औरतें अधिक वतनपरस्त हैं: सईदा हमीद; महिला दिवस पर इलाहाबाद में एक दिवसीय कन्वेंशन आयोजित | New India Times

अंकित तिवारी, ब्यूरो चीफ, प्रयागराज (यूपी), NIT:

औरतें अधिक वतनपरस्त हैं: सईदा हमीद; महिला दिवस पर इलाहाबाद में एक दिवसीय कन्वेंशन आयोजित | New India Times

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर “महिला अधिकारों के लिए समर्पित इलाहाबाद के लोग” के बैनर तले शहर की जनवादी-प्रगतिशील महिलाओं का एक दिवसीय कन्वेंशन स्वराज विद्यापीठ में आयोजित किया गया। कन्वेंशन का विषय “महिलाओं पर बढ़ती हिंसा और प्रतिरोध के रास्ते” रखा गया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए एनएफआईडब्ल्यू की अध्यक्ष और पद्मश्री सम्मानित सईदा हमीद ने कहा कि महिलाओं ने हमेशा देशप्रेम और साहस का परिचय दिया है। उन्होंने CAA-NRC विरोध प्रदर्शनों को याद करते हुए कहा कि उस आंदोलन में मुस्लिम महिलाओं की बड़ी और शानदार भागीदारी रही। उन्होंने विभाजन के समय की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि दोनों ओर की महिलाओं ने अपने घरों में पर्चियां लगाकर लिखा था कि “हम वापस आएंगे”, जो उनके गहरे वतन प्रेम को दर्शाता है। सईदा हमीद ने अपने अनुभव साझा करते हुए मुस्लिम महिला होने के दर्द को भी व्यक्त किया और ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों की निंदा करते हुए नई पीढ़ी को सतर्क रहने की अपील की।
कन्वेंशन में पीयूसीएल की राष्ट्रीय सचिव लारा जेसानी ने महिलाओं को मिले कानूनी अधिकारों और उनकी सीमाओं पर चर्चा करते हुए कहा कि समाज में लड़कियों की नागरिकता और स्वतंत्रता को पुरुषों से अलग नजरिए से देखा जाता है। उन्होंने कहा कि अदालतों में भी महिलाओं को पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ संघर्ष करना पड़ता है। लंबे संघर्षों के बाद मिले कानूनी अधिकारों को भी कई बार पितृसत्तात्मक मानसिकता के कारण पीछे धकेला जा रहा है। उन्होंने कहा कि महिलाओं की सोच आगे बढ़ी है, लेकिन अदालतों और पुलिस की सोच में बदलाव की जरूरत है।
उत्तराखंड में चल रहे अंकिता भंडारी आंदोलन के कारण कार्यक्रम में नहीं आ सकीं कमला पंत का संदेश झरना मालवीय ने पढ़कर सुनाया। अपने संदेश में उन्होंने राज्य में लागू यूसीसी (समान नागरिक संहिता) पर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे महिलाओं के जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
कार्यक्रम में शिरोज़ संस्था की माधवी मिश्रा ने अपने संगठन की गतिविधियों की जानकारी दी। वहीं एसिड अटैक सर्वाइवर रूपाली विश्वकर्मा ने अपनी दर्दनाक लेकिन प्रेरणादायक कहानी साझा करते हुए कहा कि एसिड हमलों के पीछे अक्सर पितृसत्तात्मक ईर्ष्या होती है। उन्होंने कहा कि “हमलावर केवल वह व्यक्ति नहीं होता जो हमला करता है, बल्कि समाज और कई बार अपना परिवार भी पीड़िता के खिलाफ खड़ा हो जाता है।” हमले से पहले वह अभिनेत्री थीं, लेकिन इस घटना ने उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी।
कन्वेंशन की शुरुआत आयोजन समिति की ओर से कुमुदिनी पति द्वारा परिप्रेक्ष्य पत्र पढ़कर की गई, जिसमें विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में बढ़ते अपराधों पर चिंता व्यक्त करते हुए सरकार को जिम्मेदार ठहराया गया।
कार्यक्रम के दौरान एपवा की राधा, कोरस की आकांक्षा और अमिता शीरीन ने गीत प्रस्तुत किए। कन्वेंशन का समापन प्रेमचंद की कहानी पर आधारित नाटक “नज़रिया” के मंचन से हुआ, जिसका निर्देशन अजीत बहादुर ने किया। नाटक के माध्यम से समाज में महिलाओं के प्रति पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया।
इस अवसर पर शहर की कई प्रमुख हस्तियां और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे, जिनमें रंजना कक्कड़, अनिता गोपेश, अनुराधा अग्रवाल, राजुल माथुर, सुप्रिया पाठक, मालविका राव, अवंतिका शुक्ला, रश्मि मालवीय, ज्योतिर्मयी, माधवी मित्तल, शिवांगी गोयल, सुरेंद्र राही, संतोष भदौरिया, नीलम शंकर, फरीदा परवीन, आशीष मित्तल, विश्वविजय, रूपम मिश्रा, सोनी आज़ाद, एड. कुंवर जी, सौम्या, फिरदौस, सुमन, एड. आबिदा, भोर महिला स्वावलंबन केंद्र की कुमकुम, सुधांशु मानवीय, अनिता त्रिपाठी, प्रेम शंकर और प्रणय कृष्ण सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।

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