दलित-आदिवासी बच्चों की शिक्षा से खिलवाड़: खजुरी सुखनंदन स्कूल में जर्जर भवन, एक कमरे में दो कक्षाएं और मध्यान्ह भोजन भी बदहाल | New India Times

मोहम्मद इसहाक मदनी, ब्यूरो चीफ, मैहर (मप्र), NIT:

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शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय खजुरी सुखनंदन, जनपद पंचायत अमरपाटन (जिला मैहर/सतना) में शिक्षा व्यवस्था गंभीर बदहाली के दौर से गुजर रही है। विद्यालय में कमरों की भारी कमी के कारण एक ही कक्षा-कक्ष में दो-दो कक्षाओं के छात्र-छात्राएं बैठने को मजबूर हैं, जिससे पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है।

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विद्यालय का एक भवन पूरी तरह जर्जर और जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है, जो कभी भी बड़ी दुर्घटना को न्योता दे सकता है। हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर स्थिति की लिखित जानकारी शाला प्रमुख द्वारा जिला शिक्षा अधिकारी सतना, एसडीएम अमरपाटन एवं कलेक्टर मैहर को कई बार दी जा चुकी है, लेकिन अब तक न तो भवन की मरम्मत कराई गई और न ही नया भवन स्वीकृत किया गया।

ग्रामीणों एवं अभिभावकों का कहना है कि विद्यालय में अध्ययनरत अधिकांश बच्चे गरीब, दलित एवं आदिवासी समुदाय से आते हैं। एक ही कमरे में दो कक्षाएं संचालित होने के कारण न तो बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल पा रही है और न ही शिक्षक विद्यार्थियों पर समुचित ध्यान दे पा रहे हैं। बरसात के मौसम में जर्जर भवन में बच्चों को बैठाना उनकी जान के साथ खुला खिलवाड़ है।

ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं—
“क्या गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों को सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाने का अधिकार नहीं है?”

संविधान के अनुच्छेद 21-A के तहत प्रत्येक बच्चे को सुरक्षित वातावरण में शिक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन इस विद्यालय की स्थिति देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि शासन-प्रशासन कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ है।

ग्रामीणों, अभिभावकों एवं जनप्रतिनिधियों ने मध्यप्रदेश शासन एवं मुख्यमंत्री से मांग की है कि—

विद्यालय के लिए नया एवं सुरक्षित भवन तत्काल स्वीकृत किया जाए

अतिरिक्त कक्षा-कक्ष एवं शिक्षकों की समुचित व्यवस्था की जाए

जर्जर भवन में पढ़ाई पर तुरंत रोक लगाई जाए

वहीं दूसरी ओर, विद्यालय में मध्यान्ह भोजन योजना की स्थिति भी चिंताजनक बताई जा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि स्वयं सहायता समूह द्वारा परोसा जा रहा भोजन घटिया एवं पोषण मानकों से परे है। पौष्टिकता का कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा, जबकि समूह संचालक की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखा जा रहा है।

अब बड़ा सवाल यह है कि—
क्या किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही प्रशासन जागेगा,
या इन मासूम बच्चों को समय रहते उनका हक मिलेगा?

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