आलम वारसी, ब्यूरो चीफ, मुरादाबाद (यूपी), NIT:

मुरादाबाद निवासी जसराम काफी समय से एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे बीमारी ज्यादा बढ़ गई तो किडनी ट्रांसप्लांट करने की नौबत आ गई जब यह बात जसराम सिंह के बड़े भाई प्रेम शंकर पुत्र गजराम सिंह निवासी हजरत नगर गढ़ी जिला संभल को लगी तो उन्होंने तुरंत आगे आकर अपनी किडनी अपने छोटे भाई जसराम सिंह को देने का फैसला कर लिया। और उन्होंने तुरंत अपनी किडनी अपने छोटे भाई जसराम सिंह को देकर उनकी जिंदगी भी बचाई साथ में इंसानियत की मिसाल भी पेश की है। मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल वैशाली की नेफ्रोलॉजी एवं किडनी ट्रांसप्लांट विभाग की एसोसिएट डॉ,मनीषा दस्सी ने प्रेस वार्ता कर दी।
डॉ, मनीषा दस्सी ने बताया कि मुरादाबाद निवासी मरीज जिनकी उम्र 41 वर्ष है जसराम उनका नाम है उनको उनके बड़े भाई प्रेम शंकर द्वारा जिनकी उम्र 46 वर्ष उन्होंने अपने छोटे भाई जसराम को अपनी किडनी देकर उनको एक नई जिंदगी दी है इसके साथ ही इंसानियत की एक नई मिसाल भी पेश की है मरीज़ जसराम एन्ड स्टेज किडनी डिज़ीज़ से काफी समय से जूझ रहे थे उनका ट्रांसप्लांट मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल वैशाली मैं सफलतापूर्वक किया गया है डॉ ने बताया कि ‘मल्टीपल क्रॉनिक बीनारियों जैसे कुपोषण, हार्ट डिस्फंक्शन, लिवर से जुड़ी समस्याओं और दौरे के इतिहास वाले मरीज में ट्रांसप्लांट करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। इसके लिए मल्टीडिसिप्लिनरी अपोच, लगातार डायलिसिस ऑप्टिमाइजेशन और सावधानीपूर्वक प्री और पोस्ट ऑपरेटित मॉनिटरिंग की जरूरत होती है।
रिसिपिएंट का ऑपरेशन ओपन सर्जरी से हुआ जबकि डोनर का लेप्रोस्कोपिक सर्जरी से, जिसमें छोटे धीरे लगे और सिले खुद घुलने वाले थे। डोनर को पांचवे दिन और रिसिपिएंट को सातवें दिन अस्पताल से छुट्टी मिल गई। एक हफ्ते बाद रिसिपिएंट का डीजे स्टेट भी डे केयर बेसिस पर हटाया गया। आज दोनों स्वस्थ हैं, और अपनी सामान्य जिंदगी जी रहे हैं। डॉ, मनीषा दस्सी ने आगे बताया कि 41 वर्षीय जसराम को सबसे पहले 2023 की शुरुआत में मैक्स क्लिनिक, मुरादाबाद में कॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) का पता चला था। फरवरी 2024 में उनकी हालत बिगड़ने लगी और उन्हें कमजोरी, थकान, तेज वजन गिरना और हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत के साथ मैक्स हॉस्पिटल वैशाली लाया गया। डॉ. मनीषा दस्सी की देखरेख में सफल किडनी ट्रांसप्लांट किया गया।
शुरुआत में दवाओं से इलाज किया गया, लेकिन उनकी किडनी की कार्यक्षमता लगातार गिरती रही और अंत में उन्हें डायलिसिस की जरूरत पड़ी। परिवार में कई संभावित डोनर की जाँच की गई। मरीज़ की मां डोनर बनना चाहती थी, लेकिन उनकी प्रारंभिक अवस्था की किडनी डिजीज सामने आई। पत्नी डायबिटीज के कारण डोनर नहीं बन सकी। एक साल से ज़्यादा समय तक कई अन्य रिश्तेदारों की भी जांच हुई, पर कोई उपयुक्त डोनर नहीं मिला।
इस दौरान जसराम अपनी नौकरी गंवा बैठे और डायलिसिस पर निर्भर हो गए, जिससे परिवार पर मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक बोझ बढ़ता गया। भाई की हालत देख और अन्य डोनर परिवारों से प्रेरणा पाकर बड़े भाई प्रेम शंकर ने साहसिक फैसला लिया और अपने छोटे भाई जसराम को किडनी दान करने के लिए आगे आए।
