रहीम शेरानी हिन्दुस्तानी/पंकज बडोला, झाबुआ (मप्र), NIT:
मध्यप्रदेश में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की स्थिति आज ऐसी हो गई है, मानो एक व्यक्ति से एक साथ कई मोर्चों पर युद्ध लड़ने की अपेक्षा की जा रही हो। अलीराजपुर सहित पूरे प्रदेश में शिक्षक इन दिनों असाधारण कार्यभार और मानसिक दबाव के बीच काम करने को मजबूर हैं।
प्राथमिक-माध्यमिक-उच्च माध्यमिक शिक्षक संघ (पीएमयूएमएस) के जिलाध्यक्ष भंगुसिंह तोमर ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया कि वर्तमान परिदृश्य पर नजर डालें तो एक ओर जनगणना का कार्य जारी है, वहीं दूसरी ओर बोर्ड परीक्षाएं अपने चरम पर हैं। इसके साथ ही विद्यालयों में अतिरिक्त कक्षाएं संचालित की जा रही हैं, ताकि विद्यार्थियों का शैक्षणिक नुकसान न हो।
इतना ही नहीं, कक्षा 5वीं और 8वीं की पुनः परीक्षाएं भी प्रस्तावित हैं, जिनकी तैयारियों का जिम्मा भी शिक्षकों पर ही है। स्थिति यहीं नहीं रुकती। समानांतर रूप से कॉलेजों की परीक्षाएं भी चल रही हैं और इन सबके बीच ग्रीष्मकालीन अवकाश भी घोषित हो चुका है।
अवकाश का उद्देश्य जहां शिक्षकों और विद्यार्थियों को राहत देना होता है, वहीं वास्तविकता यह है कि अवकाश केवल कागजों में सीमित रह गया है। इसी दौरान निर्वाचन कार्यालय द्वारा शिक्षकों को मतदाता सूची तैयार करने के कार्य में भी लगा दिया गया है। दूसरी ओर, शिक्षा विभाग द्वारा आरटीई (RTE) के द्वितीय चरण में अशासकीय विद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया के लिए भी शिक्षकों की ड्यूटी निर्धारित की जा रही है।
‘स्कूल चलें हम’ सर्वे (वीईआर) के तहत नवीन प्रवेश प्रक्रिया करवाई जा रही है। साथ ही, निःशुल्क बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत, वर्ष 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को सेवा में बने रहने के लिए पुनः शिक्षक पात्रता परीक्षा देने के निर्देशों का दबाव भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
इन सभी जिम्मेदारियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि —
“एक शिक्षक आखिर एक समय में तीन-चार अलग-अलग दायित्व कैसे निभाए?”
शिक्षकों का कहना है कि वे शिक्षा देने के अपने मूल कर्तव्य से लगातार दूर होते जा रहे हैं। प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ इतना बढ़ चुका है कि कक्षाओं में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण प्रभावित हो रहा है।
पूरे जिले के छह ब्लॉकों में शिक्षकों के बीच मानसिक तनाव और असंतोष का माहौल स्पष्ट देखा जा सकता है। कई शिक्षक खुलकर तो नहीं, लेकिन अंदर ही अंदर इस दबाव से जूझ रहे हैं।
जिलाध्यक्ष तोमर का मानना है कि यदि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाना है, तो शिक्षकों को उनके मूल कार्य—अध्यापन—पर केंद्रित करना आवश्यक है। बार-बार गैर-शैक्षणिक कार्यों में उनकी नियुक्ति शिक्षा की गुणवत्ता को सीधे प्रभावित करती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शासन और प्रशासन शिक्षकों की भूमिका को समझते हुए कार्यों का संतुलित वितरण करें। अन्यथा, यह बढ़ता दबाव न केवल शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा पर भी गंभीर असर डालेगा।
