33 साल जेल में रहे सातारा के वीर सपूत इस्माईल नूरमोहम्मद हकीम, अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष में गंवाई संपत्ति, खिलाफत से भारत छोड़ो आंदोलन तक निभाई अहम भूमिका | New India Times

मक़सूद अली, सातारा (महाराष्ट्र), NIT:

33 साल जेल में रहे सातारा के वीर सपूत इस्माईल नूरमोहम्मद हकीम, अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष में गंवाई संपत्ति, खिलाफत से भारत छोड़ो आंदोलन तक निभाई अहम भूमिका | New India Times

देश की आजादी का इतिहास केवल बड़े नेताओं और चर्चित आंदोलनों तक सीमित नहीं है। हजारों ऐसे गुमनाम सेनानियों ने भी स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिन्होंने अपना घर-परिवार, संपत्ति और जीवन तक देश के लिए समर्पित कर दिया। सातारा के स्वतंत्रता सेनानी इस्माईल नूरमहंमद हकीम भी ऐसे ही जुझारू सेनानी थे। अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष करते हुए उन्होंने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष जेलों में बिताए और परिवार की संपत्ति तक कुर्बान कर दी।
1888 में सातारा शहर में जन्मे इस्माईल नूरमोहम्मद हकीम ने प्रारंभिक शिक्षा सातारा में प्राप्त की। बाद में नाशिक जिले के कलवण में सरकारी नौकरी की, लेकिन अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों और अन्याय के विरोध में उन्होंने नौकरी छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन का रास्ता अपनाया। खिलाफत आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के साथ उन्होंने कांग्रेस के माध्यम से भी स्वतंत्रता संघर्ष को मजबूती दी। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, 1911 में पुणे में बैरिस्टर गोखले के नेतृत्व में कांग्रेस से जुड़कर उन्होंने अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाई।
सरकारी हैट की होली ने बढ़ाई अंग्रेजों की नाराजगी
महाबलेश्वर में अंग्रेजी प्रशासन के विरोध में हकीम ने सरकारी ‘हैट’ की होली जलाने का आह्वान किया। उनके इस आंदोलन का व्यापक असर हुआ और कई भारतीय सरकारी अधिकारियों ने भी सरकारी हैट जलाकर अंग्रेजी शासन के प्रति विरोध जताया। इससे अंग्रेजी प्रशासन उनके खिलाफ हो गया। मुकदमे के बाद उनकी संपत्ति जब्त कर नीलाम कर दी गई। सातारा के देऊर स्थित खेत, मकान और अन्य संपत्तियां नीलाम होने से उनका परिवार आर्थिक संकट में आ गया।
बार-बार गिरफ्तारी, कठोर कारावास और यातनाएं
उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार हकीम को स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई बार गिरफ्तार किया गया। 1915 से 1920 तक उन्होंने सिंगापुर में कारावास की सजा भुगती। इसके बाद 1920-21 में कठोर कारावास, नागपुर झंडा सत्याग्रह में चार महीने की सजा और 1930 के जंगल सत्याग्रह में 15 महीने का कठोर कारावास तथा 100 रुपये जुर्माना भुगता। 1932 में 18 महीने, 1940 में छह महीने और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में गिरफ्तारी के बाद 11 महीने कठोर कारावास की सजा हुई। उन्हें सातारा जिला मध्यवर्ती कारागृह में भी रखा गया।
लगातार जेल यात्राओं और आर्थिक नुकसान के बावजूद हकीम का देश की आजादी के प्रति समर्पण कमजोर नहीं हुआ। उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलनों में लगातार सक्रिय भूमिका निभाई।
आजादी के बाद भी सक्रिय रहा राजनीतिक जीवन
स्वतंत्रता से पहले और बाद में भी हकीम कांग्रेस से जुड़े रहे। 1946 में उन्होंने लोकल बोर्ड का चुनाव कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में लड़ा, हालांकि मुस्लिम लीग के उम्मीदवार दादासाहेब नखाते से उन्हें पराजय मिली।
कराड में आयोजित एक सभा का प्रसंग भी उनकी बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाता है। महाराष्ट्र विधान परिषद के सभापति वि. स. पागे द्वारा उनकी उर्दू और अरबी भाषा की जानकारी पर सवाल उठाए जाने पर हकीम ने मंच पर ही दोनों भाषाओं में लिखकर अपनी विद्वता साबित की।
वसंतदादा पाटील, भिलारे गुरुजी, भाऊसाहेब सोमण और गणपतराव तपासे सहित स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कई नेताओं और कार्यकर्ताओं ने हकीम के संघर्ष और नेतृत्व को याद किया है। उनके नेतृत्व में अनेक कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस के लिए काम किया।
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इस्माईल नूरमोहम्मद हकीम जैसे सेनानियों को याद करना देश की आजादी के लिए दी गई कुर्बानियों को समझने का अवसर है। 33 वर्षों तक जेल, कठोर यातनाएं और संपत्ति की कुर्बानी सहने वाले इस सेनानी की गाथा को सरकारी अभिलेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की जरूरत है।

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