दयाशंकर पांडेय, ब्यूरो चीफ, प्रतापगढ़ (यूपी), NIT:
श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा के छठवें दिन आज आचार्य सत्यम जी महाराज (श्रीधाम वृंदावन) ने भक्तों को अधर्म के दुष्परिणामों के विषय में विस्तारपूर्वक बताया। श्री शुकदेव जी ने कहा कि मनुष्य मन, वाणी और शरीर से पाप करता है, और यदि वह उन पापों का इसी जन्म में प्रायश्चित नहीं करता, तो मृत्यु के बाद उसे भयावह तथा यातनापूर्ण नरकों में जाना पड़ सकता है।
यमदूतों द्वारा बताया गया कि वेदों ने जिन कर्मों को करने का आदेश दिया है, वे धर्म हैं, और जिनका निषेध किया है वे अधर्म हैं। वेद स्वयं भगवान के स्वरूप हैं — वे उनके स्वाभाविक श्वास-प्रश्वास और स्वयंप्रकाश ज्ञान हैं।
जीव अपने शरीर और मनोवृत्तियों से जो-जो कर्म करता है, उसके साक्षी ये तत्व होते हैं —
सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, इन्द्रियां, चन्द्रमा, संध्या, रात्रि, दिन, दिशाएं, जल, पृथ्वी, काल और धर्म। इनके माध्यम से अधर्मों का पता लगने पर दंड का निर्णय होता है।
आचार्य श्री ने आगे बताया कि भगवान श्री हरि ने चित्रकेतु को समझाकर उनके समक्ष ही अन्तर्धान कर लिया था। कथा के यजमान सूर्यनारायण शुक्ल (भूतपूर्व उत्तर प्रदेश पुलिस दीवान), उनके पुत्र मुकेश शुक्ल (उद्योगपति एवं समाजसेवी), रत्नेश शुक्ल (पत्रकार, प्रतापगढ़) तथा यजमान के नाती अंकित शुक्ल (इंजीनियर) उपस्थित रहे। कथा ग्राम सभा खरगीपुर, देवगलपुर, कमासिन, बाघराय, प्रतापगढ़ में चल रही है, जहां श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति देखी गई।
