तीन एकड़ खेती और 30 साल के संघर्ष से दो बेटियों को बनाया डॉक्टर | New India Times

मक़सूद अली, ब्यूरो चीफ, यवतमाल (महाराष्ट्र), NIT:

तीन एकड़ खेती और 30 साल के संघर्ष से दो बेटियों को बनाया डॉक्टर | New India Times

सीमित जमीन, साधारण आमदनी और वर्षों के संघर्ष के बावजूद मेहनत, ईमानदारी और शिक्षा के दम पर परिवार की तस्वीर बदलने वाले घाटंजी तहसील के भाबोरा निवासी दुर्योधन शेरसिंग जाधव की कहानी प्रेरणादायी है। महज तीन एकड़ खेती और करीब 30 वर्षों की नौकरी के सहारे उन्होंने न केवल परिवार का भरण-पोषण किया, बल्कि अपनी दोनों बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाकर डॉक्टर बनाने का सपना भी साकार किया।
दुर्योधन जाधव के पिता शेरसिंग नथू जाधव ने रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में परिवार के साथ कई कठिन परिस्थितियों का सामना किया। कुछ समय आर्णी तहसील के अंजी में रहने के बाद मेहनत से जुटाई गई रकम से तीन एकड़ जमीन खरीदी। बाद में परिवार पहूर पहुंचा। इसी संघर्षपूर्ण माहौल में दुर्योधन जाधव ने दिग्रस से स्नातक की शिक्षा पूरी की और रोजगार की तलाश शुरू की।
स्थायी नौकरी मिलना आसान नहीं था। इसी दौरान पहूर के उद्यमी दीपचंद राठी ने उनकी मेहनत और ईमानदारी को देखते हुए उन्हें यवतमाल में काम का अवसर दिया। जाधव ने इस विश्वास को अपनी मेहनत से कायम रखा और करीब तीन दशक तक पूरी निष्ठा के साथ नौकरी की। नौकरी के साथ उन्होंने खेती की जिम्मेदारी भी संभाली।

बच्चों की शिक्षा को बनाया प्राथमिकता

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आर्थिक सीमाओं के बावजूद दुर्योधन जाधव ने बच्चों की शिक्षा से कभी समझौता नहीं किया। उनका मानना था कि शिक्षा ही परिवार की अगली पीढ़ी का भविष्य बदल सकती है। इसी सोच के चलते उन्होंने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर खर्च किया।
उनकी बड़ी बेटी डॉ. श्वेता जाधव ने नागपुर में चिकित्सा शिक्षा पूरी कर डॉक्टर बनने का सपना साकार किया। दूसरी बेटी स्नेहा जाधव जळगांव में मेडिकल शिक्षा प्राप्त कर रही हैं और वर्तमान में द्वितीय वर्ष में अध्ययनरत हैं। बेटा अंश जाधव भी उच्च शिक्षा की राह पर आगे बढ़ रहा है।

सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय
दुर्योधन जाधव की पहचान केवल एक मेहनतकश किसान और पिता के रूप में ही नहीं, बल्कि सामाजिक सहयोग के लिए तत्पर रहने वाले व्यक्ति के रूप में भी है। आर्णी तहसील के कई गांवों में बीमारी, दुखद प्रसंग अथवा जरूरत के समय लोगों की मदद के लिए आगे आने के कारण ग्रामीणों के बीच उनकी अलग पहचान बनी है। मिलनसार स्वभाव और सहयोग की भावना के चलते लोग उन्हें भरोसेमंद व्यक्ति के रूप में देखते हैं।
तीन एकड़ खेती, सीमित संसाधन और वर्षों के संघर्ष के बीच बच्चों की शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर दुर्योधन जाधव ने साबित किया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मेहनत और शिक्षा के सहारे परिवार का भविष्य बदला जा सकता है। उनकी संघर्षगाथा ग्रामीण और मेहनतकश परिवारों के लिए प्रेरणा बन गई है।

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