जमशेद आलम, ब्यूरो चीफ, भोपाल (मप्र), NIT:
भोपाल की सड़कों पर इन दिनों एक नया ट्रैफिक नियम लागू होता दिखाई दे रहा है — “जहाँ पुलिस खड़ी, वहीं चालान पक्का।” चाहे पॉलिटेक्निक चौराहा हो, कोलार रोड हो या शहर के अन्य चेकिंग पॉइंट, आम जनता का अनुभव लगभग एक जैसा ही है। हेलमेट हो या न हो, गाड़ी के कागज़ पूरे हों या नहीं, पुलिस की नजर में हर वाहन संभावित चालान का शिकार बन जाता है।
हाल ही में कोलार क्षेत्र में रेल कर्मचारियों के साथ हुई घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर ट्रैफिक व्यवस्था के नाम पर यह कौन सा अभियान चल रहा है। नियमों का पालन कराना पुलिस का कर्तव्य है, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन जब नियमों की आड़ में व्यवहार अपमानजनक हो जाए, भाषा में दबंगई आ जाए और कार्रवाई में विवेक की जगह केवल वसूली का भाव दिखने लगे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।
भोपाल में पिछले कुछ समय से ट्रैफिक चेकिंग का जो तरीका देखने को मिल रहा है, वह कम से कम आम नागरिकों को व्यवस्था से ज्यादा दबाव का अहसास करा रहा है। कई स्थानों पर पुलिसकर्मी वाहन चालकों को रोकते हैं और कागज़ देखने के बजाय पहले चालान की चेतावनी देते हैं। इसके बाद बहस की स्थिति बन जाती है और मामूली बात भी विवाद में बदल जाती है।
सवाल यह भी उठता है कि क्या पुलिसकर्मियों पर किसी तरह का लक्ष्य या दबाव होता है? शहर में यह चर्चा आम है कि ऊपर से रोज़ाना कार्रवाई दिखाने का एक अनकहा दबाव रहता है। किस सड़क से कितना चालान होना चाहिए और किस चौराहे पर कितनी कार्रवाई दिखनी चाहिए, इस तरह की बातें अक्सर पुलिस महकमे के गलियारों में सुनाई देती हैं।
अगर वास्तव में ऐसा कोई दबाव है तो इसका खामियाजा आखिर भुगतता कौन है? जाहिर है, आम नागरिक। जो व्यक्ति सुबह घर से अपने काम पर निकलता है, वह अचानक सड़क पर खुद को एक ऐसे माहौल में पाता है जहाँ नियम से ज्यादा रौब चलता दिखाई देता है।
कोलार में रेल कर्मचारियों के साथ हुई घटना को भी कई लोग इसी बढ़ते तनाव का परिणाम मान रहे हैं। जब संवाद की जगह टकराव ले लेता है तो हालात बिगड़ना तय हो जाता है। पुलिसकर्मी भी आखिर इंसान ही हैं और कई बार वे भी ऊपर के दबाव में काम करते हैं। लेकिन यह भी सच है कि जनता पुलिस को सुरक्षा के प्रतीक के रूप में देखना चाहती है, डर के रूप में नहीं।
भोपाल में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहाँ छोटी सी गलती पर भी वाहन चालकों के साथ ऐसा व्यवहार किया गया मानो उन्होंने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो। हेलमेट न पहनना या सीट बेल्ट न लगाना निश्चित ही गलत है, लेकिन क्या इसका समाधान केवल चालान और अपमानजनक व्यवहार ही है?
सड़कों पर सुरक्षा का अभियान कई बार “राजस्व अभियान” में बदलता हुआ दिखाई देता है। हेलमेट की चिंता से ज्यादा चालान की रसीद पर ध्यान रहता है। नियमों की जानकारी देने से ज्यादा बहस और दबाव की स्थिति बन जाती है।
अगर ट्रैफिक सुधार ही उद्देश्य है तो क्या बेहतर नहीं होगा कि पुलिस जागरूकता बढ़ाए, लोगों को नियम समझाए और जरूरत पड़ने पर ही कठोर कार्रवाई करे? दुनिया के कई शहरों में ट्रैफिक पुलिस का काम केवल दंड देना नहीं बल्कि मार्गदर्शन करना भी होता है।
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में भी यही उम्मीद की जाती है कि पुलिस और जनता के बीच विश्वास का रिश्ता मजबूत हो। लेकिन जब हर चौराहे पर “चालान का डर” दिखाई देने लगे तो यह रिश्ता कमजोर होने लगता है।
यह भी सच है कि कुछ वाहन चालक भी नियमों को हल्के में लेते हैं। हेलमेट घर पर छोड़ देते हैं, गाड़ी के कागज़ अपडेट नहीं रखते और पकड़े जाने पर बहस करने लगते हैं। यानी समस्या केवल एक तरफ नहीं है। लेकिन व्यवस्था की जिम्मेदारी हमेशा व्यवस्था पर ही होती है।
आज जरूरत इस बात की है कि ट्रैफिक व्यवस्था को सुधारने के नाम पर होने वाली कार्रवाई में पारदर्शिता हो। अगर चालान किया जा रहा है तो उसका स्पष्ट कारण बताया जाए, व्यवहार सभ्य हो और पुलिस की छवि एक संरक्षक की बने, वसूली करने वाले की नहीं।
वरना भोपाल की सड़कों पर यह व्यंग्य चलता रहेगा कि ट्रैफिक नियमों की किताब भले मोटी हो, लेकिन उसका सार बस इतना है —
“चौराहे पर पुलिस दिखे तो जेब संभाल लो।”
अगर यही हाल रहा तो जनता और पुलिस के बीच दूरी बढ़ती जाएगी, जबकि लोकतंत्र में दोनों को एक-दूसरे का सहयोगी होना चाहिए, प्रतिद्वंद्वी नहीं।
