिले में अकेले काम शुरू किया और आज छह साल से अधिक समय से लोकशाही मराठी के यवतमाल जिला प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहा हूं।

बच्चों की पढ़ाई—मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी

आज मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा सुख यह है कि मेरी बेटी एमबीए की पढ़ाई कर रही है और मेरे बेटे ने ग्रेजुएशन पूरा कर लिया है।

बचपन में चार रुपये की किताब मांगते समय माता-पिता की बेबसी मैंने देखी थी।

इसीलिए आज मैंने यह संकल्प लिया है कि अपने बच्चों की शिक्षा में कभी कोई कमी नहीं आने दूंगा।

आज जब टीवी पर अपनी खबर देखता हूं तो अनायास ही आंखें नम हो जाती हैं।

क्योंकि कभी दूसरे के घर के बाहर खड़े होकर रामायण देखने वाला एक गरीब बच्चा, आज उसी टीवी के पर्दे पर लोगों तक खबर पहुंचा रहा है।

यह सिर्फ मेरी जीत नहीं है।

यह मेरे माता-पिता के संघर्ष और त्याग की जीत है।

## चावड़ी से स्मार्टफोन तक…

मेरे विचार से 1990 के दशक में पली-बढ़ी पीढ़ी ने एक अनोखा दौर देखा है।

हमने गरीबी देखी।

संघर्ष देखा।

और बदलती दुनिया को अपनी आंखों के सामने बदलते हुए देखा।

चावड़ी से स्मार्टफोन तक…
एंटीना वाले टीवी से डिजिटल मीडिया तक…
चिट्ठी से मोबाइल तक…

यह पूरा बदलाव हमारी आंखों के सामने हुआ।

इसलिए हमें दुख की कीमत भी पता है और सुख का महत्व भी।

यह सफर मेरा नहीं, मेरे माता-पिता का है

आज मेरी जिंदगी की जो भी पहचान है, वह सिर्फ मेरी नहीं है।

यह मेरी मां श्रीमती द्रोपदा राठोड और मेरे पिता श्री उत्तमराव राठोड के त्याग की पहचान है।

उन्होंने खेतों में मजदूरी करके हमें खड़ा किया।

अपनी जरूरतों को पीछे रखकर हमारी पढ़ाई के लिए संघर्ष किया।

उनका कर्ज मैं जिंदगी भर नहीं चुका सकता।

इसीलिए दिल से एक ही बात कहना चाहता हूं—

गरीबी हमेशा नहीं रहती, लेकिन माता-पिता के संस्कार हमेशा साथ रहते हैं।

संघर्ष की राह कितनी भी कठिन क्यों न हो, अगर जिद, ईमानदारी और माता-पिता का आशीर्वाद साथ हो, तो मिट्टी की पगडंडी पर चलने वाला इंसान भी एक दिन लाखों लोगों के घरों में मौजूद टीवी के पर्दे तक पहुंच सकता है।

आज जब मैं अपने जीवन सफर को देखता हूं तो सिर्फ एक बात महसूस होती है—

मिट्टी की उस पगडंडी से शुरू हुआ यह सफर मेरे माता-पिता के आशीर्वाद के कारण ही यहां तक पहुंचा है।

कोटि-कोटि प्रणाम मेरे माता-पिता को।

उनके त्याग ने मेरे संघर्षपूर्ण जीवन को आज प्रेरणा की कहानी बना दिया है।

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