नाग पंचमी को सर्प पूजा तक सीमित करना उचित नहीं, नाग परंपरा और बौद्ध धम्म के संबंधों पर शोध की ज़रूरत | New India Times

संदीप शुक्ला, ब्यूरो चीफ, ग्वालियर (मप्र), NIT:

नाग पंचमी भारतीय लोकजीवन में प्रचलित एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे सामान्यतः सर्प-पूजा से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि भारतीय साहित्य, बौद्ध परंपरा, लोकविश्वास, पुरातात्त्विक संकेतों, स्थाननामों और प्रकृति-केंद्रित जीवन-पद्धतियों के तुलनात्मक अध्ययन से ‘नाग’ की अवधारणा कहीं अधिक व्यापक और बहुस्तरीय दिखाई देती है। इसी विषय को लेकर गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने नाग पंचमी, नाग परंपरा और बौद्ध धम्म के संबंधों पर एक शोधपरक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है।

उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य और धार्मिक परंपराओं में ‘नाग’ शब्द का प्रयोग सर्प, सर्पाकार दिव्य सत्ता तथा कुछ संदर्भों में नागराज या नाग-समुदाय के लिए हुआ है। बौद्ध साहित्य में भी नागों से संबंधित अनेक कथाएँ मिलती हैं। मुचलिंद नागराज और बुद्ध का प्रसंग बौद्ध परंपरा में नाग और बुद्ध के संबंध का प्रमुख उदाहरण है। परंपरा के अनुसार बुद्ध के ज्ञानप्राप्ति के बाद जब वे ध्यान में स्थित थे, तब तेज वर्षा के दौरान मुचलिंद नागराज ने अपने फन से उनकी रक्षा की। बौद्ध कला में मुचलिंद बुद्ध की प्रतिमाएँ भारत सहित दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई क्षेत्रों में देखने को मिलती हैं।

श्री निमराजे के अनुसार नाग को केवल सर्प के रूप में देखने के बजाय प्रकृति, जल, वर्षा, कृषि और जैव-विविधता से जुड़े सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में भी अध्ययन किया जा सकता है। भारतीय लोकपरंपराओं में नाग प्रतीक को कई स्थानों पर जलस्रोतों, वर्षा और उर्वरता से जोड़ा गया है। कृषि समाज में सर्प पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं और कई सर्प प्रजातियाँ चूहों जैसे कृषि-हानिकारक जीवों की संख्या नियंत्रित करने में योगदान देती हैं। इस दृष्टि से नाग पंचमी को प्रकृति और जैव-विविधता के प्रति प्राचीन समाज की संवेदनशीलता से जोड़कर भी देखा जा सकता है।

उन्होंने इतिहास-लेखन के संदर्भ में कहा कि इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि समाज, समुदाय, श्रम, संस्कृति, धर्म, लोकविश्वास, भाषा, प्रकृति और सामूहिक स्मृतियों का भी इतिहास है। भारतीय इतिहास के विभिन्न कालखंडों में लिखित अभिलेखों और ज्ञान-संरक्षण की प्रक्रिया सभी सामाजिक समूहों का समान रूप से प्रतिनिधित्व नहीं कर सकी। इसके कारण अनेक लोकपरंपराएँ, मौखिक इतिहास, लोकगीत, स्थाननाम, धार्मिक कथाएँ, स्मारक और स्थानीय सामाजिक स्मृतियाँ व्यवस्थित लिखित इतिहास का हिस्सा कम बन सकीं।

हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका अर्थ उपलब्ध इतिहास को असत्य मानना नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि लिखित इतिहास के साथ लोकइतिहास और सामाजिक स्मृति का भी वैज्ञानिक परीक्षण किया जाए। लोकस्मृति को सीधे ऐतिहासिक प्रमाण मानने के बजाय उसे शोध का आधार बनाया जाना चाहिए और उसके समर्थन में पुरातत्व, अभिलेख, साहित्य, सिक्के तथा अन्य प्रमाणों की जाँच की जानी चाहिए।

भारतीय इतिहास में नाग नाम से जुड़े विभिन्न राजवंशों और राजनीतिक इकाइयों का उल्लेख भी मिलता है। मध्य भारत और उत्तर भारत के प्रारंभिक ऐतिहासिक काल में नाग नाम से संबंधित राजनीतिक शक्तियों का अध्ययन किया गया है। लेकिन अलग-अलग काल और क्षेत्रों में मिले नाग संबंधी उल्लेखों को एक ही अखिल-भारतीय ऐतिहासिक नागवंश का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। अनंत, वासुकी, शेष, पद्म, कर्कोटक और तक्षक जैसे नाम भारतीय धार्मिक एवं साहित्यिक परंपराओं में विभिन्न संदर्भों में मिलते हैं, लेकिन इन सभी को एक ही ऐतिहासिक राजवंश के क्रमिक शासक मानने के लिए पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

नागार्जुन के संदर्भ में भी सावधानी आवश्यक है। महायान बौद्ध दर्शन के प्रमुख दार्शनिक नागार्जुन के संबंध में बाद की बौद्ध परंपराओं में नागलोक और प्रज्ञापारमिता साहित्य से जुड़ी कथाएँ मिलती हैं। हालांकि उन्हें किसी ऐतिहासिक नाग समुदाय का सदस्य मानने के लिए पर्याप्त स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए परंपरा और प्रमाणित इतिहास के बीच अंतर करना आवश्यक है।

नाग पंचमी की उत्पत्ति के संबंध में भी विभिन्न लोकव्याख्याएँ प्रचलित हैं। कुछ व्याख्याएँ इसे प्राचीन नाग समुदायों अथवा नागवंशीय परंपराओं से जोड़ती हैं। यह एक महत्वपूर्ण शोध-प्रश्न हो सकता है, लेकिन नाग पंचमी की उत्पत्ति को किसी एक ऐतिहासिक नागवंश की राजनीतिक सभा या परंपरा से जोड़ने के लिए वर्तमान में पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इस विषय को निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय आगे के शोध का विषय बनाया जाना चाहिए।

नाग पंचमी में महिलाओं की सहभागिता और जलस्रोतों से जुड़े स्थानीय अनुष्ठान भी सामाजिक इतिहास के अध्ययन का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में नदी, तालाब, कुएँ और अन्य जलस्रोतों से जुड़े अनुष्ठानों की परंपराएँ मिलती हैं। इनका अध्ययन जल, परिवार, कृषि, प्रकृति और महिलाओं की सामाजिक भूमिका के संदर्भ में किया जा सकता है।

बौद्ध सांस्कृतिक संसार में नाग प्रतीक भारत से बाहर भी दिखाई देता है। श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई बौद्ध सांस्कृतिक क्षेत्रों में नाग कला, वास्तुकला और लोकपरंपराओं में महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में मौजूद हैं। बौद्ध मंदिरों और स्मारकों की कला में नागाकार संरचनाएँ इसके उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। इससे यह अध्ययन का विषय बनता है कि विभिन्न क्षेत्रों में नाग प्रतीक ने बौद्ध संस्कृति के साथ किस प्रकार के सांस्कृतिक रूप ग्रहण किए।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और नाग परंपरा के संबंध में भी श्री निमराजे ने प्रमाण-आधारित अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि डॉ. आंबेडकर ने भारतीय सामाजिक इतिहास और बौद्ध धम्म को सामाजिक समानता के संदर्भ में महत्वपूर्ण रूप से देखा। बाद की अनेक सामाजिक व्याख्याओं में नाग परंपरा को बौद्ध धम्म और सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा गया है, लेकिन डॉ. आंबेडकर के विचारों की व्याख्या करते समय उनके मूल ग्रंथों और भाषणों को प्राथमिक स्रोत माना जाना चाहिए तथा बाद की लोकव्याख्याओं को उनके प्रत्यक्ष कथन के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।

14 अक्टूबर 1956 को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने नागपुर में बौद्ध धम्म की दीक्षा ग्रहण की। इसके बाद नागपुर आधुनिक बौद्ध पुनर्जागरण के प्रमुख केंद्रों में स्थापित हुआ। हालांकि आधुनिक नागपुर की बौद्ध पहचान को प्राचीन नागवंश से सीधे जोड़ने के लिए अलग ऐतिहासिक प्रमाण आवश्यक हैं। इसलिए आधुनिक बौद्ध पुनर्जागरण और प्राचीन नाग परंपरा का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है, लेकिन दोनों को स्वतः समान मानना उचित नहीं होगा।

श्री निमराजे के अनुसार नाग पंचमी और नाग परंपरा के अध्ययन के लिए बहुविषयी शोध की आवश्यकता है। इसके अंतर्गत पाली एवं संस्कृत बौद्ध साहित्य, जातक साहित्य, विनय और सुत्त साहित्य में नाग संदर्भ, पुरातात्त्विक स्थलों का सर्वेक्षण, नाग नाम वाले स्थानों का अध्ययन, प्राचीन सिक्कों और अभिलेखों का परीक्षण, बौद्ध गुफाओं एवं स्तूपों की कला, नाग-मूर्तियों और नाग आइकनोग्राफी का अध्ययन, स्थानीय लोककथाओं और मौखिक इतिहास का दस्तावेजीकरण तथा विभिन्न क्षेत्रों की नाग पंचमी परंपराओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जाना चाहिए।

विशेष रूप से मध्य भारत, उत्तर भारत और पूर्वोत्तर भारत के उन क्षेत्रों का अध्ययन उपयोगी हो सकता है, जहाँ नाग नाम से जुड़े स्थान, प्राचीन बौद्ध स्थल, स्तूप या चैत्य अवशेष, नाग प्रतिमाएँ, जलस्रोतों से जुड़ी लोकपरंपराएँ अथवा नाग पंचमी की विशिष्ट स्थानीय परंपराएँ मौजूद हैं।

उन्होंने कहा कि आधुनिक समय में नाग पंचमी को पर्यावरण संरक्षण से भी जोड़ा जा सकता है। सर्पों को पकड़कर प्रदर्शन करना या उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान करना संरक्षण की भावना के विपरीत है। पर्व का संदेश सर्प संरक्षण, जैव-विविधता, जल संरक्षण और प्रकृति के सम्मान से जोड़ा जाना चाहिए। धार्मिक आस्था के साथ वैज्ञानिक पर्यावरणीय चेतना को जोड़कर नाग पंचमी को समकालीन संदर्भ दिया जा सकता है।

श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने कहा कि नाग पंचमी को सीधे ‘बौद्ध पर्व’ घोषित करने से पहले पर्याप्त प्रमाणों की आवश्यकता है। हालांकि नाग और बौद्ध परंपरा के बीच साहित्यिक एवं कलात्मक संबंध प्रमाणित रूप से मौजूद हैं, इसलिए नाग पंचमी के वर्तमान स्वरूप और प्राचीन बौद्ध नाग परंपरा के बीच संभावित संबंधों पर शोध किया जाना महत्वपूर्ण अकादमिक विषय है।

उन्होंने कहा कि इतिहास का पुनर्पाठ इतिहास को मिटाना नहीं, बल्कि इतिहास के दायरे को व्यापक बनाना है। यदि किसी समुदाय की स्मृति लोकगीत में सुरक्षित है, किसी परंपरा का संकेत स्थाननाम में मिलता है या किसी धार्मिक कथा के पीछे पुरातात्त्विक संदर्भ की संभावना दिखाई देती है, तो उसकी वैज्ञानिक जाँच की जानी चाहिए।

उन्होंने कहा, “इतिहास को बदलना हमारा उद्देश्य नहीं है; इतिहास में जो प्रश्न छूट गए हैं, उन्हें पुनः पूछना हमारा उद्देश्य है। नाग केवल सर्प का प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में प्रकृति, जल, संरक्षण और प्राचीन परंपराओं के अध्ययन का भी महत्वपूर्ण प्रतीक है।”

उन्होंने आगे कहा कि नाग पंचमी को केवल सर्प-पूजा के पर्व के रूप में देखने के साथ-साथ प्रकृति, जल, कृषि, लोकसंस्कृति, सामाजिक स्मृति और बौद्ध सांस्कृतिक परंपरा के बहुआयामी संदर्भ में भी समझा जा सकता है। जहाँ प्रमाण उपलब्ध हैं, उन्हें प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए; जहाँ लोकपरंपरा है, उसे लोकस्मृति के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए और जहाँ प्रमाण अधूरे हैं, वहाँ उन्हें शोध-परिकल्पना के रूप में आगे की वैज्ञानिक जाँच के लिए रखा जाना चाहिए।

श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS)
ग्वालियर, मध्य प्रदेश, भारत

☸️ बुद्धं शरणं गच्छामि
🌿 प्रकृति का सम्मान — जीवन का सम्मान
🐍 नाग परंपरा का अध्ययन — भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण शोध-कड़ी

By nit

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