रहीम शेरानी हिन्दुस्तानी, ब्यूरो चीफ, झाबुआ (मप्र), NIT:

हदीस के अनुसार हजरत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर सबसे पहला अल्लाह का पैगाम रमजान के महीने में गार-ए-हिरा (हिरा नामक गुफा) में नाजिल हुआ।
हजरत मोहम्मद सत्य की खोज में मक्का शहर के पास स्थित इस गुफा में ध्यान और इबादत के लिए जाते थे।
मक्का के समाज में फैली बुराइयों और अन्याय से वे परेशान थे और शांति व सत्य की खोज में यहां समय गुजारते थे। एक रात जब वे गार-ए-हिरा में थे, तब जिब्रील (अलैहिस्सलाम) नामक फरिश्ते (देवदूत) ने आकर उन्हें अल्लाह का पहला संदेश दिया। रोजा वर्ष 624 ईस्वी में अनिवार्य किया गया।
इसी तरह माहे रमज़ान का मुकद्दस एवं पवित्र महीना माहे रमज़ान के रोजे जारी है मुस्लिम समाज के बड़ों के साथ- साथ मासूम बच्चे भी रोज़े रखकर इबादत कर रहे हैं। मुकद्दस पाक महीने माहे-रमजान में बच्चों में भी खुशी है दिन भर नमाजे पढ़ने के बाद क़ुरान की तिलावत के साथ इबादतों का दौर लगातार जारी है।
मासूम बच्चे महिलाएं पुरुष बुजुर्ग पाबंदी के साथ इबादतों में मशगूल हैं इफ्तारी के वक्त विशेष तरह के लज्जित पकवान बनाए जाते हैं साथ ही फल फ्रूट शर्बत आदी अनेक तरह के पकवान सभी रोजदार परिवार के साथ में बैठ कर दस्तरखान सज़ा कर इफ्तार करते हैं। छोटे-छोटे मासूम बच्चों के रोजा रखने से पूरे परिवार में बहुत खुशी होती है जों बच्चे रोजा रखते है उन्हें फुलों की माला पहनाकर कर घर पर लज्जित मिठे पकवान बना कर आस पड़ोस के घरों में बांटे जातें हैं।
इफ्तार के वक्त तो नज़ारा अलग ही रहता है
रोज़े रखने वाले मासूम बच्चों को फूलों की माला पहनाकर उसकी हौसला अफ़ज़ाई करतें हैं। मुकद्दस माह-ए-रमजान में रोजा, सिर्फ खाने पीने से रुकने का नाम नहीं है, बल्कि वह जिस्मानी, रूहानी और दुरुस्तगी और इंसानी हमदर्दी, अखलाक और मुहब्बत को बढ़ावा देता है और कुदरत के नेअमतों का अंदाजा होता है।
बच्चों के द्वारा पहला रोज़ा रखने पर अम्मी अब्बू सहित परिवार वाले रिश्तेदारों के द्वारा बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं। इसकी अनिवार्यता कुरआन करीम की एक आयत से सिद्ध होती है, जिसके अनुसार ‘ऐ ईमान वालो। तुम पर रोजे फर्ज किए गए हैं, जैसे कि तुमसे पहले लोगों पर फर्ज किए गए थे, ताकि तुम संयमी बन सको।’ इस आयत से तीन बातें स्पष्ट हैं- ये रोजे अनिवार्य किए गए हैं।
