अशफ़ाक़ क़ायमखानी, सीकर/जयपुर (राजस्थान), NIT:
कलम की ताकत से डरकर यदि सत्ता और तंत्र मिलकर किसी पत्रकार को झूठे मुकदमे में फंसा दें, तो भी सच दबाया नहीं जा सकता। कहते हैं, सत्य परेशान हो सकता है, पर पराजित नहीं। ऐसा ही फतेहपुर के विद्युत विभाग के अधिकारियों द्वारा पत्रकार आबिद खान दाडून्दा के खिलाफ रची गई साजिश के मामले में देखने को मिला, जहां चार साल के संघर्ष के बाद अदालत ने पत्रकार को दोषमुक्त कर दिया।
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट फतेहपुर अजय कुमार पूनिया की अदालत ने विद्युत विभाग के अधिकारियों द्वारा दर्ज ‘राजकार्य में बाधा’ के मामले को अविश्वसनीय मानते हुए पत्रकार आबिद खान दाडून्दा को धारा 353 भादंसं के आरोप से बरी कर दिया। यह फैसला झूठ, पद के दुरुपयोग और बदले की राजनीति पर करारा तमाचा माना जा रहा है।
विद्युत विभाग पर बदले की राजनीति का आरोप
आरोप है कि विद्युत विभाग के अधिकारियों ने भ्रष्टाचार उजागर करने वाले पत्रकार की आवाज दबाने के लिए सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया। अधिकारियों ने कानून को निजी हथियार बनाकर पत्रकार के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज कराया, लेकिन न्यायालय में साजिश उजागर हो गई।
क्या था पूरा मामला
पत्रकार आबिद खान दाडून्दा ने अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड की फतेहपुर सिटी शाखा में कथित अनियमितताओं को उजागर किया था, जिनमें—
• डेड लाइनों से तार चोरी
• बिना अनुमति हरे पेड़ों की कटाई
• संदिग्ध तैनातियां
• सरकारी कॉलोनी में अवैध कब्जा
• ट्रांसफार्मर चोरी मामलों में संदिग्ध भूमिका
जैसे मुद्दे शामिल थे।
खबरें प्रकाशित होने के बाद उन्हें धमकियां मिलने लगीं, जिसके बाद उन्होंने 28 मार्च 2022 को एसपी और एसडीएम को शिकायत दी थी।
एसडीएम कोर्ट ने पहले ही माना था खतरा
एसडीएम न्यायालय ने विद्युत विभाग के कुछ अधिकारियों को 107/116 में पाबंद किया था। वन विभाग की जांच में पत्रकार की खबरें सही पाई गईं और संबंधित कंपनी पर जुर्माना भी लगाया गया।
मनगढ़ंत मुकदमा और पुलिस जांच पर सवाल
29 अप्रैल 2022 को विद्युत विभाग के अधिकारियों ने कोतवाली पुलिस के साथ मिलकर पत्रकार पर झूठा आरोप लगाया कि उन्होंने कार्यालय में घुसकर रजिस्टर फाड़ा और कर्मचारियों को धमकाया। पुलिस ने जल्दबाजी में चालान पेश कर दिया, जो अब अदालत में झूठा साबित हो गया।
न्यायालय की सख्त टिप्पणी, जांच अधिकारी पर कार्रवाई के निर्देश
अदालत ने कहा कि घटना का कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था, कथित रजिस्टर और वीडियो साक्ष्य फाइल में मौजूद नहीं थे और धमकी के आरोप भी झूठे पाए गए।
न्यायालय ने पुलिस महानिदेशक (DGP) और पुलिस अधीक्षक (SP) को जांच अधिकारी के खिलाफ तीन माह में जांच कर कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
एडवोकेट दिनेश शर्मा की दमदार पैरवी
पत्रकार की ओर से एडवोकेट दिनेश शर्मा ने मजबूत पैरवी करते हुए अभियोजन की कमजोरियों को उजागर किया और साबित किया कि मुकदमा बदले की भावना से दर्ज कराया गया था।
चार साल की मानसिक पीड़ा के बाद सच की जीत
चार वर्षों तक मानसिक, शारीरिक और सामाजिक दबाव झेलने के बावजूद पत्रकार आबिद खान का हौसला नहीं टूटा। अदालत का यह फैसला न्यायपालिका में आमजन के विश्वास को मजबूत करता है और सच लिखने वाले पत्रकारों के लिए उम्मीद की किरण है।
