मो. मुजम्मिल, जुन्नारदेव/छिंदवाड़ा (मप्र), NIT:
जब हम भारत की स्वतंत्रता के 79 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहे हैं, तब ईसाई समुदाय के पास राष्ट्र के प्रति अपने योगदान पर गर्व करने के पर्याप्त कारण हैं। संख्या में कम होने के बावजूद भारतीय ईसाइयों ने राष्ट्र-निर्माण के विभिन्न क्षेत्रों—राजनीति, समाज, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा—में उल्लेखनीय योगदान दिया है। इसके बावजूद यह समुदाय कई बार दुष्प्रचार का शिकार रहा है। ऐसे में भारतीय ईसाइयों का दायित्व है कि वे लोगों के मन से यह गलत धारणा दूर करें कि ईसाई समुदाय राष्ट्रविरोधी या देश से विमुख है।
देशभक्ति हमेशा से ईसाई मूल्यों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। भारतीय ईसाई राष्ट्रीय भावना से गहराई से जुड़े रहे और उन्होंने संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक तरीकों को अपनाने को प्राथमिकता दी। भारतीय ईसाई नेताओं ने भारतीय राष्ट्रवाद के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता के बाद भी ईसाई समुदाय युवाओं को धर्मनिरपेक्षता, समानता और सार्वभौमिकता जैसे संवैधानिक मूल्यों की शिक्षा देने में सक्रिय रहा है।
सशस्त्र बलों, सिविल सेवाओं, शिक्षा, पुलिस, विज्ञान, चिकित्सा, खेल और समाज सेवा जैसे अनेक क्षेत्रों में भारतीय ईसाइयों ने अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज कराई है। वे देश के कई जनआंदोलनों में भी सक्रिय रूप से शामिल रहे हैं।
भारतीय ईसाइयों का स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र निर्माण में योगदान उल्लेखनीय रहा है। वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय कई भारतीय ईसाई ब्रिटिश प्रशासन में कार्यरत थे। प्रारंभ में वे ब्रिटिश शासन की वास्तविक मंशा से पूरी तरह परिचित नहीं थे, लेकिन समय के साथ जब उन्हें अंग्रेजों की नीतियों का एहसास हुआ, तब अनेक ईसाइयों ने भी स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन किया।
स्वराज आंदोलन के दौरान भारतीय ईसाइयों ने ज्ञापन प्रस्तुत कर राष्ट्रीय मांगों का समर्थन किया और स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी भागीदारी दर्ज कराई। वर्ष 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान बंबई (अब मुंबई) में आयोजित एक सम्मेलन में भारतीय ईसाइयों ने पूर्ण स्वराज के समर्थन में कई प्रस्ताव पारित किए। उन्होंने महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत का समर्थन किया तथा विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार में भी भाग लिया।
इस आंदोलन के प्रमुख ईसाई नेताओं में जे. सी. कुमारप्पा, थेवारथुडियिल टाइटस और जे. पी. रोड्रिग्स सहित अनेक नाम शामिल हैं। कई ईसाई महिलाओं ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कुमारप्पा के लेखन से ब्रिटिश सरकार नाराज़ हुई और उन्हें जेल भेज दिया गया। इसी प्रकार ईसाई नेता मसिल्लामणि को भी दंड का सामना करना पड़ा।
भारत की स्वतंत्रता किसी एक व्यक्ति, संगठन या समुदाय के प्रयासों का परिणाम नहीं थी, बल्कि यह देश के सभी वर्गों और समुदायों के संयुक्त संघर्ष का फल थी। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ईसाई नेताओं और समुदाय के योगदान को भी इतिहास में सम्मानपूर्वक याद किया जाता है।
