निहाल चौधरी, इटवा/सिद्धार्थ नगर (यूपी), NIT:
उत्तर प्रदेश में गौवंश संरक्षण को लेकर सरकार के सख्त दावों के बीच जमीनी हालात कितने भयावह हो सकते हैं, इसका दर्दनाक उदाहरण विकास खंड जोगिया के ग्राम खेतवल मिश्र स्थित गौशाला में देखने को मिला। सामने आए दृश्य न केवल प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता को उजागर करते हैं, बल्कि यह भी सवाल उठाते हैं कि आखिर किसकी जिम्मेदारी में गौमाता को इस हाल में छोड़ दिया गया।
गौशाला के मुख्य द्वार पर ताला लटका हुआ मिला। जिन बेसहारा गायों की देखभाल के लिए यह गौशाला बनाई गई, वे अंदर बिना देखरेख के तड़प रही थीं। न कोई कर्मचारी मौजूद था और न ही कोई जिम्मेदार अधिकारी—मानो सारी व्यवस्था भगवान भरोसे छोड़ दी गई हो।
ताला खुलवाकर अंदर जाने पर हालात और गंभीर निकले। परिसर में दो गायें अर्धमृत अवस्था में पड़ी थीं, उनके शरीर पर गहरे घाव थे और आंखें सूज चुकी थीं। कई दिनों से न चारा मिला था, न पानी और न ही पशु चिकित्सा सुविधा का कोई इंतजाम। चारों ओर चील-कौवे मंडरा रहे थे।
पूरी गौशाला में चारे का एक तिनका तक नहीं मिला—न सूखा भूसा, न हरा चारा, न पानी की उचित व्यवस्था। सवाल यह उठता है कि जब गौशालाओं के संचालन के लिए शासन से नियमित बजट जारी होता है, तो वह धन आखिर कहां खर्च हो रहा है?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा गौवंश संरक्षण को लेकर स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं, फिर भी खेतवल मिश्र की यह गौशाला दिखाती है कि नीतियां कागजों तक सिमटकर रह गई हैं और जमीनी स्तर पर उनकी अनदेखी हो रही है।
इस मामले में खंड विकास अधिकारी (BDO) की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं। निरीक्षण, चारा आपूर्ति, चिकित्सा सुविधा और कर्मचारियों की निगरानी उनकी सीधी जिम्मेदारी है। यदि उन्हें स्थिति की जानकारी नहीं थी तो यह लापरवाही है—और यदि थी, तो यह कर्तव्यहीनता का मामला बनता है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि शिकायतों के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं किया गया। मीडिया के हस्तक्षेप के बाद ही मामला गंभीरता से लिया गया। प्रकरण सामने आने के बाद जिलाधिकारी शिवशरणप्पा जी.एन. ने जांच के आदेश जारी किए हैं। डीएम ने कहा कि दोषी पाए जाने वाले अधिकारी-कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी और गौशाला में तत्काल चारा-पानी व उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या इस मामले में वास्तविक जवाबदेही तय होगी, या यह भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। खेतवल मिश्र की गौशाला में तड़पते गौवंश ने एक मौन प्रश्न छोड़ दिया है—क्या गौवंश संरक्षण सिर्फ घोषणाओं तक सीमित है, या प्रशासन जमीन पर भी जिम्मेदारी निभाएगा?
