ईरान-इजराइल युद्ध, भारत के हित और आम आदमी पर असर | New India Times

Edited by Sabir Khan, Mumbai, NIT:

लेखक: तैयब जफर

पश्चिम एशिया में ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। इस संघर्ष का असर केवल संबंधित देशों तक सीमित रहने की आशंका नहीं है, बल्कि ऊर्जा, व्यापार, परिवहन और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। भारत भी इस स्थिति से अछूता नहीं है। पेट्रोल-डीजल, गैस, खाद, समुद्री व्यापार और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों पर युद्ध का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है।
ऐसे हालात में सबसे अधिक दबाव आम आदमी, किसान, मजदूर और छोटे कारोबारियों पर पड़ता है। इसी बीच वंचित बहुजन आघाड़ी के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रकाश आंबेडकर ने 1 अक्टूबर को मुंबई के सीएसएमटी पर ‘हम ईरान के साथ हैं’ के शीर्षक से विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है।
इस प्रदर्शन को केवल ईरान के समर्थन के रूप में देखना पूरे मुद्दे को सीमित कर देगा। इसके पीछे भारत की विदेश नीति, राष्ट्रीय हित और वैश्विक शक्तियों के बीच भारत के स्वतंत्र निर्णय जैसे महत्वपूर्ण सवाल भी जुड़े हैं। सवाल यह है कि भारत की विदेश नीति किसके हित में होनी चाहिए और क्या भारत को अपने फैसले स्वतंत्र रूप से लेने का अधिकार होना चाहिए?

ईरान और भारत के पुराने संबंध
ईरान भारत के लिए कोई अपरिचित देश नहीं है। दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक, व्यापारिक और सामाजिक संबंध रहे हैं। आजादी के बाद दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध स्थापित हुए और समय के साथ व्यापार, ऊर्जा तथा क्षेत्रीय संपर्क के क्षेत्रों में संबंध मजबूत हुए।
ईरान भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके माध्यम से मध्य एशिया तक पहुंच का एक महत्वपूर्ण मार्ग उपलब्ध होता है। इसी उद्देश्य से भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह में निवेश किया है।
चाबहार भारत के लिए केवल एक बंदरगाह नहीं, बल्कि अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का वैकल्पिक व्यापारिक मार्ग भी है। इसके माध्यम से भारत पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए क्षेत्र के अन्य देशों तक अपनी व्यापारिक पहुंच बढ़ा सकता है।

युद्ध का असर आम आदमी की जेब तक
आम भारतीय के मन में यह सवाल उठ सकता है कि ईरान-इजराइल युद्ध का उसके घर से क्या संबंध है? इसका एक बड़ा जवाब है- तेल।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। पश्चिम एशिया से तेल और गैस की आपूर्ति के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल है। क्षेत्र में तनाव बढ़ने पर तेल और गैस की आपूर्ति तथा जहाजों के परिवहन खर्च पर असर पड़ सकता है।
पेट्रोल और डीजल महंगा होने पर परिवहन लागत बढ़ सकती है। परिवहन महंगा होने से बाजार में पहुंचने वाली वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। खाद महंगी होने पर किसानों की लागत बढ़ेगी। बिजली और उत्पादन लागत बढ़ने से उद्योग प्रभावित हो सकते हैं। इसका अंतिम असर आम आदमी के घरेलू बजट पर पड़ सकता है।

खाड़ी देशों में भारतीयों की सुरक्षा भी अहम
खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक काम करते हैं। इनमें मजदूर, ड्राइवर, इंजीनियर, कारोबारी और विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत पेशेवर शामिल हैं। इनकी कमाई से भारत में लाखों परिवारों का भरण-पोषण होता है।
यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष और बढ़ता है तो वहां रह रहे भारतीयों की सुरक्षा, रोजगार और आवागमन प्रभावित हो सकता है। ऐसे में भारत के लिए क्षेत्र में तनाव कम करने और कूटनीतिक प्रयासों को मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा।

‘हम ईरान के साथ हैं’ का क्या अर्थ?
‘हम ईरान के साथ हैं’ का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि भारत युद्ध का समर्थन करे या किसी अन्य देश के खिलाफ सैन्य संघर्ष में शामिल हो। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि भारत को अमेरिका, इजराइल या अन्य देशों के साथ अपने संबंध समाप्त कर देने चाहिए।
भारत की विदेश नीति का आधार राष्ट्रीय हित, संप्रभुता, सुरक्षा और आर्थिक जरूरतें होनी चाहिए। भारत के अमेरिका के साथ व्यापार, रक्षा और तकनीक सहित कई क्षेत्रों में संबंध हैं। वहीं रूस, ईरान, इजराइल और खाड़ी देशों के साथ भी भारत के अलग-अलग स्तर पर महत्वपूर्ण संबंध हैं।
भारत की ताकत इस बात में है कि वह सभी देशों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार संबंध बनाए रखे और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को कायम रखे।

ईरान से भारत को क्या लाभ?
ईरान के साथ भारत के संबंध ऊर्जा, व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। ईरान के पास तेल और गैस के बड़े भंडार हैं। भविष्य में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में कमी आने पर ईरान भारत के लिए ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है।
व्यापार के क्षेत्र में भी ईरान भारतीय चावल, दवाइयों, चाय, मशीनरी और अन्य वस्तुओं के लिए महत्वपूर्ण बाजार है।
सबसे महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह है, जिसके जरिए भारत अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बना सकता है। इसके अलावा ईरान भारत को रूस और मध्य एशिया के साथ वैकल्पिक व्यापारिक संपर्क उपलब्ध कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

भारत को अपने हित में लेना चाहिए फैसला
भारत की विदेश नीति का मूल आधार भारतीय राष्ट्रीय हित होना चाहिए। ईरान के साथ संबंध हों या अमेरिका, रूस, इजराइल और खाड़ी देशों के साथ—हर मामले में भारत की संप्रभुता, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और जनता के हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
किसी दूसरे देश का एजेंडा भारत की विदेश नीति का आधार नहीं बनना चाहिए। एक स्वतंत्र देश के रूप में भारत को अपने हितों के अनुसार विदेश नीति संबंधी निर्णय लेने चाहिए।

विदेश नीति का असर आम जनता पर भी
विदेश नीति को केवल सरकार और राजनयिक संस्थाओं का विषय नहीं माना जा सकता। इसके फैसलों का असर किसान, मजदूर, युवा, छोटे कारोबारी, मध्यमवर्गीय परिवारों और विदेशों में रोजगार करने वाले भारतीयों तक पहुंचता है।
इसीलिए पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति पर देश में व्यापक और तथ्यपरक चर्चा जरूरी है। सवाल यह भी है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए वैकल्पिक रास्ते किस तरह बनाए रखे, चाबहार जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट को किस तरह आगे बढ़ाए और युद्ध के बजाय शांति एवं कूटनीति को किस प्रकार प्राथमिकता दे।

युद्ध नहीं, शांति और कूटनीति जरूरी
ईरान के नागरिक हों, फिलिस्तीन के लोग हों या किसी भी देश के आम नागरिक—युद्ध का सबसे बड़ा खामियाजा आम लोगों को ही भुगतना पड़ता है। इसलिए संघर्षों का समाधान बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों के जरिए निकालने की कोशिश होनी चाहिए।
भारत के लिए भी जरूरी है कि वह अपने राष्ट्रीय हित, संप्रभुता और स्वतंत्र विदेश नीति को कायम रखते हुए सभी संबंधित देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखे।
‘हम ईरान के साथ हैं’ का नारा इसी व्यापक बहस से जुड़ा हुआ है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत अपनी विदेश नीति किस प्रकार तय करे और अपने राष्ट्रीय हितों, आर्थिक सुरक्षा तथा आम जनता के भविष्य को किस तरह प्राथमिकता दे।

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