रहीम शेरानी हिन्दुस्तानी/पंकज बड़ोला, झाबुआ (मप्र), NIT:

संसार का प्रत्येक जीव सुख चाहता है, लेकिन वास्तव में कोई भी पूर्ण रूप से सुखी नहीं है। इसका कारण जानने की आवश्यकता है। परम वैभव के स्वामी चक्रवर्ती राजा भी सच्चे सुख की प्राप्ति के लिए भोग-सामग्री का त्याग कर देते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि वास्तविक सुख भोग में नहीं, बल्कि त्याग में निहित है। उक्त प्रेरणादायी विचार तत्त्वज्ञ पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी ने अणु संदेश के आलंबन पर आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि क्रोध का एक प्रमुख कारण स्वयं को बड़ा समझना है। जब व्यक्ति को किसी की आवश्यकता नहीं रहती, तब वह अपने अहंकार में स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगता है और यही भावना कषायों को जन्म देती है। जैसे बारिश से हरियाली आती है और हरियाली से पुनः बारिश होती है, उसी प्रकार इच्छाओं को महत्व देने से क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध सहित अन्य कषायों से इच्छाएँ बढ़ती हैं, जिससे संसार चक्र मजबूत होता जाता है।
धर्मेन्द्रमुनिजी ने कहा कि समस्त पापों का त्याग ही वास्तविक साधुत्व है। गृहस्थ जीवन में अधिकांश पापों से बच पाना कठिन होता है, लेकिन यदि व्यक्ति परिग्रह की मर्यादा अपनाए तो उसके पापों में काफी कमी आ सकती है। उन्होंने कहा कि आत्मा पर कर्मों के उदय से कषायों का प्रभाव बना रहता है, किंतु सम्यक ज्ञान और सम्यक दृष्टि व्यक्ति को विपरीत परिस्थितियों में भी शांत रहना सिखाती है। उन्होंने समझाया कि जिन परिस्थितियों पर हमारा नियंत्रण नहीं होता, उनमें क्रोध और चिड़चिड़ापन करना अंततः स्वयं का ही नुकसान करना है। इसलिए स्वयं को बड़ा समझने के बजाय विनम्र बनें, इच्छाओं को सीमित रखें और चिड़चिड़ापन दूर करने का प्रयास करें। जिस प्रकार चिकित्सक वात, पित्त और कफ का संतुलन बनाकर रोग का उपचार करता है, उसी प्रकार कषायों का पूर्ण क्षय ही आत्मकल्याण का मार्ग है।
प्रत्याख्यान ग्रहण करने के लाभ बताते हुए रोचक वक्ता पूज्य श्री संदीपमुनिजी ने कहा कि जब जीव पच्चक्खाण (प्रत्याख्यान) ग्रहण करता है, तब वह आश्रव के द्वारों और इच्छाओं का निरोध करता है तथा तृष्णा से मुक्त होकर शांति का अनुभव करता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या कोई जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद शपथ लेने पर ही वैधानिक रूप से पद ग्रहण करता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में भोग का त्याग तभी महान फलदायी बनता है जब उसे संकल्पपूर्वक स्वीकार किया जाए।
उन्होंने कहा कि संकल्प की विधि, उसके शब्दों और क्रम का सही ज्ञान नियमित अभ्यास से ही संभव है। पर्युषण पर्व में धर्म आराधना करने वालों को उन्होंने संदेश दिया कि पच्चक्खाण केवल औपचारिकता न होकर पूर्ण जागरूकता और सही क्रम से होना चाहिए। उन्होंने बताया कि भरत और ऐरावत क्षेत्र में व्रत एवं प्रत्याख्यान का अवसर अत्यंत दुर्लभ है। आज मोबाइल, चाय, तंबाकू, व्यसन और घूमने-फिरने जैसी आदतें व्यक्ति को व्रत और तप से दूर कर रही हैं, लेकिन दृढ़ संकल्प के साथ इन्हें छोड़ा जा सकता है। बाहरी व्यसनों और विषय-विकारों का त्याग करने पर ही व्यक्ति आंतरिक राग-द्वेष और कषायों से मुक्त होकर तप को निर्मल बना सकता है।
इस अवसर पर पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी ने आगम में वर्णित नन्दचक्र आराधना की विधि भी बताई। उन्होंने बताया कि इस तप में एक उपवास के बाद पारणा, फिर क्रमशः दो, चार और आठ उपवास कर पारणा तथा उतरते क्रम में पुनः चार, दो और एक उपवास किए जाते हैं। इस प्रकार 22 दिन तप और 7 दिन पारणा सहित कुल 29 दिनों की यह विशेष आराधना सम्पन्न होती है। तप के साथ दर्शन आराधना में 21 माला ‘णमो अरिहंताणं’, 12 लोगस्स का ध्यान, 12 णमोत्थुणम, 12 वंदना तथा चारित्र आराधना में सचित त्याग, ब्रह्मचर्य पालन और रात्रि चौविहार का भी विशेष महत्व बताया गया।
संघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया एवं प्रवक्ता पवन नाहर ने जानकारी दी कि गुरुदेव की प्रेरणा से लगभग 50 तपस्वियों ने 25 जुलाई से इस आराधना का शुभारंभ किया। बुधवार प्रातः नवकारसी के समय स्थानीय महावीर भवन में प्रथम उपवास का सामूहिक पारणा सम्पन्न कराया गया। वर्षीतप एवं नन्दचक्र आराधकों के पारणे का लाभ स्वर्गीय सुशीला देवी पटवा की जन्म जयंती के उपलक्ष्य में अलका एवं सुनील पटवा (उज्जैन) परिवार ने लिया। वहीं तपस्वियों की प्रभावना तथा नन्ही परी ईहा अनुलेश श्रीश्रीमाल के जन्मदिन के अवसर पर अनुपमा एवं मंगलेश श्रीश्रीमाल परिवार ने प्रभावना का लाभ प्राप्त किया। संपूर्ण आयोजन श्रीसंघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया एवं सचिव हितेश शाह के मार्गदर्शन में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।
