प्रोफेसर एस. ए. जाफ़र ‘तौक़ीर सा’ के ग़ज़ल संग्रह “जज़्बात के रंग हज़ार” का भव्य विमोचन | New India Times

मुबारक अली, ब्यूरो चीफ, शाहजहांपुर (यूपी), NIT:

प्रसिद्ध चित्रकार तौक़ीर की स्मृति में शनिवार की संध्या एक भव्य काव्य गोष्ठी, मुशायरा एवं ग़ज़ल संग्रह विमोचन समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर अलीगढ़ से आए प्रोफेसर एस. ए. जाफ़र उर्फ़ ‘तौक़ीर सा’ के ग़ज़ल संग्रह “जज़्बात के रंग हज़ार” का विधिवत विमोचन किया गया।

कार्यक्रम में लगभग 25 प्रतिष्ठित कवि एवं शायरों ने अपनी कविताओं, नज़्मों और ग़ज़लों के माध्यम से समाज को बौद्धिक रूप से समृद्ध करते हुए आयोजन की शोभा बढ़ाई।

कार्यक्रम की अध्यक्षता विशिष्ट कवि एडवोकेट सत्येंद्रनाथ त्रिपाठी ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में डिप्टी कमिश्नर (जीएसटी) पी. के. तोमर ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। विशिष्ट अतिथियों में जनाब अशफ़ाक़ उल्ला खां, डॉ. प्रभात शुक्ला, नरेंद्र सक्सेना, डॉ. अमीर सिंह एवं डॉ. आलोक सिंह शामिल रहे।

इस अवसर पर साहित्य संस्था इदराक एवं नज़र मेमोरियल सोसायटी, शाहजहांपुर की ओर से शायर एस. ए. जाफ़र ‘तौक़ीर सा’ को स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया। साथ ही इदारा उफ़ुक़-ए-नौ एवं दर्पण सामाजिक संस्था द्वारा उन्हें ‘कला रत्न सम्मान’ से भी नवाज़ा गया।

इसके पश्चात साहित्यकार कमलेश द्विवेदी एवं चित्रकार डॉ. ऊषा गर्ग ने ग़ज़ल संग्रह “जज़्बात के रंग हज़ार” की समीक्षात्मक प्रस्तुति दी।

कार्यक्रम के आयोजक डॉ. मोहम्मद क़मर ने सभी सुख़नवरों का बुके भेंट कर स्वागत किया। गोष्ठी का कुशल संचालन वरिष्ठ एडवोकेट एवं प्रसिद्ध शायरा गुलिस्तां ख़ान ने किया।

मुशायरे में भाग लेने वाले प्रमुख कवि एवं शायरों में असग़र यासिर, अजय अवस्थी, शाहिद रज़ा, ख़ालिद क़ैसर, ख़लीक़ शौक़, हमीद ख़िज़र, गुलिस्तां ख़ान, वसीम मीनाई, फ़हीम बिस्मिल, राशिद हुसैन राही, कमलेश द्विवेदी, अस्मत अली, वाजिद हुसैन वाजिद, उवैस शिफ़ा, राशिद नदीम, फ़ैसल फ़ैज़, सबा नक़वी सबा, डॉ. शाइस्ता नसीम, मुनीब अहमद, तौक़ीर सा, सत्येंद्रनाथ त्रिपाठी, रतीश गर्ग सहित अनेक रचनाकार शामिल रहे।

शायरों ने मानवता, प्रेम, समाज और दर्शन से जुड़े विषयों पर अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं, जो श्रोताओं के लिए अमृत समान रहीं।

असग़र यासिर का शेर—
“शुमार कैसे करूं दोस्तों की सफ़ में उसे,
मैं एक क़तरा हूं, दरिया बता रहा है मुझे।”

एडवोकेट एवं शायरा गुलिस्तां ख़ान ने कहा—
“मैं उस मुकाम पर पहुँची, जहाँ मुख़ालिफ़ भी
दुकान बढ़ा गए, कुछ और काम करने लगे।”

हमीद ख़िज़र ने पढ़ा—
“हम इस तरह भी मोहब्बत को आम करते हैं,
मिले जो राह में, पहले सलाम करते हैं।”

वसीम मीनाई ने कहा—
“उन्हें रुसवाइयों का सामना करना ही पड़ता है,
जो ख़ुद्दारी की अपनी ख़ुद निगहबानी नहीं करते।”

शायर तौक़ीर सा ने सुनाया—
“चादर हटाओ, देखूं ज़रा क्या है साथ में,
मर तो रहा था ऐसे कि सब ले के जाएगा।”

कार्यक्रम में शहर के अनेक गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम की जानकारी डॉ. मोहम्मद क़मर (चित्रकार/संचालक – तौक़ीर आर्टकेड) ने दी।

By nit

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Gift this article

Exit mobile version