ज़फ़र खान, अकोट/अंकोल (महाराष्ट्र), NIT:
दुनिया में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने कभी कोई सफर न किया हो। बस से यात्रा करने की अपनी ही एक अलग दुनिया होती है। बस से जाना हो तो पहले बस्टैंड पर जाना पड़ता है, जहाँ अपनी मंज़िल वाली बस का इंतज़ार करना होता है।
वहीं कैंटीन में चाय, पानी और नाश्ते का आनंद लिया जाता है। बच्चों के लिए खट्टे-मीठे गोलियां, चॉकलेट और खिलौनों की बिक्री का माहौल भी बड़ा ही रौनकदार होता है।
इसी तरह प्राइवेट बसों का भी अपना अलग सिस्टम होता है। बस आती है, यात्री सवार होते हैं और सफर शुरू होता है। ड्राइवर बस निकालता है, थोड़ी देर बाद कंडक्टर आता है और टिकट काटता है — यहीं से सफर की असली शुरुआत होती है।
हमने अक्सर बसों में पैसों के चिल्लर के लिए या सीट को लेकर यात्रियों के बीच झगड़े होते देखे हैं। कई बार ऐसे मामलों को बस कंडक्टर ही सुलझाते हैं, तो कभी-कभी उन्हीं से बहस हो जाती है। लेकिन कुछ कंडक्टर ऐसे भी होते हैं जो अपने व्यवहार और इंसानियत से यात्रियों का दिल जीत लेते हैं।
ऐसे ही एक नेकदिल बस कंडक्टर हैं — अजू बामदळे। वे अकोट से अकोला रूट पर चलने वाली “रानी” नाम की प्राइवेट बस में ड्यूटी करते हैं और अपने परिवार का गुजारा ईमानदारी से करते हैं। अजू बामदळे का नाम आज उनकी लगन, सच्चाई और इंसानियत के कारण सबकी जुबान पर है।
वे अपने काम को पूरी निष्ठा और जिम्मेदारी से निभाते हैं। बस में सफर के दौरान वे हमेशा कोशिश करते हैं कि महिलाओं को सुरक्षित और उचित सीट मिले, और वे उन्हें अन्य महिलाओं के साथ ही बैठाते हैं। कोई शराबी बस में चढ़ने की कोशिश करे तो वे मना कर देते हैं। अगर किसी गरीब यात्री के पास किराया कम हो या न हो, तो वे उसे बिना पैसे लिए उसकी मंज़िल तक पहुँचा देते हैं।
अजू बामदळे ने अपनी सेवा के वर्षों में कभी किसी भिखारी या परेशान व्यक्ति से पैसे नहीं लिए — बल्कि कई बार अपनी जेब से किराया भरकर बस मालिक को दिया है।
आज के जातिवाद के दौर में वे हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल हैं।
जहाँ बस मालिक मुस्लिम हैं, वहीं कंडक्टर अजू बामदळे हिन्दू हैं — लेकिन मालिक ने पूरी बस की जिम्मेदारी उन पर भरोसे से छोड़ रखी है। वे बस को मालिक की तरह संभालते हैं। अजू बामदळे एक सादे, सच्चे और इंसानियत से भरे इंसान हैं। जो भी उनसे मिलता है, बस यही कहता है —
“अजू बामदळे, तेरे इस कार्य को सलाम!”
