अली अब्बास, ब्यूरो चीफ, मथुरा (यूपी), NIT:
वक्फ कोऑर्डिनेटर और मस्जिद सेक्रेटरी डॉ. शबनम कुरैशी ने रोज़े की अहमियत बताते हुए कहा कि रोज़ा सब्र और नेकी का इम्तिहान है। रमजान का पाक महीना पूरी दुनिया के मुसलमानों के लिए रहमत, मगफिरत और निजात का पैगाम लेकर आता है।
उन्होंने बताया कि रमजान को तीन अशरों में बांटा गया है। पहला, दूसरा और तीसरा अशरा। पहले अशरे के 1 से 10 रोज़े रहमत के माने जाते हैं। इस दौरान लोगों को ज्यादा से ज्यादा गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए।
रमजान के 11वें रोज़े से 20वें रोज़े तक का समय दूसरा अशरा माना जाता है, जिसे मगफिरत (माफी) का अशरा कहा जाता है। इस दौरान इबादत कर इंसान अपने गुनाहों से माफी मांग सकता है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति इस समय सच्चे दिल से तौबा करता है, अल्लाह तआला उसे माफ कर देता है।
रमजान का तीसरा अशरा 21वें रोज़े से 30वें रोज़े तक माना जाता है, जिसे निजात का अशरा कहा जाता है। इस दौरान हर मुसलमान को जहन्नुम से बचने के लिए अल्लाह से दुआ करनी चाहिए। इसी अशरे में मस्जिदों में तरावीह और कुरान की तिलावत का दौर भी समाप्ति की ओर होता है।
डॉ. शबनम कुरैशी ने बताया कि मस्जिदों में ईद को लेकर तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। मस्जिदों को रंग-बिरंगी झालरों से सजाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ईद की नमाज से पहले हर साहिब-ए-निसाब व्यक्ति पर जरूरी है कि वह अपनी और अपनी औलाद की तरफ से सदका-ए-फितर अदा करे। प्रत्येक सदस्य के हिसाब से करीब 2 किलो 50 ग्राम गेहूं या उसकी कीमत अदा करनी चाहिए।
इसके साथ ही मस्जिद सेक्रेटरी डॉ. शबनम कुरैशी ने नगर निगम से मांग की है कि नमाज के समय आवारा पशुओं पर नियंत्रण रखा जाए और मस्जिदों के आसपास फैली गंदगी व कूड़े के ढेरों की सफाई कर चूने का छिड़काव कराया जाए। उन्होंने स्ट्रीट लाइटों को ठीक कराने तथा पेयजल और विद्युत व्यवस्था को सुचारू रखने की भी मांग की है।
