मो. मुजम्मिल, जुन्नारदेव/छिंदवाड़ा (मप्र), NIT:
रोजगार का मुद्दा लगातार जटिल रूप से बना हुआ है। त्योहारों पर औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने गए मजदूर अपने-अपने घर लौटते हैं — जैसे दिवाली, होली, रक्षाबंधन, ईद और क्रिसमस पर। मगर त्योहारों के कुछ दिन बाद ही रोजगार के अभाव में ये मजदूर फिर से बड़े औद्योगिक शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हो जाते हैं।
लगातार बंद होती जा रही खदानें अब सिर्फ एक ख्वाब बनकर रह गई हैं। एक भी खदान के पुनः चालू होने की उम्मीद अब तक केवल उम्मीद ही बनी हुई है। खदानों के अतिरिक्त जुन्नारदेव क्षेत्र में न तो कोई फैक्ट्री है और न ही कोई बड़ा औद्योगिक संसाधन। यही कारण है कि यहाँ के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्र के मजदूर बड़ी संख्या में पलायन कर रहे हैं।
डिजिटल युग में भी रोजगार के अभाव से जुन्नारदेव काफी पिछड़ा हुआ नजर आता है। रोजगार के बड़े-बड़े दावे केवल चुनावी वादों तक सीमित होकर रह गए हैं। चुनाव के समय खदानें खोलने और नए उद्योग लगाने के वादे किए तो जाते हैं, पर हकीकत में अब तक एक भी खदान की स्वीकृति नहीं मिली है। पलायन के कारण न सिर्फ क्षेत्र की आबादी घटती है, बल्कि व्यापार पर भी सीधा असर पड़ता है।
त्योहारों पर लौटे मजदूर दो-तीन दिन घरों में रुककर खर्च तो करते हैं, लेकिन क्षेत्र में स्थायी रोजगार न मिलने से मायूस होकर फिर से बाहर चले जाते हैं। अब जरूरत है कि सरकार और स्थानीय प्रशासन इन पर ठोस कदम उठाए। खदानों की स्वीकृति, फैक्ट्री और नए उद्योगों की स्थापना पर ध्यान देना बेहद जरूरी है, ताकि मजदूरों को अपने ही क्षेत्र में काम मिल सके और कोयलांचल का यह क्षेत्र फिर से जीवन्त बन सके।
