भूपेन्द्र पांडेय, प्रयागराज (यूपी), NIT:

प्रदेश सरकार भले ही पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त शासन का दावा कर रही हो, लेकिन उरुवा बाल विकास परियोजना विभाग इन दिनों गंभीर आरोपों के चलते चर्चा में है। विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं, जिनमें आंगनबाड़ी केंद्रों के संचालन, पोषाहार वितरण, निरीक्षण व्यवस्था और कथित अवैध वसूली जैसे मुद्दे शामिल हैं।
जानकारी के अनुसार, परियोजना के अंतर्गत संचालित 166 आंगनबाड़ी केंद्रों की निगरानी की जिम्मेदारी विभागीय सुपरवाइजरों पर है। आरोप है कि लंबे समय से प्रभावी निरीक्षण नहीं होने के कारण कई केंद्रों की व्यवस्था प्रभावित हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि नियमित निरीक्षण होता तो ऐसी स्थिति नहीं बनती।
विभाग में तैनात सुपरवाइजर हर्षिता सिंह सहित अन्य कर्मचारियों और सीडीपीओ अर्चना सिंह की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि विभागीय स्तर पर शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा, जिससे जवाबदेही कमजोर होती दिख रही है। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
सबसे गंभीर आरोप पोषाहार वितरण को लेकर सामने आए हैं। क्षेत्र में चर्चा है कि गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और बच्चों के लिए भेजा जाने वाला पोषाहार पूरी तरह लाभार्थियों तक नहीं पहुंच रहा, बल्कि कथित रूप से खुले बाजार में 250 से 300 रुपये प्रति बोरी तक बिक रहा है। यदि यह सच है तो यह योजनाओं के उद्देश्य पर बड़ा सवाल खड़ा करता है, हालांकि इसकी पुष्टि अभी तक किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा नहीं की गई है।
मामले में सुपरवाइजर हर्षिता सिंह से बातचीत करने पर उन्होंने विस्तृत प्रतिक्रिया देने से इनकार किया और कहा कि वह केवल सीडीपीओ के निर्देशों का पालन कर रही हैं। निरीक्षण व्यवस्था से जुड़े सवालों पर भी उन्होंने विभागीय स्तर पर जवाब दिए जाने की बात कही।
इससे पहले रजिस्टर जमा कराने और कथित वसूली को लेकर भी विवाद सामने आ चुका है। आरोप है कि मामला उजागर होने के बाद कई केंद्रों पर जल्दबाजी में रजिस्टर उपलब्ध कराए गए और औपचारिकताएं पूरी की गईं, जिससे विभागीय कार्यप्रणाली पर और सवाल खड़े हो गए हैं।
क्षेत्र के लोगों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि आरोप सही हैं तो दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, और यदि निराधार हैं तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट की जाए।
अब नजरें जिला प्रशासन और उच्च अधिकारियों पर टिकी हैं। देखना होगा कि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होती है या मामला औपचारिकताओं तक सीमित रह जाता है। क्षेत्र की जनता पारदर्शी कार्रवाई और जवाबदेही की प्रतीक्षा कर रही है।

