अबरार अहमद खान/मुकीज़ खान, भोपाल (मप्र), NIT:
नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत 1 अप्रैल से होते ही निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है। दाखिले के समय तीन महीने की अग्रिम फीस, महंगी किताबें-कॉपियां और विभिन्न शुल्कों के नाम पर बड़ी राशि वसूले जाने से अभिभावक परेशान हैं।
मध्यप्रदेश सर्वधर्म सद्भावना मंच के सचिव हाजी मोहम्मद इमरान हारून ने इस मुद्दे को उठाते हुए माध्यमिक शिक्षा मंडल और जिला प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा कि निजी स्कूल प्रबंधन अभिभावकों को तय पब्लिकेशन की किताबें खरीदने के लिए मजबूर करते हैं, जो केवल चुनिंदा दुकानों या स्कूल परिसर में ही उपलब्ध होती हैं। इससे किताबों की कीमतें बढ़ जाती हैं और कमीशनखोरी की आशंका भी रहती है।
उन्होंने बताया कि हर साल स्कूल फीस, पंजीकरण शुल्क और पाठ्यक्रम की लागत में बढ़ोतरी कर रहे हैं, जिससे आम परिवारों के लिए बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना मुश्किल होता जा रहा है। महंगाई के इस दौर में शिक्षा का खर्च अभिभावकों के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है।
हाजी इमरान हारून ने मांग की है कि अभिभावकों को किसी भी दुकान से किताबें खरीदने की स्वतंत्रता दी जाए और निजी प्रकाशनों की कीमतों पर नियंत्रण रखा जाए। साथ ही स्कूलों द्वारा यूनिफॉर्म के लिए भी विशेष दुकानों को अनिवार्य करने पर रोक लगाई जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि एक-एक विषय के लिए कई-कई किताबें अनिवार्य कर दी जाती हैं, जिससे बच्चों के स्कूल बैग का वजन भी अत्यधिक बढ़ जाता है। छोटे बच्चों पर भारी बैग का बोझ उनके स्वास्थ्य के लिए भी चिंता का विषय है।
उन्हों ने सरकार से मांग की है कि महंगे कोर्स पर रोक लगाई जाए, सरकारी पुस्तकों को अनिवार्य किया जाए और स्कूल बैग के वजन को लेकर स्पष्ट नियम बनाए जाएं, ताकि हर अभिभावक अपने बच्चों को बिना आर्थिक दबाव के शिक्षा दिला सके।
