अबरार अहमद खान/मुकीज़ खान, भोपाल (मप्र), NIT:
एक ओर भारत देश अपनी आजादी के 78साल का जश्न मना कर देश की पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर विश्व में अपना परचम लहराने की घोषणा करता है।भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के आधार पर प्रेस की स्वतंत्रता का ढोल पीटता है तो वहीं सरकार के तमाम खोखले दावों की पोल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खुलने पर बचाव की मुद्रा में आना हमारे राजनेताओं का रोज़ का शगल बन गया है।
गौर तलब हो कि प्रेस स्वतंत्रता पर नज़र रखने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) ने हाल ही में अपनी प्रेस फ्रीडम प्रीडेटर्स यानी प्रेस स्वतंत्रता के लिए खतरा माने जाने वाले लोगों, संगठनों की सूची जारी की है. उन्होंने इसे प्रीडेटर यानी ‘भक्षी’ की संज्ञा दी है।
इस सूची में भारत की दो संस्थाओं- अडानी समूह और हिंदुत्ववादी वेबसाइट ऑपइंडिया को भी शामिल किया गया है। आरएसएफ हर साल प्रेस फ्रीडम इंडेक्स जारी करता है, जिसमें भारत 180 देशों में 151वें स्थान पर है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि 2017 से अब तक अडानी समूह ने 15 से अधिक पत्रकारों और मीडिया संगठनों के खिलाफ करीब 10 कानूनी कार्रवाईयां शुरू की हैं, जिनमें सिविल और आपराधिक मानहानि के मामले शामिल हैं।
आरएसएफ के मुताबिक, साल 2025 में अडानी समूह की ‘हिटलिस्ट’ में आठ पत्रकारों और तीन मीडिया संगठनों के खिलाफ दायर दो गैग सूट शामिल हैं, जिनमें अदालत ने बिना किसी आगे की सुनवाई के अडानी समूह को यह अधिकार दिया कि वह खुद तय करे कि कौन-सी सामग्री ‘मानहानिकारक’ है।
आरएसएफ ने कहा कि इन आदेशों को तीसरे पक्षों पर भी लागू कर दिया गया, जिससे ‘असीमित सेंसरशिप की संभावना’ पैदा हो गई।
इन मामलों के तुरंत बाद द वायर, न्यूज़लॉन्ड्री, एचडबल्यू न्यूज़ और स्वतंत्र पत्रकार रवीश कुमार को कंटेंट हटाने के आदेश दिए गए।आरएसएफ ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ग़ैग सूट का दुरुपयोग अडानी समूह का ‘सबसे खतरनाक हथियार’ है।
अंतरराष्ट्रीय संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) की इस ताजा रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया किस प्रकार सरकार के संरक्षण में अडानी ग्रुप ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पत्रकारिता पर खुद या अपने माध्यमों से न सिर्फ हमले किए वरन आलोचनात्मक टिप्पणी, सरकार और अडानी के संबंधों को उजागर करने वाले पत्रकार,मीडिया समूहों को निशाने पर रखा ।
वर्तमान संदर्भ में जिस प्रकार निष्पक्ष पत्रकारिता पर सरकार के संरक्षण में हमले हुए वह किसी से छिपे नहीं।यही कारण रहा के सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में निष्पक्ष पत्रकारिता के संरक्षण पर बल दिया ।यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने आलोचनात्मक टिप्पणी को अपराध नहीं माना। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार की आलोचना के लिए किसी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए । कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा है, कि पत्रकार को उसके विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19(1) से सुरक्षित है। केवल सरकार की आलोचना के लिए किसी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ )
द्वारा जारी प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 देशों सूची में भारत का 151वें स्थान होना देश में पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर सवाल है।
