मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, ब्यूरो चीफ, बुरहानपुर (मप्र), NIT:
ऐतिहासिक नगरी दारुस सुरूर बुरहानपुर की प्रतिष्ठित धार्मिक और शैक्षणिक संस्थान दारुलउलूम शेख अली मुत्तक़ी, आदिलपुरा लंबे समय से धार्मिक शिक्षा और ज्ञान का केंद्र रहा है। इसी संस्थान के विद्वान शिक्षक मुफ्ती मोहम्मद अज़हर मुत्तक़ी क़ासमी शहर और प्रदेश में एक जाने-माने युवा धार्मिक मार्गदर्शक हैं। वे इस्लामी कानून और धार्मिक विषयों पर सोशल मीडिया के माध्यम से निरंतर जन-सामान्य का मार्गदर्शन करते रहते हैं।
हैदराबाद स्थित अल-मअहद अल-आली अल-इस्लामी में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार “भारत के निर्माण और विकास में मुसलमानों का योगदान” में उन्हें विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था।
इसी कार्यक्रम के दौरान उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक “नवजात शिशु के नियम और आवश्यक शिक्षाएँ” का गरिमामय विमोचन भारत के प्रतिष्ठित मुस्लिम धार्मिक विद्वानों में—हज़रत मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी क़िब्ला (अध्यक्ष: ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड), हज़रत मौलाना मोहम्मद सुफ़यान क़ासमी (महामंत्री, दारुलउलूम वक़्फ़ देवबंद),और हज़रत मौलाना अब्दुल हमीद नौमानी साहब (दिल्ली) के कर-कमलों से संपन्न हुआ।
यह पुस्तक बुरहानपुर के लोकप्रिय युवा धार्मिक विद्वान मुफ़्ती मोहम्मद अज़हर मुत्तक़ी क़ासमी (नायब काज़ी, दारुलक़ज़ा—ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड / शिक्षक: दारुलउलूम शेख अली मुत्तक़ी) द्वारा लिखी गई है।
इस कृति में नवजात शिशु से संबंधी इस्लामी धार्मिक नियमों, इस्लाम के परंपरागत तरीकों, मुस्लिम सामाजिक व्यवहार और पारिवारिक मुद्दों से जुड़ी बातों को अत्यंत सरल, विस्तृत और समग्र रूप में प्रस्तुत किया गया है।
हज़रत मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने पुस्तक के महत्व और वर्तमान समय में इसकी आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए बुरहानपुर के युवा लेखक मुफ़्ती अज़हर मुत्तक़ी के इस कार्य को एक मूल्यवान धार्मिक और बौद्धिक योगदान बताया है।
इस पुस्तक का प्रकाशन दारुलउलूम शेख अली मुत्तक़ी, बुरहानपुर (मध्य प्रदेश) द्वारा किया गया है, जो मध्यप्रदेश का प्रमुख और विश्वसनीय एवं शैक्षणिक धार्मिक संस्थान है। यहाँ क़ुरआन व हदीस पर आधारित इस्लामी अरबी शिक्षा के प्रचार प्रसार के साथ इस्लामी मूल्यों पर आधारित नैतिक शिक्षा व वैचारिक मूल्यों प्रशिक्षण का कार्य वर्षों से सफलतापूर्वक चल रहा है।
सेमिनार के सभी प्रतिभागियों ने इस पुस्तक के विमोचन को एक महत्वपूर्ण और स्वागतयोग्य धार्मिक-शैक्षणिक योगदान माना तथा आशा व्यक्त की कि यह पुस्तक माता-पिता, शिक्षकों, इमामों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।
