जमशेद आलम, ब्यूरो चीफ, भोपाल (मप्र), NIT:
मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों (खासकर भोपाल और अन्य जिलों) में पैथोलॉजी/मेडिकल जांच सेवाओं के टेंडर को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। साइंस हाउस मेडिकल प्राइवेट लिमिटेड ने हाल ही में नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) के एक बड़े टेंडर (लगभग 180 करोड़ रुपये) में 81.2% डिस्काउंट देकर बिड जीती है।
सरकारी अनुमानित दरों की तुलना में इतना अधिक डिस्काउंट आमतौर पर संदेह पैदा करता है, क्योंकि इससे जांच की गुणवत्ता, सटीकता और समय पर रिपोर्टिंग प्रभावित हो सकती है।
कंपनी का पक्ष (CEO का बयान):
एक निजी अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी के CEO पुनीत दुबे का कहना है कि यह डिस्काउंट “पूरी योजना और गणना के साथ” दिया गया है। उनका दावा है कि बड़े स्तर (हर दिन हजारों जांच) पर काम करने और बेहतर दक्षता के कारण कम दर पर सेवाएं देना संभव है, जिससे सरकार के पैसे की बचत होगी।
विशेषज्ञों और आलोचकों की चिंता:
पैथोलॉजी विशेषज्ञों का मानना है कि इतने कम रेट (जैसे 100 रुपये की जांच को 18–20 रुपये में करना) पर NABL-मान्यता प्राप्त गुणवत्ता बनाए रखना मुश्किल है।
इससे निम्न समस्याएं हो सकती हैं:
•गलत रिपोर्ट आने का खतरा
• रिपोर्ट मिलने में देरी
• अनावश्यक जांच बढ़ना
• मरीजों (खासकर गरीब वर्ग) की जान को जोख़िम
पिछले विवाद और पृष्ठभूमि:
• पहले भी कंपनी के टेंडरों को लेकर विवाद हो चुके हैं — कभी बहुत कम दर के कारण टेंडर रद्द हुआ, तो कभी अधिक दर पर ठेका मिलने के आरोप लगे।
• कुल मिलाकर लगभग 900–943 करोड़ रुपये की जांच सेवाओं के मामलों में भी कंपनी चर्चा में रही है।
सितंबर 2025 में आयकर विभाग ने भोपाल, इंदौर और मुंबई में कंपनी से जुड़े ठिकानों पर छापे मारे थे।
इनमें लगभग 150 करोड़ रुपये की फर्जी बिलिंग और टैक्स चोरी के आरोप सामने आए थे।
सरकारी कार्रवाई:
स्वास्थ्य विभाग ने टेंडर की समीक्षा शुरू कर दी है।
स्वास्थ्य मंत्री राजेश शुक्ला ने भी पूरे मामले की जांच के आदेश दिए हैं।
यह मुद्दा पहले भी कांग्रेस और भाजपा — दोनों सरकारों के समय उठ चुका है, लेकिन वर्तमान में नए टेंडर के बाद फिर चर्चा में है।
सरकारी बनाम प्राइवेट लैब रिपोर्ट में अंतर (सही और स्पष्ट):
सरकारी और निजी लैब्स की रिपोर्ट में अंतर के मुख्य कारण:
1. गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control):
• निजी लैब्स (जैसे SRL, Thyrocare, Metropolis) अक्सर NABL-मान्यता प्राप्त होती हैं और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करती हैं।
• सरकारी या आउटसोर्स्ड लैब्स में बजट, मशीनरी और स्टाफ की कमी के कारण गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
2. सैंपल हैंडलिंग:
• सरकारी अस्पतालों में भीड़ के कारण सैंपल हैंडलिंग में गड़बड़ी या देरी हो सकती है।
• निजी लैब्स में प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित होती है।
3. रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड:
• अलग-अलग लैब्स के रेफरेंस रेंज में थोड़ा अंतर हो सकता है।
• कुछ मामलों में सरकारी रिपोर्ट की सटीकता पर सवाल उठे हैं।
4. आर्थिक कारण:
• निजी लैब्स में कभी-कभी अनावश्यक जांच कराई जा सकती है।
• सरकारी/आउटसोर्स्ड लैब्स में बहुत कम रेट के कारण गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा रहता है।
निष्कर्ष और सुझाव:
कम रेट पर टेंडर मिलने से सरकार को अल्पकालिक लाभ जरूर होता है, लेकिन यदि गुणवत्ता से समझौता हुआ तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान गरीब मरीजों को होगा।
आवश्यक कदम:
• स्वतंत्र गुणवत्ता ऑडिट (NABL मानकों के अनुसार)
• सैंपल और रिपोर्ट की रैंडम जांच
• टेंडर में तकनीकी योग्यता और पिछले रिकॉर्ड का सख्त मूल्यांकन
