संदीप शुक्ला, ब्यूरो चीफ, ग्वालियर (मप्र), NIT:

भारत में लैंगिक समानता की चर्चा अब केवल महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रह सकती। बीते दशकों में महिलाओं की शिक्षा और सार्वजनिक भागीदारी में उल्लेखनीय बदलाव हुए हैं, लेकिन मूल सवाल अब भी बना हुआ है कि महिलाओं का अपने समय, श्रम, आय, संपत्ति, गतिशीलता, डिजिटल संसाधनों और जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों पर वास्तविक नियंत्रण कितना है।
लैंगिक समानता के अगले चरण में यह देखना आवश्यक होगा कि महिलाओं को अवसर मिला या नहीं, से आगे बढ़कर यह समझा जाए कि उस अवसर और उससे जुड़े संसाधनों पर नियंत्रण किसका है।
विश्व आर्थिक मंच की Global Gender Gap Report 2026 के अनुसार भारत का समग्र लैंगिक समानता स्कोर 64.5 प्रतिशत रहा और 145 अर्थव्यवस्थाओं में भारत 131वें स्थान पर रहा। रिपोर्ट में आर्थिक भागीदारी एवं अवसर की समानता 41.2 प्रतिशत, श्रम-बल भागीदारी की समानता 44.1 प्रतिशत तथा legislators, senior officials और managers के स्तर पर समानता केवल 13.1 प्रतिशत दर्ज की गई। वहीं शिक्षा के क्षेत्र में लैंगिक समानता लगभग 96.6 प्रतिशत रही। ये आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में हुई प्रगति अपने आप आर्थिक शक्ति और निर्णय-शक्ति में समानता में परिवर्तित नहीं हुई है।
भारत सरकार के Women and Men in India 2025 में भी लैंगिक स्थिति को जनसंख्या, स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक भागीदारी, निर्णय-निर्माण, हिंसा और सतत विकास लक्ष्यों सहित विभिन्न आयामों में देखने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। ऐसे में भारत में लैंगिक समानता का अध्ययन बहुआयामी सामाजिक शोध के रूप में किया जाना आवश्यक है।
महिला का सबसे अदृश्य संसाधन है समय
लैंगिक असमानता को समझने का एक महत्वपूर्ण, लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चित पक्ष महिलाओं का समय है। Time Use Survey 2024 के अनुसार 15 से 59 वर्ष आयु वर्ग में रोजगार संबंधी गतिविधियों में पुरुषों की भागीदारी लगभग 75 प्रतिशत और महिलाओं की करीब 25 प्रतिशत थी। इसके विपरीत बिना भुगतान वाले घरेलू कार्यों में महिलाओं की भागीदारी 92.9 प्रतिशत, जबकि पुरुषों की 30.4 प्रतिशत रही।
रोजगार संबंधी गतिविधियों में भाग लेने वाली महिलाओं ने औसतन लगभग 344 मिनट प्रतिदिन और पुरुषों ने 480 मिनट लगाए। वहीं बिना भुगतान वाले घरेलू कार्यों में महिलाओं ने लगभग 305 मिनट और पुरुषों ने 86 मिनट प्रतिदिन लगाए।
यह अंतर केवल घरेलू काम का नहीं, बल्कि समय की शक्ति का भी प्रश्न है। खाना बनाने, सफाई, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल तथा परिवार के दैनिक प्रबंधन में अधिक समय लगाने वाली महिलाओं के पास शिक्षा, रोजगार, उद्यमिता, सामाजिक भागीदारी और व्यक्तिगत विकास के लिए उपलब्ध स्वतंत्र समय कम हो सकता है।
इसी आधार पर Time Poverty यानी समय-गरीबी को लैंगिक समानता के स्वतंत्र सूचक के रूप में शामिल करने की आवश्यकता है। इसी क्रम में लेख में Care Burden Index की अवधारणा प्रस्तावित की गई है, जिसके माध्यम से महिलाओं और पुरुषों द्वारा बिना भुगतान वाले घरेलू तथा देखभाल संबंधी कार्यों में लगाए जाने वाले समय का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।
काम करने और आर्थिक शक्ति के बीच अंतर
किसी महिला का आर्थिक गतिविधि में शामिल होना अपने आप में पूर्ण आर्थिक सशक्तिकरण का प्रमाण नहीं है। कृषि, पशुपालन, पारिवारिक व्यवसाय, घरेलू उत्पादन और देखभाल-आधारित अर्थव्यवस्था में महिलाओं का योगदान महत्वपूर्ण है, लेकिन उनके श्रम का आर्थिक मूल्य और उस आय पर उनका नियंत्रण अलग-अलग प्रश्न हैं।
इसलिए भविष्य के शोध में Work–Income–Control Gap का अध्ययन आवश्यक है—महिला कितना काम करती है, उससे कितनी आय उत्पन्न होती है और उस आय के उपयोग का निर्णय कौन करता है।
इसी तरह Labour–Property Gap के माध्यम से महिला के श्रम और उसके नाम अथवा स्वतंत्र नियंत्रण में मौजूद भूमि, मकान, व्यवसाय तथा अन्य उत्पादक संपत्तियों के बीच अंतर को समझा जा सकता है।
संपत्ति अधिकार की वास्तविक परीक्षा
महिला का बैंक खाता होना महत्वपूर्ण है, लेकिन भूमि, मकान और उत्पादक संपत्ति पर उसका अधिकार आर्थिक सुरक्षा और परिवार के भीतर उसकी निर्णय-क्षमता को अधिक प्रभावित कर सकता है।
2025 में प्रकाशित Women’s Land Ownership in India: The Impact of Caste and Religion अध्ययन में NSSO के 77वें दौर के आंकड़ों के आधार पर महिलाओं के भूमि स्वामित्व में जाति और धर्म के आधार पर अंतर की चर्चा की गई है। इससे स्पष्ट होता है कि महिलाओं की स्थिति को केवल एक समान सामाजिक श्रेणी मानकर नहीं देखा जा सकता।
जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र, भूमि, शिक्षा, विवाह, customary law और परिवार की संरचना जैसे कारक महिला की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को अलग-अलग तरीके से प्रभावित कर सकते हैं।
आदिवासी महिलाओं की स्थिति भी बहुआयामी
आदिवासी समाजों में महिलाएं कृषि, वनोपज, पशुपालन, घरेलू अर्थव्यवस्था और सामुदायिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लेकिन श्रम में सक्रिय भागीदारी का अर्थ यह जरूरी नहीं कि भूमि, उत्तराधिकार, आय और सामुदायिक निर्णयों पर भी उनका समान नियंत्रण हो।
आदिवासी महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों पर हुए अध्ययनों में customary laws, tribal identity, परिवार और भूमि के बीच जटिल संबंधों को रेखांकित किया गया है। इसलिए आदिवासी महिलाओं को लेकर सामान्यीकृत निष्कर्षों के बजाय उनके श्रम, संपत्ति, आय, प्राकृतिक संसाधनों और सामुदायिक निर्णयों के बीच संबंधों का अध्ययन जरूरी है।
मातृवंशीय समाजों से भी मिलती है महत्वपूर्ण सीख
केरल के कुछ समुदायों में ऐतिहासिक रूप से मातृवंशीय परंपराएं रही हैं। हालांकि मातृवंशीयता को मातृसत्ता के समान मानना उचित नहीं है। केरल में मातृवंशीय व्यवस्था पर हुए अध्ययनों से संकेत मिलता है कि महिलाओं को संपत्ति और पारिवारिक संबंधों में कुछ अधिकार मिलने के बावजूद वास्तविक सामाजिक शक्ति व्यापक सामाजिक संरचनाओं से प्रभावित होती रही है।
इसी प्रकार मेघालय के खासी समाज में मातृवंशीय व्यवस्था महिलाओं को कुछ क्षेत्रों में तुलनात्मक सुरक्षा प्रदान करती है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि समाज के प्रत्येक राजनीतिक और सार्वजनिक क्षेत्र में महिलाओं का समान नियंत्रण है।
इससे लैंगिक शोध के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—वंश किसके माध्यम से चलता है, यह जानने के साथ-साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि अंतिम सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक निर्णय किसके हाथ में है।
जाति, प्रतिष्ठा और महिला की गतिशीलता
भारत में जाति, परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा, विवाह संबंध और महिलाओं की mobility के बीच संबंधों का भी अधिक व्यापक अध्ययन आवश्यक है। किसी एक जाति या सामाजिक समूह की सभी महिलाओं की स्थिति को एक जैसा मानना शोध की दृष्टि से उचित नहीं होगा।
इसके लिए Caste–Class–Property–Mobility Matrix जैसे विश्लेषणात्मक ढांचे का उपयोग किया जा सकता है, जिसमें जाति के साथ परिवार की आर्थिक स्थिति, भूमि स्वामित्व, शिक्षा, विवाह, ग्रामीण-शहरी स्थिति और महिला की स्वतंत्र गतिशीलता को एक साथ देखा जाए।
आर्थिक विकास और महिला स्वायत्तता
यह मान लेना भी उचित नहीं कि अधिक आर्थिक विकास वाले क्षेत्रों में महिलाओं की घरेलू स्वायत्तता स्वतः अधिक होगी। NFHS-5 आधारित अध्ययनों में घरेलू निर्णय-स्वायत्तता और mobility autonomy के बीच अंतर सामने आया है।
इसी आधार पर Development–Autonomy Paradox को आगे के शोध की अवधारणा के रूप में देखा जा सकता है। किसी क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, आय और शहरीकरण बढ़ने के बावजूद महिलाओं की mobility, संपत्ति पर नियंत्रण और परिवार में अंतिम निर्णय-शक्ति उसी अनुपात में बढ़े, यह आवश्यक नहीं है।
भागीदारी और नियंत्रण में अंतर
लैंगिक समानता का एक महत्वपूर्ण अंतर भागीदारी और नियंत्रण के बीच है। महिला से राय ली जा सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय कोई अन्य व्यक्ति ले सकता है। महिला के नाम बैंक खाता या संपत्ति हो सकती है, लेकिन उसका वास्तविक उपयोग और निर्णय कोई अन्य व्यक्ति कर सकता है।
इसलिए Decision Control Gap की अवधारणा महत्वपूर्ण हो सकती है। इसके तहत भागीदारी, प्रभाव, स्वतंत्र निर्णय, संसाधनों पर नियंत्रण और अंतिम निर्णय—इन पांच स्तरों का अध्ययन किया जा सकता है।
डिजिटल स्वतंत्रता भी लैंगिक समानता का नया क्षेत्र
मोबाइल फोन, इंटरनेट और डिजिटल भुगतान ने महिला सशक्तिकरण के अर्थ को बदल दिया है। मोबाइल आज शिक्षा, बैंकिंग, रोजगार, सरकारी योजनाओं, सूचना और आपातकालीन सहायता का महत्वपूर्ण माध्यम है।
NITI Aayog के SDG Goal-5 संकेतकों में NFHS-5 के आधार पर महिलाओं द्वारा स्वयं उपयोग किए जाने वाले मोबाइल फोन का राष्ट्रीय स्तर 53.9 प्रतिशत दर्ज किया गया है।
लेकिन डिजिटल समानता को केवल मोबाइल फोन रखने तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि मोबाइल और SIM किसके नियंत्रण में है, पासवर्ड कौन जानता है, बैंकिंग और UPI का उपयोग कौन करता है तथा इंटरनेट पर सूचना तक महिला की स्वतंत्र पहुंच कितनी है।
इसी आधार पर Digital Gender Autonomy Index प्रस्तावित किया गया है, जिसमें Device Access, Personal SIM, Password Control, Financial Use, Information Access और Independent Digital Decision जैसे आयाम शामिल किए जा सकते हैं।
बैंक खाता ही पर्याप्त नहीं
महिला का बैंक खाता होना वित्तीय समावेशन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन यह अंतिम परिणाम नहीं है। खाते का स्वयं संचालन, अपनी आय उसमें जमा करना और उस आय के उपयोग पर स्वतंत्र निर्णय लेना अलग-अलग स्तर हैं।
इसलिए महिला के वित्तीय सशक्तिकरण को Financial Inclusion → Financial Access → Financial Use → Financial Control → Household Bargaining Power की श्रृंखला के आधार पर समझा जा सकता है।
विवाह के बाद बदलती है महिला की स्वायत्तता
महिला की शिक्षा, रोजगार, आय, संपत्ति, mobility और डिजिटल स्वायत्तता का अध्ययन विवाह से पहले और बाद अलग-अलग किया जाना आवश्यक है। विवाह के बाद महिला का रोजगार जारी रह सकता है, कम हो सकता है अथवा समाप्त हो सकता है। इसी तरह उसकी mobility और घरेलू निर्णयों में भूमिका भी बदल सकती है।
इसलिए Marriage Transition Gender Index के माध्यम से विवाह से पहले और बाद शिक्षा, रोजगार, आय, समय-उपयोग, mobility, संपत्ति, डिजिटल संसाधन और निर्णय-शक्ति में आए बदलावों का अध्ययन किया जा सकता है।
परिवार को भी बनाया जाए शोध की इकाई
भारत जैसे पारिवारिक समाज में लैंगिक शक्ति को समझने के लिए केवल व्यक्ति को शोध की इकाई बनाना पर्याप्त नहीं है। परिवार के भीतर संसाधनों और निर्णयों का वितरण भी अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय होना चाहिए।
इसके लिए Family Gender Power Map बनाया जा सकता है। इसमें जमीन का स्वामित्व, बैंक खाते का उपयोग, आय पर नियंत्रण, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य संबंधी निर्णय, महिला की स्वतंत्र mobility, नौकरी या व्यवसाय का निर्णय और संकट की स्थिति में महिला के स्वतंत्र आर्थिक संसाधनों का आकलन किया जा सकता है।
घरेलू श्रम का नया मूल्यांकन जरूरी
महिलाओं के unpaid care work को आर्थिक और सामाजिक रूप से अदृश्य मानना लैंगिक समानता के अध्ययन की प्रमुख चुनौतियों में से एक है। Time Use Survey ने घरेलू और देखभाल संबंधी कार्यों में महिलाओं के योगदान को मापने का महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध कराया है।
इसी आधार पर Care Credit और Care Time Registry जैसी अवधारणाओं पर शोध किया जा सकता है। इसका उद्देश्य घरेलू काम को तत्काल वेतन में बदलना नहीं, बल्कि नीति और सामाजिक आंकड़ों में care work के समय तथा आर्थिक महत्व को व्यवस्थित रूप से दर्ज करना होना चाहिए।
भारत का क्षेत्रीय लैंगिक सामाजिक मानचित्र
भारत को लैंगिक समानता के मामले में एक समान सामाजिक इकाई के रूप में देखना उचित नहीं होगा। अलग-अलग क्षेत्रों में विवाह, mobility, महिला श्रम, संपत्ति अधिकार, प्राकृतिक संसाधनों, उद्यमिता, स्वयं सहायता समूहों, मातृवंशीय व्यवस्था और सामुदायिक शासन की भूमिका अलग-अलग है।
इसलिए प्रत्येक राज्य को केवल एक Gender Rank देने के बजाय Regional Gender Social Map तैयार किया जाना चाहिए। इसमें महिला श्रम-भागीदारी, unpaid care, भूमि-अधिकार, बैंकिंग, मोबाइल उपयोग, household decision-making, mobility और सार्वजनिक प्रतिनिधित्व जैसे विभिन्न आयामों को अलग-अलग देखा जा सकता है।
जिला स्तर पर लैंगिक समानता का ऑडिट
एक अन्य महत्वपूर्ण पहल District Gender Equality Audit हो सकती है। इसमें अधिकार, पहुंच, उपयोग, नियंत्रण और परिणाम—इन पांच स्तरों पर योजनाओं और उनकी वास्तविक प्रभावशीलता का अध्ययन किया जाए।
किसी योजना से कितनी महिलाओं को लाभ मिला, यह पहला प्रश्न होना चाहिए। इसके बाद यह देखना जरूरी है कि उस लाभ का उपयोग किसने किया, संसाधन पर नियंत्रण किसका रहा और उससे महिला की वास्तविक स्वतंत्रता कितनी बढ़ी।
इस प्रकार सरकारी योजनाओं के मूल्यांकन को केवल Beneficiary Counting से आगे बढ़ाकर Empowerment Measurement की दिशा में ले जाया जा सकता है।
प्रस्तावित Women’s Real Power Index
इस शोध का केंद्रीय प्रस्ताव Women’s Real Power Index (WRPI) हो सकता है। यह वर्तमान में कोई आधिकारिक सरकारी सूचकांक नहीं, बल्कि भविष्य के शोध के लिए प्रस्तावित विश्लेषणात्मक ढांचा है।
इसमें छह प्रमुख आयाम रखे जा सकते हैं—Time Power, Economic Power, Property Power, Mobility Power, Digital Power और Decision Power। प्रत्येक आयाम को Access, Use, Control और Decision के स्तर पर मापा जा सकता है।
इस आधार पर लैंगिक समानता की नई कार्यपरिभाषा सामने आती है—
लैंगिक समानता = अवसर + पहुंच + उपयोग + नियंत्रण + निर्णय।
निष्कर्ष
भारत में लैंगिक समानता की कहानी केवल प्रगति या पिछड़ेपन की कहानी नहीं है, बल्कि अलग-अलग सामाजिक क्षेत्रों में अलग गति से बदलती शक्ति-संरचना की कहानी है। शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति के बावजूद आर्थिक नेतृत्व में अंतर दिखाई देता है। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी के बावजूद unpaid domestic work का बोझ काफी अधिक है। आदिवासी महिलाओं की आर्थिक और सामुदायिक सक्रियता के बावजूद संपत्ति और उत्तराधिकार के प्रश्न जटिल हैं। मातृवंशीय समाजों में महिलाओं को कुछ क्षेत्रों में तुलनात्मक अधिकार मिल सकते हैं, लेकिन इससे राजनीतिक सत्ता स्वतः महिलाओं के हाथों में नहीं आती। इसी तरह आर्थिक विकास और डिजिटल पहुंच बढ़ने के बावजूद घरेलू स्वायत्तता तथा डिजिटल नियंत्रण की स्थिति अलग-अलग हो सकती है।
इसलिए भारत में लैंगिक समानता का अगला चरण इस सवाल से आगे बढ़ना चाहिए कि “महिलाएं कितनी आगे आईं?” और यह पूछना चाहिए कि “महिलाओं के हाथ में वास्तविक नियंत्रण कितना आया?”
यही इस शोध का केंद्रीय विचार है—Participation से Power, Access से Control और Representation से Real Decision-Making की ओर परिवर्तन।
वास्तविक लैंगिक समानता का आकलन तब अधिक व्यापक होगा, जब महिला को केवल किसी योजना की लाभार्थी, परिवार के निर्णय की सहभागी या अर्थव्यवस्था की श्रमिक के रूप में नहीं, बल्कि अपने समय, श्रम, आय, संपत्ति, डिजिटल संसाधनों, गतिशीलता और जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों पर वास्तविक नियंत्रण रखने वाली नागरिक के रूप में देखा जाए।
इसीलिए भविष्य के लैंगिक शोध के सामने चार मूल प्रश्न रखे जा सकते हैं—अधिकार किसके पास है? संसाधन किसके पास है? नियंत्रण किसके पास है? और अंतिम निर्णय किसके पास है? इन चारों प्रश्नों के उत्तरों के बीच का अंतर भारत में लैंगिक असमानता की वास्तविक तस्वीर को अधिक स्पष्ट कर सकता है।
प्रस्तावित नवीन शोध-सूचकांक
Women’s Real Power Index (WRPI) — महिला की वास्तविक निर्णय-शक्ति।
Time Poverty Index (TPI) — महिला के स्वतंत्र नियंत्रण में उपलब्ध समय।
Work–Income–Control Gap (WICG) — श्रम और आय पर नियंत्रण का अंतर।
Labour–Property Gap (LPG) — श्रम और संपत्ति-अधिकार का अंतर।
Decision Control Gap (DCG) — निर्णय में भागीदारी और अंतिम नियंत्रण का अंतर।
Digital Gender Autonomy Index (DGAI) — डिजिटल पहुंच से डिजिटल नियंत्रण तक।
Marriage Transition Gender Index (MTGI) — विवाह से पहले और बाद स्वायत्तता में परिवर्तन।
Family Gender Power Map (FGPM) — परिवार के भीतर वास्तविक शक्ति-वितरण।
Care Burden Index (CBI) — unpaid care work का लैंगिक भार।
Regional Gender Social Map (RGSM) — राज्य एवं क्षेत्र के सामाजिक-लैंगिक स्वरूप का बहुआयामी मानचित्र।
(श्रीप्रकाश सिंह निमराजे, अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर)
