अबरार अली, ब्यूरो चीफ, सिद्धार्थ नगर (यूपी), NIT:
होम्योपैथी के माध्यम से रोगों को जड़ से समाप्त किया जा सकता है। क्रॉनिक (दीर्घकालिक) बीमारियों के सफल उपचार के लिए यह आवश्यक है कि मरीज की वर्तमान हिस्ट्री, लक्षणों का विस्तृत विवरण, इलाज के पहले दिन से लेकर इलाज पूर्ण होने तक की सभी जांच रिपोर्ट्स एवं उपचार का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाए। इलाज से पूर्व कराई गई जांच रिपोर्ट से लेकर रोगमुक्त होने तक की सभी रिपोर्ट्स ही वह ठोस सबूत होती हैं, जो किसी भी उपचार की वैज्ञानिक पुष्टि करती हैं।
यह महत्वपूर्ण बातें शर्मा होम्योपैथिक चिकित्सालय एवं रिसर्च सेंटर, इटवा (सिद्धार्थनगर) के चीफ कंसल्टेंट डॉ. भास्कर शर्मा ने कहीं। उन्होंने कहा कि होम्योपैथी की प्रभावशीलता को वैज्ञानिक कसौटी पर खरा साबित करने के लिए रोगियों के दस्तावेजों को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करना अनिवार्य है। केवल रोगी के कथन को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रमाण नहीं माना जा सकता।
डॉ. भास्कर शर्मा ने बताया कि उनका रिसर्च कार्य होम्योपैथी की शिक्षा के दौरान ही शुरू हो गया था। अब तक वे विभिन्न प्रकार के रोगों पर एक्सपेरिमेंटल रिसर्च कर चुके हैं और देश ही नहीं, विदेशों में भी अपने कार्य की पहचान बना चुके हैं।
उन्होंने एक उदाहरण देते हुए बताया कि एक मरीज किडनी में पथरी की शिकायत लेकर उनके पास आया। अल्ट्रासाउंड जांच में पथरी की पुष्टि हुई।
उपचार शुरू होने के कुछ दिनों बाद मरीज ने दावा किया कि पथरी निकल गई है और उसने एक पत्थर दिखाया, जो उसके अनुसार पेशाब के साथ निकला था। डॉ. शर्मा ने मरीज से पुनः अल्ट्रासाउंड कराने को कहा। शुरुआत में मरीज ने मना किया, लेकिन डॉ. शर्मा ने जांच शुल्क स्वयं देकर जांच करवाई। अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में पथरी पूरी तरह समाप्त पाई गई, जो उपचार की सफलता का एक ठोस वैज्ञानिक प्रमाण बना।
डॉ. शर्मा ने कहा कि इस प्रकार के पूर्ण डॉक्यूमेंटेशन के बाद रिसर्च को प्रतिष्ठित नेशनल और इंटरनेशनल जर्नल्स में प्रकाशित कराने के लिए आवेदन करना चाहिए। इससे न केवल कार्य को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलती है, बल्कि पीयर-रिव्यू प्रक्रिया के दौरान अन्य विशेषज्ञों द्वारा दावों की गहन जांच भी होती है। इस प्रक्रिया से गुजरने के बाद प्रकाशित रिसर्च 24 कैरेट सोने की तरह शुद्ध और प्रमाणिक बन जाती है।
अंत में डॉ. भास्कर शर्मा ने बताया कि उनके अब तक 100 से अधिक रिसर्च पेपर इंटरनेशनल और नेशनल पीयर-रिव्यूड रिसर्च जर्नल्स, जैसे पबमेड और स्कोपस में प्रकाशित हो चुके हैं।
