7 वर्षीय मुबिन मकरानी ने रखा अपने जीवन का पहला रोज़ा, परिवार ने किया स्वागत | New India Times

रहीम शेरानी हिन्दुस्तानी, ब्यूरो चीफ, झाबुआ (मप्र), NIT:

माहे रमज़ान में तिलावत और इबादत का दौर जारी है। बड़े-बुजुर्गों को रोज़ा, नमाज़ और इबादत करते देख छोटे-छोटे बच्चों में भी रोज़ा रखने का उत्साह बढ़ रहा है।
रहमतों और बरकतों वाले इस मुकद्दस माहे रमज़ान में महिलाएं, पुरुष और बच्चे रोज़ा रखकर कुरआन की तिलावत में मशगूल हैं।

इसी क्रम में 7 वर्षीय मुबिन मकरानी, पिता वसीम मकरानी ने अपने जीवन का पहला रोज़ा रखा। मुबिन ने परिवार के सदस्यों को रोज़ा रखते देखकर खुद भी रोज़ा रखा, नमाज़ अदा की और कुरआन की तिलावत की।

इफ्तार के वक्त मुबिन मकरानी को फूलों की माला पहनाकर सम्मानित किया गया। उनकी अम्मी हिना ने अपने हाथों से स्वादिष्ट पकवान बनाकर बेटे मुबिन से घर-घर वितरण कराया और फिर बेटे मुबिन को अपने हाथों से इफ्तार कराया।

रोज़ा रखना हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है और रोज़ा रखना आसान नहीं होता। मुबिन मकरानी को भी यह समझ है कि रोज़ा और नमाज़ में नेकी और कामयाबी का राज़ छिपा है।
रमज़ान की फज़ीलतें बच्चे भी बड़े-बुजुर्गों से सुनते हैं और उन पर अमल करने का प्रयास करते हैं। हदीस में आता है कि तीन लोगों की दुआ रद्द नहीं होती—एक रोज़ेदार की इफ्तार के वक्त, दूसरे आदिल शासक की और तीसरे मज़लूम की दुआ।

नबी करीम ﷺ का इरशाद है कि जब कोई ईमान वाला दुआ करता है और वह गुनाह या रिश्ते तोड़ने की दुआ नहीं करता, तो अल्लाह तआला उसे तीन में से एक चीज़ ज़रूर अता करता है—या वही चीज़ दे देता है, या उससे कोई मुसीबत टाल देता है, या आख़िरत के लिए सवाब जमा कर देता है।

बरकतों और रहमतों के इस पाक महीने में रोज़ा रखने से हमदर्दी और इंसानियत का जज़्बा भी बढ़ता है। माहे रमज़ान में बच्चे भी रोज़ा, नमाज़ और कुरआन की तिलावत कर अल्लाह की इबादत में मशगूल हैं।

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